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किसान दुर्दशा व मीडिया के काले सच पर शॉर्ट फिल्म “जम के रखना कदम” अंतरराष्ट्रीय शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल के लिए नामित

पत्रकारिता के छात्र रहे युवाओं द्वारा तैयार की गई शॉर्ट फिल्म "जम के रखना कदम" को अंतरराष्ट्रीय शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल के लिए नामित किया गया है| किसानों की दुर्दशा और मीडिया के काले सच को उजागर करती इस फिल्म को 12 अन्य देशों की 25 सर्वोत्तम लघु फिल्मों की सूची मे जगह मिली है| जम के रखना कदम एक लघु फिल्म है जिसे दिल्ली के युवाओं ने तैयार किया है|

पत्रकारिता के छात्र रहे युवाओं द्वारा तैयार की गई शॉर्ट फिल्म "जम के रखना कदम" को अंतरराष्ट्रीय शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल के लिए नामित किया गया है| किसानों की दुर्दशा और मीडिया के काले सच को उजागर करती इस फिल्म को 12 अन्य देशों की 25 सर्वोत्तम लघु फिल्मों की सूची मे जगह मिली है| जम के रखना कदम एक लघु फिल्म है जिसे दिल्ली के युवाओं ने तैयार किया है|

करीब 30 मिनट की इस फिल्म में मीडिया, फिल्म उद्योग, प्रेम और संघर्ष जैसे कई पहलू दर्शाये गए हैं| फिल्म मे दिखाया गया है कि किस तरह से मीडिया और फिल्मउद्योग के बीच एक तरह का गठबंधन है जो समाज के लिए एक खतरा है| इसमें नवोदित कलाकारों का संघर्ष और शोषण एक नए रूप मे सामने रखा गया है जो फिल्म उद्योग का दूसरा पहलू है| फिल्म में आई आई एम सी के छात्र रहे पत्रकार और कलाकारों ने अभिनय किया है|

आई आई एम सी से हिन्दी पत्रकारिता कर चुके फिल्म के निर्देशक मयंक सिंह बताते हैं कि जिंदगी एक दौड़ की तरह है जिसमें हम सब भाग रहे हैं, बस सबके ट्रैक अलग अलग हैं| इसलिए ही फिल्म की कहानी को एक दौड़ के नरेशन के रूप में दिखाया गया है| उनका कहना था की मीडिया से जुड़े विषय पर इस शॉर्ट फिल्म को बनाने के लिए वह पत्रकारों से ही अभिनय करना चाहते थे|

पी टी आई में अपनी सेवाएँ दे चुके हिमांशु सिंह ने इसमें चैनल हेड का किरदार निभाया है| साथ ही नवभारत में कार्यरत राकेश शुक्ल , यू एन आई और पांचजन्य के लिए काम कर चुके प्रमोद मजूमदार , एन बी टी में काम कर रहीं संचितया उपाध्याय ने भी भूमिका अदा की है वह बताते हैं कि फिल्म के लिए रचे गए एक गाने में उन्होंने दिल्ली की प्रमुख इमारतों और विशेष इलाकों को फिल्माया है जो इस फिल्म का खास पहलू है| मयंक इससे पहले भी मिशन एडमिशन नामक एक लघु फिल्म बना चुके हैं जिसे बेंगलूर फिल्म महोत्सव मे बेस्ट सोशल मेसेज फिल्म का पुरस्कार मिला था|

दैनिक हिंदुस्तान के रिपोर्टर और फिल्म में अभिनय कर चुके रोहित पँवार का कहना है कि हम सबके अंदर एक कलाकार मौजूद है जिसके लिए सब एक मंच ढूंढते रहते हैं| वह कहते हैं कि आज के दौर में युवा को स्वयं ही ऐसे रास्ते बनाने होंगे जिनसे यह मंच उन्हें मिल सके , क्योंकि तकनीक के दौर में यह ज्यादा आसान हो गया है| लघु फिल्में, डॉक्यूमेंटरी, नाटक, आर्ट क्लब ऐसे माध्यम हैं जिनसे युवा ऐसे मंचों तक पहुँचने का रास्ता तय कर सकते हैं| नारद कम्यूनिकेशन के निर्माता गोकुल जैन का कहना है कि ऐसे माध्यम इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि इनसे सकारात्मक ऊर्जा को सही दिशा दी जा सकती।

फिल्म की एक झलक यहां देख सकते हैं…

http://www.youtube.com/watch?v=WcdTwOENb_I

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