बाइस सालों से यूपी की सत्ता से बाहर कांग्रेस को फिर से सत्ता में लाने के लिये कांग्रेस के युवराज उत्तर प्रदेश की खाक छानने में लगे है। कांग्रेस ने मिशन यूपी को कामयाब बनाने के लिये चुनाव से ठीक पहले मुसलमानों को अरक्षण का दांव खेला है, वहीं पिछडे़ मतदाताओं को भी पार्टी में जोड़ने के लिये भारी संख्या में टिकट बांटे हैं। जबकि सपा के युवराज पर अपनी प्रतिष्ठा बचाने का दबाव है। सपा को अपने कुछ नेताओं की कमी इस चुनाव में जरूर खल रही है। भाजपा ने अपने पुराने चेहरों पर ही दांव लगया है। मायावती सोशल इंजीनियरिग के भरोसे फिर से सरकार बनाना चाहती हैं, बसपा की चुनावी डगर में अपने ही पार्टी के नेता ही रोड़ा बनने लगे हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने मिशन यूपी की कमान अपने हाथों में लेकर प्रदेश में ताबड़तोड़ चुनावी सभायें करनी शुरू कर दी है। पहले चरण में वह पूर्वांचल में थे तो दूसरे चरण में बदायूं से शुरुआत की और कानपुर में बड़ी सभा कर खत्म किया। तीसरे चरण में सीतापुर से चुनाव प्रचार शुरू कर कल सहारनपुर में विशाल जन सभा कर चुनाव प्रचार को और गति दी। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की सत्ता में बाइस सालों बाद सत्ता में लाने के राहुल गांधी के सपने को साकार करने के लिये उन की बहन प्रियंका भी चुनाव प्रचार में अमेठी और रायबरेली के बाहर भी चुनाव प्रचार के लिये निकल सकती हैं। वहीं कांग्रेस अल्पसंख्यकों को 4.5 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर पहले ही मुसलमानों को खुश कर चुकी है। साथ ही समाजवादी पार्टी के बरिष्ठ नेता रसीद मसूद को अपने साथ कर वह मुसलमानों के वोट पर सेंधमारी कर रही है। बेनी प्रसाद वर्मा का केन्द्र सरकार में कद बढ़ाकर पिछड़ों को भी अपने पार्टी के साथ जोड़ने का दांव चला है। कांग्रेस के टिकट बंटवारे में मुसलमानों और पिछड़ों को अधिक अहमियत दी गई है।
कांग्रेस के युवराज यूपी में चुनाव प्रचार के मामले में अभी सभी पार्टियों से आगे चल रहे हैं। वह जहां-जहां सभा करने जाते हैं अपने विरोधियों को घेरने में नहीं चूक रहे हैं। यूपी में सत्तारूढ़ बसपा के खिलाफ वह कुछ अधिक ही मुखर हैं। सभी सभाओं में राहुल गांधी लखनऊ में डिजाइनदार बैठा हाथी विभागों का पैसा खाने की बात कर जनता से तालियां बटोर रहे हैं। राहुल को देखने और सुनने के लिये भारी भीड़ जुट रही है, देखने वाली बात यह होगी कि राहुल की सभा में आने वाली भीड़ कांग्रेस के लिये वोट करती है?
जिस तरह से मुख्यमंत्री मायावती ने अपने मत्रिमंडल के 20 मंत्रियों को भ्रष्ट्राचार और क्षेत्र में खराब फिजा के कारण मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया है। माया का यह नया फार्मूला क्या जनता में बसपा की फिजा सुधारने में कारगर होगी, यह तो वक्त ही बतायेगा पर मयावती ने अपने ही एक सौ से भी अधिक मंत्री, विधायकों का टिकट काटकर चुनावी समर में अपनी राह में कांटे बिछाने का काम किया है।
समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव समाजवादी क्रांति रथ यात्रा लेकर यूपी में सपा के लिये माहौल बनाने में जुटे हैं और फिर से यूपी में सरकार बनाने के लिये भरसक प्रयास कर रहे हैं, पर अखिलेश को अपने पुराने नेता अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, रसीद मसूद की कमी भी खल रही है। आजम खॉ के सहारे सपा मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने के प्रयास में है। देखने वाली बात यह होगी कि आजम खॉ सपा को कितना फायदा पहुंचा पाते हैं।
भाजपा अपने पुराने चेहरों के सहारे ही मिशन यूपी फतह करने के लिये निकल पड़ी है। भाजपा कल्याण सिंह की कमी को पूरा करने के लिये उमाभारती को मैदान में उतारा है, वहीं मायावती की सोशल इंजीनियरिंग को तोड़ने के लिये ब्राह्मण चेहरे के रूप में कलराज मिश्र को और ठाकुरों को पार्टी के साथ लाने के लिये राजनाथ सिंह को यूपी चुनाव की कमान सौंपी गई है। यदि पिछले बाइस सालो में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक उठा पटकर पर नजर डालें तो 1991 में राम के नाम पर वोट बटोर ने के बाद भाजपा सत्ता में आई भाजपा का बिरोध कर मुलायम सिंह ने मुसलमानों को अपने साथ जोड़ लिया और तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पाई।
वहीं मायावती तीन बार भाजपा के सहारे यूपी की मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुईं। 2007 में मायावती को यूपी की जनता ने पहली बार पूर्ण बहुमत दिया। इन बाइस सालों में कांग्रेस ने कई उतार-चढ़ाव देखे मुसलमान, दलित और ब्राह्मण वोट पार्टी से छिंटक कर दूर चला गया। रही सही कसर नरेश अग्रवाल ने पार्टी के विधायकों को तोड़ कर पूरी कर दी।
लेखक सौरभ दीक्षित शाहजहांपुर में आईबीएन7 के पत्रकार हैं.






