Siddharth Kalhans : लखनऊ में पुस्तक मेला चल रहा है। तीन करोड़ की किताबें बिकीं। खबर है। पर दो दिन मैं भी मेले में गया। ज्यादातर किताबें पुरानी ही हैं। नए अनुवाद नहीं दिखे। दाम को लेकर नवभारत टाइम्स की खबर सही है। आनलाइन सस्ती मिल जाती हैं किताबें। ज्यादातर कबाड़ के अंग्रेजी फिक्शन को निपटाने का धंधा दिखा मुझे। सीडी, बच्चों ती तामिक्स का धंधा तेज दिखा। कंपटीशऩ की किताबों को लेकर लोग रुचि दिखाते मिले। डिस्काउंट भी कुछ खास नही था। हाल ये था कि आधा दर्जन किताब लेने के बाद भी राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ले जाने के लिए पेपर बैग या पन्नी नही मिली।
ज्ञानपीठ के स्टाल पर शीला रोहेगर की यहूदी की महागाथा गायब है। पूंछा तो पता चला पहले दिन से नही है। लखनऊ के जाने माने पत्रकार साहित्यकार अनिल यादव की एक भी किताब वहां नही है। इसे भी महोत्सव जैसे मेले की तौर पर लिया लोगों ने। अब पैसा है तो किताबें भी बिक जाती हैं। पर एक आंकड़ा मेरे पास आया था जुलाई में। वो ये कि आनलाइन किताबें खरीदने में लखनऊ का नंबर देश भर में पांचवा है। हम कोलकाता से भी आगे हैं। लेखकों से मिलने के कार्यक्रम भी सतही ही दिखे। जिसने अपनी कोशिश कर लोग बुला लिए वरना बाकी राम भरोसे ही रहे। पता नही क्यों अच्छा नहीं लगा।
लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस के फेसबुक वॉल से.





