Rajiv Nayan Bahuguna : लालू बाबू की सद्यः कृष्ण भवन यात्रा ने मुझे फिर से यह श्रृंखला लिखने की प्रेरणा दी, और उनसे जुड़े कुछ पुराने प्रसंग भी याद आ गए. अस्सी के दशक में मैं नवभारत टाइम्स पटना में सब एडीटर के तौर पर काम कर रहा था. पत्रकारों से सघन संपर्क में रुचि रखने वालों में वहां उस वक़्त फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा, जनरल एस के सिन्हा, कर्पूरी ठाकुर और लोक दल के युवा विधायक लालू प्रसाद यादव थे. हेमवती नंदन बहुगुणा तब इलाहबाद से चुनाव हार कर अपने पुनर्वास के लिए छटपटा रहे थे. बिहार की किसान गंज लोक सभा सीट पर उप चुनाव होना था. मुस्लिम बहुल सीट थी. हेमवती नंदन बहुगुणा मुस्लिमों में लोकप्रिय थे, या उन्हें ऐसा लगता था, सो उन्होंने बिहार में अपनी सक्रियता बढ़ा दी.
मैं उन्हें मिलने डाक बंगले, या जहाँ भी वह रुके होते चला जाता था. लालू बाबू बहुगुणा जी से मिलने आते. आखिर हेमवती नंदन बहुगुणा उनकी पार्टी के आला कमान जो थे. एक बार डाक बंगले के कमरे में बहुगुणा जी मुझे नसीहत दे रहे थे कि चाहे दलिया या खिचडी ही बनाओ, पर खाना हाथ से बनाओ. इसी बीच लालू प्रसाद यादव वहां आ गये और बगैर हमें डिस्टर्ब किये वार्तालाप सुनने लगे. इस अन्तरंग वार्तालाप से लालू बाबू को लगा कि मैं हेमवती नंदन बहुगुणा के बहुत करीब हूँ. यह बात कुछ हद तक सत्य भी थी. वह मुझे विशेष अनुग्रह देने लगे. लेकिन पटना और पत्रकारिता में नया होने, तथा लालू को एक सामान्य विधायक मान बैठने की भूल करने के कारण मैंने उनमे ज्यादा रुचि नहीं दिखाई. लेकिन कई साल बाद, एक बार लालू बाबू हमारे बहुत काम आये, जब मैंने अपने पिता को उनके पास भेजा. लालू बाबू उस समय केन्द्रीय रेल मंत्री थे.
चारे की जुगाली दर असल बिहार में लालू से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी. मेरे पटना प्रवास के चार साल के दौरान वहां जगन्नाथ मिश्र, बिन्देश्वरी दूबे, भगवत झा आज़ाद और छोटे साहब उर्फ़ सत्येन्द्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री रहे. ये सभी कांग्रेसी थे. वहां कुछ ही महीने में घेर कर, हांका लगा कर मुख्यमंत्री को पलट दिया जाता. दरअसल हर कांग्रेसी चारा खाने को लालायित था. वह चाहता था कि उसका साथी छह महीने तक पर्याप्त चारा खा चुका है, अब उसे मौक़ा मिलना चाहिए. उन्ही दिनों वहां अलकतरा (तार कोल) घोटाला भी सामने आया. नवभारत टाइम्स के तत्कालीन स्थानीय सम्पादक दीनानाथ मिश्र ने उस पर व्यंग्य लिखा था- अलकतरा उर्फ़ जेब कतरा. यद्यपि नव भारत टाइम्स अपने तेवरों के कारण ऐसे मामले बढ़-चढ़ कर उठाता, लेकिन हमारे ही साथ के एकाधिक रिपोर्टर बीडी पीते हुए और रिक्शे में बैठ कर मुख्यमंत्री निवास जाते और डन हिल या ट्रिपल फाइव के कश लगाते हुए लाल बत्ती की कार में लौटते थे. ज़ाहिर है कि यह चारे का ही प्रताप था. जिस तरह रशीद मसूद के मामले में उत्तर प्रदेश के एक पत्रकार की प्रमुख भूमिका भी सामने आई है, उसी तरह बिहार के घोटालों में भी कई पालतू पत्रकार इन्वोल्ब थे. नेता जिस तरह कुत्ता, तोता, गाय या गुंडे पालता है, उसी तरह पत्रकार भी पालता है.
खैर …. माधव राव सिंधिया ने अपने रेल मंत्री रहते हुए मेरे पिता को एक रेल पास जारी किया. विशिष्ट श्रेणी का यह रेल पास देश के छह या सात प्रमुख लोगों को जारी किया गया था. इसमें एक सहवर्ती समेत किसी भी ट्रेन में वातानुकूलित श्रेणी में यात्रा की जा सकती थी. इस पास की बदौलत मैं भी देश के चप्पे चप्पे में घूम सका. चूंकि इसके तहत ट्रेन में खाना भी फ्री था, सो मेरे पिता कुछ खा भी लेते अन्यथा जेब से पैसा खर्च न करने की आदत के कारण उनका तीन तीन दिन का रेल सफ़र पानी पी कर ही गुजरता था. एनडीए सरकार में रेल मंत्री बनते ही ममता बनर्जी ने ये सभी पास रद्द कर दिए. उन्हें लगा कि सभी पास धारक कांग्रेसी हैं. जबकि शेष पांच पास धारक खिलाड़ी या फिल्म स्टार जैसे बड़े लोग थे, जो कभी रेल यात्रा नहीं करते थे, सिर्फ मदर टेरेसा और मेरे पिता ही इसका भरपूर उपयोग करते थे. पूरे पांच साल फजीते में बीते, अन रिज़र्व सेकिंड क्लास में धक्के खाते. अंततः जब लालू बाबू रेल मंत्री बने तो मैंने अपने पिता को उनके पास जाने की सलाह दी.
दोस्तों, हम देहातियों के लिए ट्रेन का एसी डिब्बा किसी स्वप्न लोक से कम नहीं था. मैंने अपने जीवन में पहली बार एसी १९७८ में देखा, जब हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्र में मंत्री थे. जनवरी की एक ठिठुरती शाम को मुझे उनके प्रकोष्ठ में भेजा गया. वहां से गरमी का भभका उठा. मैं घबरा कर बाहर भागा, मुझे लगा कि कमरे में आग लग गयी है. क्योंकि अब तक मैं बाहर बरामदे में ठण्ड से ठिठुर रहा था. वहां उनके अन्तः प्रकोष्ठ में एसी का ब्लोअर चल रहा था. मुझे पुनः उनके कक्ष में जाने का आदेश हुआ, पर मैं न माना और राज घाट की बस पकड़ ली, जहाँ मैं रुका था. उसके कुछ ही माह बाद मई में मैं पुनः हेमवती बाबू के दफ्तर में बुलवाया गया. कुछ देर बैठा ही था, कि मेरी देह ठंडी होने लगी. मुझे लगा कि मेरे देवताओं ने मेरी अंतिम पट कथा लिख दी है. इस चिलचिलाती गरमी में हरसिल जैसी ठण्ड का रहस्य मैं समझता भी तो कैसे? मुझे लगा की ईश्वर ने, जिसकी मैं बहुधा खिल्ली उड़ाता रहत हूँ, मुझे मेरे पापों का दंड दे दिया है, और अब इस पृथ्वी नामक उपग्रह पर मैं कुछ ही क्षणों का मेहमान हूँ. एसी के असली मज़े कयी दशक बाद हमें लालू बाबू ने ही दिलवाए.
जब रेल पास रद्द हुआ तो भारी आफत आई. ममता बनर्जी के दरबार में भी गए, पर उन्होंने हाँ – हूँ करके टाल दिया. शेष पास धारकों को कोई दिक्क़त थी नहीं, सब हवायी जहाजों के यात्री थे. शुभचिंतकों ने सलाह दी- यह पगली आपका पास रिन्यू नहीं करेगी. अब एक ही चारा है कि फ्रीडम फाइटर का सरकारी दर्ज़ा हासिल कीजिए, तो पास मिल जाएगा. वह दर्ज़ा पहले यह कहते हुए ठुकरा दिया गया था कि मैंने कोई सुविधा लेने के लिए आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी है. हार कर, झख मार कर फ्रीडम फाइटर का दर्ज़ा पाने के लिए अर्जी दी. वह मामला भी लालफीताशाही में उलझ कर रह गया. प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवानी दोनों से मिले. दोनों सम्मान करते थे. पर बात नहीं बनी. भाजपा में ऐसा कहने वालों की भी कमी न थी कि सरकार से मुफ्त रेल पास ले कर यह बुड्ढा देश भर में घूम घूम कर सरकार के ही खिलाफ आग सुलगाता है. वह दर्ज़ा और पेंशन भी बाद में केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री बनने पर स्वामी चिन्मया नन्द ने दिलवाया. खैर..
मैंने अपने पिता को सलाह दी कि रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से मिलिए, वह चट से आपका काम करेंगे. लेकिन लालू के पास जाने में उन्हें संकोच था, क्योंकि लालू और मेरे पिता दोनों एकाधिक बार सार्वजनिक तौर पर एक दूसरे की खिल्ली उड़ा चुके थे. लालू ने एक टीवी शो में कहा था- सड़क, बाँध, पुल कुछ भी विकास का काम करो, तो सुंदर लाल बहुगुणा आड़े आ जाता है. जबकि मेरे पिता दक्षिण के एक अखबार द्वारा आयोजित सभा में कह चुके थे- आप लोग उत्तर भारत से भी अखबार निकालिए, क्योंकि राजनीति को दूषित करने वाले लालू-झालू सब वहीँ हैं. दोनों को एक दूसरे के कथन की जानकारी थी. लेकिन मैंने अपने पिता से कहा- लालू बाबू हंसोड़ हैं, और बड़े दिल के भी हैं. वह कोई बात दिल में नहीं रखते. आप नि:संकोच उनसे मिलिए.
भले ही स्वामी चिन्मया नन्द मेरे पिता को केन्द्रीय मान्यता प्राप्त स्वाधीन्ता सेनानी का दर्ज़ा, पेंशन और रेलवे पास सब कुछ दिलवा चुके थे, पर हमें तो वही वाला पास चाहिए था जो माधव महाराज (सिंधिया) ने दिया था, जो शताब्दी और राजधानी में भी चलता था, और जिसमें खाना भी फ्री था. बाबरी मस्ज़िद तोड़ने के अपराधी और घोर सांप्रदायिक स्वामी चिन्मया नन्द ने केन्द्रीय गृह मंत्री बनते ही सबसे पहले अपने चार्ज लेने के कागजात साइन किये और फिर अपने सचिव से बोले- बहादुर शाह ज़फ़र के आश्रितों और सुंदर लाल बहुगुणा जी वाली फ़ाइल तुरंत लाओ. उन्होंने इन दोनों को अपने एक ही दस्तखत से स्वाधीनता सेनानी का दर्ज़ा दिया, इसे कयी लोग जानते हैं. एक साम्प्रदायिक मनुष्य भी कहीं न कहीं मानवीय होता है. एक दिन लालू राजा (वह स्वयं को चमचों से यही कहलाना पसंद करते हैं) किसी हाई लेबल पार्टी में, शायद सोनिया माता के घर मेरे पिता को मिल गए. मैं साथ नहीं था, पर मेरी मदर ने उन्हें पहचाना और दोनों दम्पति लालू बाबू के निकट चले गए. अपनी मांग रखी- पास तो है, पर खाना नहीं मिलता. लालू बाबू बोले- इसके लिए आपको मेरे घर आना होगा, बोलिए आईयेगा? नेकी और पूछ-पूछ? अगली सुबह आठ बजे का समय तय हुआ. लालू बाबू मेरे पिता के सामने अत्यधिक प्रफुल्लित और विनम्र थे, यह मेरी माँ ने मुझे बाद में बताया.

अपने पिता जाने-माने पर्यावरणवादी सुंदरलाल बहुगुणा के साथ वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा.
जाने-माने पर्यावरणवादी सुंदरलाल बहुगुणा के सुपुत्र और उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.





