समाजवादी सरकार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैली साम्प्रदायिक हिंसा से हुए राजनैतिक नुकसान की भरपाई के लिये आने वाले दिनों में कई गैर जरूरी फैसले कर सकती है। खासकर उसके निशाने पर भारतीय जनता पार्टी और उसके बड़े नेता रहेंगे। सपा उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटों की जंग को अपने और भाजपा के बीच में समेटना चाहती है। भय दिखा कर प्रीत और सरकारी खजाने का मुंह मुस्लिम वोटरों की तरफ करके युवा सीएम अल्पसंख्यकों को लुभाना और सपा के पक्ष में मुस्लिम ध्रुवीकरण करना चाहते हैं।
इस हकीकत से भी पर्दा हट गया है कि विधान सभा चुनाव के दौरान उन्होंने विकास और कानून व्यवस्था को लेकर जो वायदे किये थे, वह झूठे थे। दरअसल उन्हें (अखिलेश) तो अंग्रेजों के साथ-साथ अपने पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को ही आगे बढ़ाना है, जिसके बल पर तीन बार मुलायम मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे थे। अपने नाम के साथ मौलाना शब्द का संबोधन जुड़ने पर मुलायम गौरवान्वित महसूस करते थे, ऐसी ही प्रसन्नता मुस्लिम टोपी और अंग वस्त्र पहनकर अखिलेश यादव करते हैं। पूछने पर वह कहते हैं मैं तो काफी समय से मुस्लिम टोपी पहनता रहा हूं। उनके बयान ऐसे होते हैं मानों वह किसी वर्ग विशेष का प्रवक्ता बोल रहा है। बिना जांच पड़ताल के वह किसी को क्लीन चिट दे देते हैं तो किसी पर आरोप मढ़ देते हैं। अपनी पार्टी के नेताओं की बुराई तो वह सुनना ही नहीं चाहते हैं। उनके मंत्री आजम खॉ पर आरोप लगता है तो सीएम सुरक्षा कवच बन जाते हैं। नौकरशाही और पुलिस को काम नहीं करने दिया जाता है। शासन-प्रशासन में बैठे अधिकारियों पर प्रेशर डालकर विरोधियों को फंसाने और निपटाने की साजिश रची जाती है। दबाव भी ऐसा वैसा नहीं। हालात इतने खराब हो जाते हैं कि बड़े-बड़े अधिकारी बीमार पड़ जाते हैं। ऐसा ही कुछ मुजफ्फरनगर के एसएसपी के साथ हुआ। बीमारी के चलते उन्होंने अवकाश ले लिया, लेकिन महकमें में उनकी बीमारी से अधिक चर्चा उनके ऊपर पड़ रहे पॉलीटिकल प्रेशर की ज्यादा थी। कहा जाता है कि क्षेत्र के एक बड़े भाजपा नेता के खिलाफ रासुका तामील करने का प्रवीण के ऊपर सत्ता का दबाव था। प्रवीण इसके लिये तैयार नहीं थे। राजपाठ कुछ ऐसे चलाया जा रहा है मानों सपा नेता दूध के धुले हैं और बाकी दलों के नेता दंगाई, उपद्रवी। मुख्यमंत्री रिमोट से चल रहे हैं। पूरा प्रदेश ‘अंकल प्रदेश’ बन कर रह गया है। आजम, राम गोपाल, शिवपाल अंकल के सामने भतीजा बौना पड़ गया है।
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव यूपी के दंगों के लिये भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन मुलायम या फिर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यह नहीं बता पाते हैं कि उन्हें किस आधार पर या कौन सी जांच से इस बात का पता चला। अगर मुलायम की बात सच थी तो दंगों से पहले यह बात सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। मुलायम ही नहीं उनकी पूरी सपा बिग्रेड एक ही सुर में बोल रही है। बात दंगों में आरोपी बनाये गये भाजपा विधायकों की कि जाये तो यहां भी सपा को किरकिरी का ही सामना करना पड़ा। जेल भेजे गये भाजपा के दो और बसपा के एक विधायक में से भाजपा के सुरेश राणा और बसपा के नूर सलीम राना को दो दिन में ही जमानत मिल गई। सरकारी वकील की दलीलें अदालत में जरा भी नहीं चलीं। पकड़े गये भाजपा विधायक संगीत सोम पर सरकारी मंशा के अनुरूप रासुका तो लगा दी गई है, लेकिन सपा सरकार के लिये अदालत के सामने इस फैसलों को भी सही ठहराना आसान नहीं होगा।
मुजफ्फरनगर कुछ शांत हुआ तो नरेन्द्र मोदी की रैलियों को लेकर भाजपा और सपा सरकार के बीच टकराव वाली स्थिति पैदा की जा रही है। सूत्र बताते हैं कि यूपी सरकार भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की उत्तर प्रदेश में होने वाली कुछ रैलियों को सौहार्द बिगड़ने की आड़ लेकर रद्द कर सकती है। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा ने बिना तीज-त्योहार देखे उन्हीं या उसके आस-पास की तिथियों पर रैलियों की घोषणा करके स्वयं ही भाजपा के खिलाफ मौके की तलाश में रहने वाली सपा को रैली की रोक का हथियार थमा दिया है। कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्षा रीता बहुगुण जोशी भी कहती हैं कि भाजपा को पता होना चाहिए कि अक्टूबर-नवंबर का महीना धार्मिक त्योहारों का होता है, इसलिये इन दिनों तमाम पार्टियां राजनैतिक आयोजन करने से बचती हैं। प्रदेश की शांति व्यवस्था बनाये रखना चाहिए। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता और मंत्री राजेन्द्र चौधरी को भी मोदी की रैली से एतराज है। उनका कहना है कि किसी को भी प्रदेश का साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने की छूट नहीं दी जा सकती है। यह सच है कि लोकतंत्र का राज है, लेकिन इसमें साम्प्रदायिकता की कोई जगह नहीं है। प्रदेश में साम्प्रदायिक सदभाव का माहौल किसी भी कीमत पर बिगाड़ने की अनुमति किसी को भी नहीं दी जायेगी, चाहें वह मोदी ही क्यों न हों। वैसे, भाजपा को भी सरकार की मंशा का पता चल गया है। वह बदले हालात में नई रणनीति बना रहे हैं।कहा जा रहा है कि अगर सरकार ने मोदी की रैलियों की अनुमति नहीं दी तो मोदी रैली वाले जिलों में अपने कार्यकर्ताओं के साथ पदयात्रा प्रारंभ करेंगे।
उत्तर प्रदेश के जो हालात राजनेताओं द्वारा राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिये बनाये जा रहे हैं,वह इस बात के संकेत हैं कि चुनावी मौसम में नेताओं को प्रदेश का अमन-चैन रास नहीं आता है। आज प्रदेश फिर उसी मुहाने पर खड़ा है,जहां नब्बे के दशक में अयोध्या विवाद के चलते खड़ा था। उस समय के नेताओं की तीखी बयानबाजी का ही परिणाम था जो विवादित ढ़ाचा गिरा दिया गया। तब भी हमारे नेताओं ने हिन्दू-मुसलामानों के बीच खाई बढ़ाने का काम किया था और आज भी यही हो रहा है। बस चेहरे बदल गये हैं। तब भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, उमा भारती, राजनाथ सिंह, विजय राजे सिंधिया, विनय कटियार, मौनी बाबा के नाम से सुर्खियों में रहने वाले कांग्रेस नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव,समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव, बेनी प्रसाद वर्मा, जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह आदि का नाम लिया जाता था तो अब उनकी जगह नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, अखिलेश यादव, आजम खॉ, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आदि ने ले ली है।कोई हिन्दुओं का मसीहा बनने को बेताब है तो किसी को मुस्लिम वोटों की चिंता है।
वोट बैंक की राजनीति सत्ता में बैठे नेता करते हैं तब स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। यहां तक कि न्यायपालिका को भी दखलंदाजी करना पड़ जाती है। जनता के हक ली लड़ाई की तरफ से जब सरकार आंख मूंद ले और न्याय के लिये लोगों को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े तो स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। तनाव के नाम पर एक वर्ग विशेष के लोगों को धार्मिक क्रिया कलाप नहीं करने दिया जाये।कहीं जाने से रोका जाये। यह सही नहीं हो सकता है। अखिलेश सरकार को समझना होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनका आदेश अंतिम नहीं माना जा सकता है।यही वजह थी कानून व्यवस्था का हवाला देकर राज्य में जगह-जगह होने वाली दुर्गा पूजा की अनुमति ने देने के मामले में हाईकोर्ट को यूपी सरकार को आईना दिखाना पड़ गया।अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि देश में प्रजातंत्र है और शासन भी संविधान के दायरे में चलाया जाता है। नागरिकों को धार्मिक क्रियाकलापों से रोका नहीं जा सकता है।इसके साथ ही न्यायमूर्ति डीपी सिंह और न्यायमूर्ति अशोक पाल सिंह की पीठ ने 25 सितंबर 13 को दिये अपने आदेश में सभी जिलों के आला अफसरों को निर्देश दिये कि नवरात्रि के मद्देनजर जहां भी देवी की मूर्तियां स्थापित की जायें, वहां प्रशासन कानून और व्यवस्था का चाक चौबंद इंतजाम करे। इस आदेश का अक्षरशः पालन करने का आदेश दिया गया है।उसने जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों के ऊपर अपने आदेश की व्यक्तिगत जिम्मेदारी डाली। सरकार की मजबूरी यह है कि उसे अपने पक्ष की बातों के अलावा कुछ दिखाई और सुनाई नहीं देता है।यहां तक की वह न्यायपालिका को भी तब तक ठेंगा दिखाती रहती है जब तक अदालत गंभीर रूख नहीं अपनाती है। तनाव की बात करने वाली सरकार ने कभी इस बात की कोशिश नहीं की कि प्रतिबंधित समय में रोक के बाबजूद मजहबी-धार्मिक स्थलों पर ऊंची आवाज में लाउडस्पीकर क्यों बचते रहते हैं। धर्म की आड़ में कैसे सरकारी और नजूल की जमीन पर बड़ी-बड़ी मस्जिदे और मंदिर बन जाते हैं।
सरकार की हठधर्मी का ही नतीजा है कि दंगों में सपा सरकार के कैबिनेट मंत्री आजम खॉ की भूमिका की जांच के लिये बनी सर्वदलीय जांच कमेटी (स्पेशल इन्वेस्टीगेशन सेल) काम शुरू करने से पहले ही विवादों में घिर गयी। भाजपा ने कमेटी से अपने आप को अलग कर लिया है। उसका कहना है जब तब आजम खॉ मंत्री बने बैठे हैं तब तक जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा को विरोध का मौका सपा सरकार ने ही दिया। दरअसल सेल के गठन के 24 घंटे के भीतर ही एसपी विशेष जांच सेल कैलाश नाथ मिश्र को चलता कर दिया गया। उनके स्थान पर सेल की प्रभारी मुजफ्फरनगर की एसपी क्राइम कल्पना सक्सेना बना दी गईं, लेकिन सरकार ने यह बताना जरूरी नहीं समझा कि श्री मिश्र को बिना किसी वजह के जांच से क्यों हटा दिया गया। कहा जा रहा है कि बात-बात पर नाराज हो जाने वाले मंत्री फिर कहीं न रूठ जायें, इसीलिये उनकी तरफ से मिश्रा जी को लेकर गलत संकेत मिलते ही मिश्रा जी की छुट्टी कर दी गई थी। ऐसा लगता है सरकार फूट डालों और राज करों की नीति से फायदा उठाने के लिये ही भाजपा के ऊपर ज्यादा हमलावार होने का नाटक कर रही है। उसे पता है कि वोटों का धु्रवीकरण तो ऐसे ही होगा।
लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.





