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अमेरिकी युवा कागज पर छपा अखबार नहीं पढ़ रहा, वह नेट पर गूगल समाचार में एक ही जगह कई अखबारों की सुर्खियां देख ले रहा

हिंदी दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस द्वारा हर महीने आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की आठवीं कड़ी में आज श्रोताओं को संबोधित करते हुए चर्चित स्तंभकार और मीडिया अकादमिक आनंद प्रधान ने कहा कि सन 1977 के बाद के दौर में आए बदलावों ने मुख्यधारा की पत्रकारिता की भाषा, मुहावरा, तेवर आदि को बदल कर रख दिया। इस धारा को रविवार, जनसत्ता जैसे पत्रों ने और राजेन्द्र माथुर, एसपी सिंह आदि की पत्रकारिता ने एक मुकाम तक पहुंचाया। 1974 आंदोलन में बहुतेरे युवाओं ने वाम आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक, इसमें शिरकत की। पंकज सिंह भी उसी दौर के हैं। तब बीबीसी किसी भी अखबार से ज्यादा लोकप्रिय था।

हिंदी दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस द्वारा हर महीने आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की आठवीं कड़ी में आज श्रोताओं को संबोधित करते हुए चर्चित स्तंभकार और मीडिया अकादमिक आनंद प्रधान ने कहा कि सन 1977 के बाद के दौर में आए बदलावों ने मुख्यधारा की पत्रकारिता की भाषा, मुहावरा, तेवर आदि को बदल कर रख दिया। इस धारा को रविवार, जनसत्ता जैसे पत्रों ने और राजेन्द्र माथुर, एसपी सिंह आदि की पत्रकारिता ने एक मुकाम तक पहुंचाया। 1974 आंदोलन में बहुतेरे युवाओं ने वाम आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक, इसमें शिरकत की। पंकज सिंह भी उसी दौर के हैं। तब बीबीसी किसी भी अखबार से ज्यादा लोकप्रिय था।

छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आने के आरंभिक दौर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय एक ओर रामजन्मभूमि आंदोलन था तो दूसरी ओर गंगा जमुनी तहजीब का दबाव था। नजीर को पढ़ते हुए हमलोग बड़े हुए थे। उस समय छात्र राजनीति का मतलब बाहुबल से था तो हमने सोचा कि उसे चुनौती देनी चाहिए ओर इसी प्रक्रिया में हम क्रांतिकारी राजनीति के करीब आए। हमने एक ऐक्टिविस्ट की तरह राजनीति को एक कार्यभार की तरह लिया। तब थोड़ी पढ़ाई और ज्यादा राजनीति करते हुए, धर्म और जाति की गोलबंदी को नकारते हुए हमने नया प्रयोग किया और 1992के बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद छात्रसंघों में राजनीति के सांप्रदायिक मॉडल को किनारे किया। फिर मैं सरकारी नौकरी में दिल्ली आ गया जिसे साथियों ने पलायन माना। उनका मानना एक हद तक सही भी था।

हाल ही में अमेरिका से लौटे श्री प्रधान ने आज की पत्रकारिता के सवालों पर बोलते हुए कहा कि आज अमेरिका में चल रही बहसों में दो ही मुद्दे हैं। एक तो यह कि आज के इस इंटरनेट, टेबलेट, स्मार्टफोन आदि के दौर में अखबारों का क्या भविष्य है। आज अमेरिका का युवा कागज पर छपा अखबार नहीं पढ़ रहा। अखबार की जगह वह नेट पर गूगल समाचार में एक ही जगह तमाम अखबारों की सुर्खियां देख ले रहा है। आज गूगल समाचार के कारण योरप में और अमेरिका में अखबारों की प्रसार संख्या और राजस्व दोनों गिर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया अकादमिक प्रो फिलिप ने अखबारों के पतन का हिसाब करते हुए लिखा है कि अगर ऐसा ही रहा तो अप्रैल 2040 में अमेरिका में आखिरी अखबार छपेगा। यहीं यह सवाल भी उठता है कि नेट पर जो अखबार हैं वे तो मुफ्त हैं। फिर उनका रेवेन्यू मॉडल क्या होगा।

उन्होंने बताया कि अमेरिका का सर्वाधिक प्रतिष्ठित अखबार वाशिंगटन पोस्ट बिक गया जिसे आमेजन डॉट काम ने खरीद लिया और न्यूयार्क टाइम्स कर्ज में डूबा है। साप्ताहिक पत्रिका न्यूजवीक का प्रिंट संस्करण बंद हो चुका है और वह अब केवल आनलाइन रह गयी है। ऐसे में सवाल है कि अखबारों के बिना पत्रकारिता का क्या होगा। अखबार ही नहीं, टेलिविजन न्यूज के भी दर्शक गिर रहे हैं। बस इंटरनेट बढ़ रहा है।

श्री प्रधान ने कहा कि अमेरिका में आज दूसरी बहस यह है कि पत्रकार कौन है! एडवर्ड स्रोडन, राबर्ट मैनी , जूलियन असांजे आदि के खुलासों के बाद पत्रकार की परिभाषा बदली है। इस संदर्भ में देखें तो अब सिटीजन जर्नलिज्म का जमाना है। आज हर आदमी पत्रकार है। ब्लॉगिंग, फेसबुक आदि के प्रसार के बाद आज हर नागरिक एक पत्रकार की भूमिका में है। यह क्राउड सोर्स का समय है। हमारे पाठक हमारे पत्रकार भी हैं और आज की पत्रकारिता का भविष्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने में है।

पत्रकारिता के भविष्य की बात करते श्री प्रधान ने कहा कि पत्रकारिता के भविष्य बड़े अखबार नहीं बना सकते। वे उसे खत्म कर रहे हैं। छोटे अखबार ही पत्रकारिता का भविष्य हैं। पत्रकारिता की आर्थर मिलर की परिभाषा को उद्धृत करते उन्होंने कहा कि – पत्रकारिता वह है जिसमें देश खुद से बातें करता दिखाई दे। भारतीय समाज की विविधता को अखबार में जगह मिलनी चाहिए। संसद में बात नहीं हो रही तो अखबार के पन्नों पर बातें होनी चाहिए। पत्रकारिता पर पूंजी के असर की बात करते उन्होंने कहा कि दिल्ली के दो सबसे बड़े अखबारों को लें तो उनमें वैसे ही आपस में कोई फर्क नहीं है, जैसे कोका कोला और पेप्सी में कोई फर्क नहीं है- बैनर के सिवा। विविधता और बहुलता को लोकतंत्र की ताकत बताते हुए उन्होंने कहा, जितने ज्यादा अखबार होंगे उतना अच्छा होगा। मीडिया में एकाधिकार की प्रवृत्ति बढ़ रही है उससे लड़ना होगा।

एक पत्रकार के धर्म के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि आरामतलब को कोंचना और चोटिल को आराम देना ही पत्रकारिता का धर्म है। जिस सरोकारी पत्रकारिता के स्कूल से पंकज सिंह आए हैं वही पत्रकारिता का भविष्य है, मनोरंजन की पत्रकारिता के कोई माने नहीं।  आज खबरों की विश्वसनीयता घटी है। इसे बचाना होगा।

अंत में पत्रकारिता के सरोकारों पर बात करते हुए कल्पतरु एक्सप्रेस के समूह संपादक पंकज सिंह ने कहा कि यह अभूतपूर्व संकटों का दौर है। मनुष्यता ने मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के खिलाफ ऐसे षडयंत्र पहले कभी नहीं देखे थे। आज हमारे मानकों, मूल्यों और दृष्टि पर ही खतरा मंडरा रहा है। आज वह मन गायब होता जा रहा है जो बच्चे को आह्लाद की प्रगाढ़ता में चूमता था। हम सब का संघर्ष शुभ, सुन्दर और मानवीय तत्वों को बचाने का है। आनन्द प्रधान ने मीडिया के सन्दर्भ में जिन आदर्शों और कर्तव्यों की चर्चा की है उनके केन्द्र में वही मानवीय तत्व हैं जिसके बारे में बंगाल के महान संतकवि चण्डीदास ने कहा था, ‘शुनु शुनु रे मानुष भाई, सबार ऊपरे मानुष सत्य, तार ऊपरे नाई।’

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