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शैलेन्द्र मणि के दैनिक जागरण छोड़ने से अमर उजाला को होगा फ़ायदा!

दैनिक जागरण के लिए अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा समर्पित कर चुके शैलेन्द्र मणि से "दबाव का इस्तीफा" दिलवाया चुका है. एक तरफ जहां शैलेन्द्र मणि के जाने से गोरखपुर मीडिया जगत में हलचल है वहीं दूसरी तरफ बाकी अखबार सही मौक़ा पाकर दैनिक जागरण को गोरखपुर से विदा करने का मन बना लिए हैं और इसके लिए तमाम अखबारों ने अंदरूनी तौर पर दिन रात एक कर दिया है. गोरखपुर क्षेत्र से होने के नाते मैं इतना तो कह सकता हूँ कि शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी गोरखपुर मीडिया जगत के सबसे चर्चित और सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं जिन्हें लोग प्रिंट मीडिया के शैशवावस्था से देखते और पढ़ते आये हैं.

दैनिक जागरण के लिए अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा समर्पित कर चुके शैलेन्द्र मणि से "दबाव का इस्तीफा" दिलवाया चुका है. एक तरफ जहां शैलेन्द्र मणि के जाने से गोरखपुर मीडिया जगत में हलचल है वहीं दूसरी तरफ बाकी अखबार सही मौक़ा पाकर दैनिक जागरण को गोरखपुर से विदा करने का मन बना लिए हैं और इसके लिए तमाम अखबारों ने अंदरूनी तौर पर दिन रात एक कर दिया है. गोरखपुर क्षेत्र से होने के नाते मैं इतना तो कह सकता हूँ कि शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी गोरखपुर मीडिया जगत के सबसे चर्चित और सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं जिन्हें लोग प्रिंट मीडिया के शैशवावस्था से देखते और पढ़ते आये हैं.

दैनिक जागरण को गोरखपुर में फर्श से अर्श तक पहुचाने में शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी का अहम ही नहीं शायद संवेगात्मक योगदान भी है. कारण भले ही आंतरिक प्रतिस्पर्धा और चाटुकारिता हो, कहीं ना कहीं यह इस्तीफा दैनिक जागरण को महँगा पड़ सकता है. खबर है कि अपनी जान-पहचान, व्यक्तित्व और अनुभव के बूते शैलेन्द्र मणि जनसंदेश टाइम्स को लाने का जो बीड़ा उठाये हैं वो भले ही दैनिक जागरण का कुछ ज्यादा नुकसान ना करे लेकिन कारपोरेट मीडिया की व्यापारिक अवसरवादिता के चंगुल से दैनिक जागरण का बचना लगभग नामुमकिन होगा. गोरखपुर में दैनिक जागरण के बाद अमर उजाला ने ही सबसे तेज़ प्रसार किया एवं अपनी योजनागत खबरों के चलते द्वितीय वरीयता का अखबार भी बन चुका है. अत: एक बात तो तय है कि दैनिक जागरण के दुर्दिन में अमर उजाला भी ठीक उतना ही दैनिक जागरण को उखाड़ने की कवायद करेगा जितना शैलेन्द्र मणि जनसंदेश के लिए एवं व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए करेंगे.

गोरखपुर से ही एक पत्रकार मित्र ने फोन पर कहा कि जिस तरह से शैलेन्द्र मणि के लिए खेमेबन्दी हो रही है, देखते रहिये जागरण को पूरे मंडल में एक प्रतिनिधि मिलना मुश्किल हो जाएगा. अपने अनुभव के आधार पर अगर मैं कहूँ तो यह कुछ हद तक तक सही भी है. अमर उजाला वैसे भी दैनिक जागरण के साथ हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा में है. अब जब जागरण का क्षेत्रीय जनाधार कम होता दिख रहा है तो अमर उजाला के प्रबंधकों के चार नए पर उग आये हैं और सही मौके पर वह जागरण का सर्कुलेशन जरूर गिराएगा या गिरा रहा है. सूत्रों की मानें तो लगभग तीस से चालीस पत्रकार जो दैनिक जागरण के लिए कभी वफादार थे अब अंदरूनी तौर पर  इसे अलविदा कहने की तैयारी में हैं.

हालांकि शैलेन्द्र मणि के इस्तीफे और दैनिक जागरण में हो रही खेमाबन्दी ने सभी अखबारों को एक मौक़ा जरूर दिया है कि वो दैनिक जागरण को उबरने ना दे और अपना बाज़ार बढाये.  यह तय है कि अगर दैनिक जागरण पहले से मौजूद क्षेत्रीय पत्रकारों को संभालने और लामबंदी से रोकने में असफल रहता है तो नए चेहरों के बूते उसका इस संकट से उबरना ख्वाब का ख्वाब रह जाएगा. ग्रामीण क्षेत्रों में अखबार खबर की गुणवत्ता पर ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के अपने प्रचार प्रसार के आधार पर बिकते और बदलते हैं. ऐसी स्थिति में अगर कुछ महत्वपूर्ण लोग जागरण से मुंह मोड़ लेते हैं तो शायद जागरण की मुश्किलें ख़त्म होनी मुश्किल है.

जनसंदेश लांच होने के साथ चेहरा काफी हद तक साफ़ हो जाएगा कि कौन किसके साथ है मगर यह खबर भी निराधार नही है कि अभी भी दैनिक जागरण में शैलेन्द्र मणि समर्थक हैं जो दैनिक जागरण में रह कर उसका सूपड़ा साफ़ करने के इन्तजाम पुख्ता कर रहे हैं और कभी भी जनसंदेश ज्वाइन कर सकते हैं. खबर यहाँ तक है कि जागरण से शैलेन्द्र मणि का इस्तीफा वहां की सक्रिय जनता को भी हज़म नही हो रहा और वे इसे "जागरण की साजिश" के तौर पर देख रहे हैं. खैर मेरी तो शुभकामना दैनिक जागरण के साथ है, मगर लग नहीं रहा कि ये शुभकामना भी बहुत काम करेगी. भगवान करें दैनिक जागरण सही सलामत बना रहे क्योंकि मेरा प्रिय अखबार है यह. 

शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

पत्रकार एवं सोशल एक्टिविस्ट

[email protected]

09716248802

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