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दयानंद पांडेय, कौन कुमति तोहे लागे

: ‘जाति न पूछो साधु के बरक्स आलोचना के लोचन का संकट ऊर्फ वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना’ के प्रतिवाद में : देश के बड़े साहित्यिक सम्मानों को पाने वालों में बाह्मण व द्विज ही कब्जा जमाये हुए है। ज्ञानपीठ सम्मान(हिन्दी) और साहित्य अकादमी सम्मान(हिन्दी) पाने वालों के नाम की सूची से खुलासा होता है कि साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार पाने वालों में द्विज शिखर पर हैं और दलित-पिछड़े हाशिये पर। 1968 से 2009 तक ज्ञानपीठ सम्मान(हिन्दी) पाने वालों में एक भी दलित-पिछड़ा नहीं है। सम्मान पाने वालों में चार बाह्मण, एक भूमिहार बाह्मण और चार द्विज है।

: ‘जाति न पूछो साधु के बरक्स आलोचना के लोचन का संकट ऊर्फ वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना’ के प्रतिवाद में : देश के बड़े साहित्यिक सम्मानों को पाने वालों में बाह्मण व द्विज ही कब्जा जमाये हुए है। ज्ञानपीठ सम्मान(हिन्दी) और साहित्य अकादमी सम्मान(हिन्दी) पाने वालों के नाम की सूची से खुलासा होता है कि साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार पाने वालों में द्विज शिखर पर हैं और दलित-पिछड़े हाशिये पर। 1968 से 2009 तक ज्ञानपीठ सम्मान(हिन्दी) पाने वालों में एक भी दलित-पिछड़ा नहीं है। सम्मान पाने वालों में चार बाह्मण, एक भूमिहार बाह्मण और चार द्विज है।

साहित्य अकादमी सम्मान(हिन्दी) का भी वही हाल है यहां भी दलित-पिछड़े नदारत हैं। 1955 से 2011 तक की सूची पर नजर डालने से पता चलता है कि, 24 बाह्मण और 31 अन्य द्विज/वैश्य है। इनमें मात्र एक जाट है।(देखें-फारवर्ड पे्रस, अप्रैल 2012 का अंक,‘द्विजों में ही होती है साहित्यिक प्रतिभा?)। इन सबके बावजूद भूले-भटके कभी पिछड़ों-दलितों को उचित सम्मान मिलता है तब इन्हीं पुरस्कार पाने वाले द्विजों को यहाँ जातिवाद दिखने लगता है।

जाति आखिर जाति नहीं! सच है। एक लेखक-पत्रकार हैं दयानंद पाण्डेय। इनका प्रोफाइल देखकर छोटा-मोटा पत्रकार-लेखक बेचारा डर जायेगा। इन दिनों वे चर्चे में हैं। वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव को पुरस्कार मिलने पर, पाण्डेय जी ने वीरेन्द्र यादव के जातिवादी होने को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल खड़े कर दिये। पिछड़े-दलित के बीच द्विज का वाद सामने आ ही गया। यह सब तब हुआ जब पिछले दिनों दयानंद पाण्डेय ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रो0 चौथीराम यादव और आलोचक वीरेंद्र यादव को पुरस्कृत किए जाने पर फेसबुक पर टिप्पणी लगा दी, ‘‘अब की बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों के लिए एक योग्यता यादव होना भी निर्धारित की गई थी। रचना नहीं तो क्या यादव तो हैं, ऐसा अब भी कहा जा रहा है‘‘। समझ में नहीं आता कि सदियों से हर क्षेत्र में कब्जा जमाये द्विजों को पिछड़े-दलितों का आगे आना पचता क्यों नहीं है।

इस पर वीरेन्द्र यादव का कमेंट आया, दयानंद जी खोजी पत्रकार हैं। दरअसल हिन्दी संस्थान के इतिहास में अब तक द्विज लेखक ही पुरस्कृत होते रहे हैं। शूद्र और दलित लेखक उस सूची से हमेशा नदारद रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि राजेंद्र यादव तक इसमें शामिल नहीं किये गए हैं। यह मुद्दा विचारणीय है कि आखिर क्यों, पिछले वर्षों में किसी शूद्र, दलित या मुस्लिम को हिन्दी संस्थान के उच्च पुरस्कारों से नहीं सम्मानित किया गया। क्या राही मासूम रजा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिलाह इसके योग्य नहीं थे/हैं। ओम प्रकाश बाल्मीकि एकमात्र अपवाद हैं वह भी मायावती शासन काल में। जिस संस्थान में पुरस्कारों के लिए एकमात्र अर्हता द्विज होना हो वहां यदि 112 लेखकों में दो शूद्र पृष्ठभूमि के लेखकों को सम्मानित किया जाता है तो जरूर उसके इतर कारण होंगे और दयानंद पांडे के अनुसार वह यादव होने की शर्त है। वैसे दयानंद पाण्डेय स्वयं इस बार पुरस्कृत हुए हैं इसके पूर्व भी दो बार हिन्दी संस्थान से पुरस्कृत हो चुके हैं। और इस बार भी अन्य खोजी पत्रकारों की सूचना के अनुसार उनके लिए उस (साहित्य भूषण ) संस्थान के लिए एक दर्जन से अधिक संस्तुतियां थी जिसकी उम्र की अर्हता साठ वर्ष है जो उनकी नहीं है। जाहिर है सुयोग्य लेखक हैं अर्हता न होने पर भी संस्तुतियां हो ही सकती हैं। संजीव, शिवमूर्ति जैसे शूद्र पृष्ठभूमि के लेखक अयोग्य न होते तो उनकी संस्तुतियां क्यों न होती ? जिन शूद्र पृष्ठभूमि के लेखकों को मिल गया उनकी रचना भी कैसे हो सकती है। क्योंकि इसका अधिकार तो द्विज को ही है। यह सब लिखना मेरे लिए अशोभनीय है लेकिन दुष्प्रचार की भी हद होती है !

वीरेन्द्र यादव के जवाब पर दयानंद पाण्डेय बौखला गये। उनके अंदर का सामंत/द्विज सामने आया और लिख मारा, यह टिप्पणी मैंने फेसबुक पर चुहल में लगाई थी। वाह! दयानंद पाण्डेय जी क्या बात है। इतने बड़े पत्रकार-लेखक और उपर से चुहल ? इतना ही नहीं बौखलाये दयानंद पाण्डेय पत्रकार-लेखक धर्म को दरकिनार कर दिया और अपने द्विज होने का प्रमाण देते हुए वीरेन्द्र यादव पर शब्दों से हमला बोला। यह हमला अपने सरोकारनामा ब्लाग पर,‘‘जाति न पूछो साधु के बरक्स आलोचना के लोचन का संकट ऊर्फ वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना ! ’’शीर्षक से किया।

सवाल पुरस्कार को लेकर उठा। वह पुरस्कार, जो खुद दयानंद पाण्डेय ले चुके हैं। दयानंद पाण्डेय के जवाब का लबोलुआब यह है कि वीरेंद्र यादव, यादव है और वे दलित-पिछड़ों के जो सरकोर की बात करते हैं वह जातिवादी है। भले ही दयानंद पाण्डेय ने दर्जनों पुस्तके लिख मारी हो उनका, जाति न पूछो साधु के…… पढ़ने से साफ लगता है कि वे उपर से प्रगतिशील आदि …आदि हैं, लेकिन अंदर से (जैसा कि द्विजवादी होते हैं) घोर जातिवादी है। उनकी टिप्पणी उनके दिमागी दिवालयेपन और जातिपरक ब्राह्मणवादी संकुचित सोच का सूचक प्रतीत होता है। तभी तो भगवान स्वरूप कटियार फेसबुक पर लिखते हैं, पिछले दिनों दयानंद पाण्डेय ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रो0चैथीराम यादव और आलोचक वीरेंद्र यादव को पुरस्कृत किए जाने पर जो भोड़ी और हल्की टिपण्णी की है वह न सिर्फ आपत्तिजनक है बल्कि दयानंद पाण्डेय के दिमागी दिवालयेपन और जातिपरक ब्राह्मणवादी संकुचित सोच का सूचक भी है। यह भला कौन कह सकता है की ये दोनों विद्वान लेखक, दिए गए पुरस्कार के योग्य पात्र नहीं हैं। इन दोनों लेखकों का अपने क्षेत्र में बृहद काम है। अखिलेश सरकार ने इन्हें पुरस्कृत कर कोई एहसान नहीं किया बल्कि एक सही फैसला लिया, जिसे पिछली सरकारों ने पक्षपात करते हुए नहीं लिया। दयानंद जी की टिपण्णी से लगता है कि वे कहना चाहते हैं ये पुरस्कार उन्हें यादव होने के कारण दिये गये और उन्होंने अहीर जाति पर जो मुहवारात्मक टिपण्णी की वह तो निहायत गिरे स्तर की हरकत है और उनके एक लेखक होने के संस्कार पर सवाल खड़ा करती है। अगर इन पुरस्कारों का पोस्टमार्टम किया जाय तो अनेक ऐसे नाम मिल जायेंगे जिन्होंने सिर्फ मैनेज करके पुरस्कार हासिल किये पर पाण्डेय जी उन्हें बख्श देते हैं और वीरेन्द्र यादव और चैथी राम यादव पर हमला करते हैं। वीरेंद्र यादव, रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह को पूरी इज्जत बख्शते हुए और उनके साहित्यिक अवदान को पूरा महत्व देते हुए सामाजिक न्याय और दलित विमर्श को लेकर उनके दृष्टिकोण की निर्मम और निर्भीक आलोचना करने से नहीं चूकते। यही निर्भीकता और निष्पक्षता उनकी खाशियत है जो उन्हें बड़ा आलोचक बनाने के साथ साथ उन्हें बड़ा और भला आदमी भी बनाती है। प्रतिवाद किया जाना चाहिए, यही सोच कर यह टिपण्णी की ताकि लोग गलत को सही न मान बैठें। फिर सोच अपना-अपना और नजरिया भी अपना-अपना।

भगवान स्वरूप कटियार की बातों में दम है। सवाल उठता है कि अगर अखिलेश सरकार ने यादव जाति के लेखकों को पुरस्कार दे ही दिया तो कौन सा अपराध हो गया। जो दयान्द पाण्डेय ने बवाल खड़ा कर दिया। सदियों से द्विजों की ओर से मैनेज हो रहे पुरस्कारों पर तो पाण्डेय जी की दहाड़ सुनने को नहीं मिली। जब बिहार सरकार के राजभाषा सम्मान आलोचक नामवर सिंह ने अपने भाई को दिलवा दिया तब तो पाण्डेय जी चुप्प रहे। कहीं यह उनका द्विज पे्रम तो नहीं। पूर्व की मायावती सरकार ने दलितों-पिछड़ों को पुरस्कृत न कर भूल की थी। क्योंकि देश में कई दलित साहित्यकार हैं जिनके योग्यदान को नकारा नहीं जा सकता है। ऐसे में अखिलेश सरकार ने जो किया वह एक अच्छा कदम है।

प्रो0चौथीराम यादव और आलोचक वीरेंद्र यादव किसी परिचय के मोहताज नहीं है। दयानंद पाण्डेय ने उनकी योग्यता को जाति से जोड़ कर देखा। अक्सर द्विजवादी ऐसा करते हैं। साहित्य हो या मीडिया, दलित-पिछडे की भागीदारी के सवाल को लेकर जब-जब सवाल उठता है तब-जब दयानंद पाण्डेय जैसे द्विज योग्यता को लेकर सवाल खड़े करते हैं? उन्हें अयोग्य द्विज नहीं दिखता ? प्रो.चौथी राम यादव को दयानंद पाण्डेय कुंजी लेखक बताते हैं। वहीं संस्थान ने डॉ सरला शुक्ला और डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित को पुरस्कृत किया जिनकी एकमात्र योग्यता हिन्दी आध्यापक और द्विज है। ऐसे में दयानंद पाण्डेय की न्याय चेतना कहाँ सो रही थी? दयानन्द पाण्डेय ने मधुकर सिंह के मसले और अपने रचनाकर्म की चर्चा कर अपने को दलित-पिछड़ों का रहनुमा बनने की कोशिश की है। शायद पाण्डेय जी को पता नहीं कि मधुकर सिंह को सम्मान किसने किया? वे लगातार दलित-पिछड़ों के सरोकारों को लेकर लिखते रहे। द्विजवादियों ने उनके नामों की अनुशंसा करने की जहमत तक नहीं उठायी ? वरना उन्हें भी बड़ा सम्मान मिलता। फारवर्ड पे्रस ने अप्रैल 2012 के अंक में, ‘द्विजों में ही होती है साहित्यिक प्रतिभा? के तहत सूची जारी की है। सूची से खुलासा होता है कि साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार पाने वालों में द्विज शिखर पर हैं और दलित-पिछडें हाशिये पर।

आश्चर्य की बात यह है कि वीरेन्द्र यादव पर हुए हमले को लेकर देश के लेखक संघों के बीच खामोशी है! कोई प्रतिक्रिया नहीं। देखा जाये तो सभी लेखक संघ कहीं न कहीं से ब्रहामणवादी सोच के दायरे में है? पुरस्कार की राजनीति और रचनाओं के प्रकाशन की राजनीति बखूबी सभी लेखक व संध और दयानन्द पाण्डेय सरीखे लेखक भी जानते/करते हैं? जहाँ तक जाति का सवाल है तो दयानन्द पाण्डेय जी से एक सवाल है क्या आपने अपनी जाति छोड़ दी है? चलिये जवाब मैं ही दे देता हूं, नहीं। उनके नाम के पीछे पाण्डेय लगा हुआ है। दयानंद पाण्डेय जी क्या यह सवाल उठायेंगे कि देश में अब तक के जो भी सम्मान दिये गये हैं उनका सर्वे कराया जाये कि किस-किस जाति के लोगों को सम्मान मिला है और उनके सम्मान के लिए किस जाति के लोगों ने अनुशंसा किया था। खेमें में बंटे साहित्कार व लेखक संघ जाति के सवाल पर खामोश रहते हैं। कोई सामने आकर बोलना नहीं चाहता है।

लेखक संजय कुमार बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े हैं. उनसे संपर्क 09934293148 के जरिए किया जा सकता है.


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