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जब रावण के साथ हुई बदमाशी

पिछली बार जब मैंने ब्लॉग लिखा तो मुझे एक ईमेल मिला। यह ईमेल लंदन से था। एक पाठक ने मुझसे पूछा कि ‘समझदारों का पागलखाना’ वाले लेख के पात्र क्या सचमुच इसी दुनिया के हैं। कुछ लोगों को लगता है कि इतने मजेदार लोग इस दुनिया में कैसे हो सकते हैं? वास्तव में मेरे सभी पात्र इसी दुनिया के हैं। दरअसल हमारी दुनिया जितनी साफ दिखाई देती है, यह उतनी ही रहस्यों से भी भरी हुई है। आप किसी भी वस्तु के अस्तित्व पर गौर कर उससे जुड़े रहस्य को महसूस कर सकते हैं। अगर न मानें तो हर कोई साधारण और मानें तो हर चीज जादुई। जादू मुझे बचपन से ही पसंद है। अगर आज के जमाने में कहीं जादू की छड़ी काम करती तो मैं एक रहस्य का पर्दाफाश करता, जो आज तक रहस्य ही बना हुआ है।

पिछली बार जब मैंने ब्लॉग लिखा तो मुझे एक ईमेल मिला। यह ईमेल लंदन से था। एक पाठक ने मुझसे पूछा कि ‘समझदारों का पागलखाना’ वाले लेख के पात्र क्या सचमुच इसी दुनिया के हैं। कुछ लोगों को लगता है कि इतने मजेदार लोग इस दुनिया में कैसे हो सकते हैं? वास्तव में मेरे सभी पात्र इसी दुनिया के हैं। दरअसल हमारी दुनिया जितनी साफ दिखाई देती है, यह उतनी ही रहस्यों से भी भरी हुई है। आप किसी भी वस्तु के अस्तित्व पर गौर कर उससे जुड़े रहस्य को महसूस कर सकते हैं। अगर न मानें तो हर कोई साधारण और मानें तो हर चीज जादुई। जादू मुझे बचपन से ही पसंद है। अगर आज के जमाने में कहीं जादू की छड़ी काम करती तो मैं एक रहस्य का पर्दाफाश करता, जो आज तक रहस्य ही बना हुआ है।

यह बात दशहरे से जुड़ी हुई है। रावण दहन करने के लिए हमने तीन दिन पहले ही तैयारियां शुरू कर दीं। पुराने अखबार, चप्पलें और कटाई के बाद बचा सूखा घास रावण बनाने के काम आया। फिर पटाखों की बारी आई। रावण के पेट में ढेर सारे रॉकेट, पटाखे और फुलझड़ियां लगाई गईं। तैयारी पूरी होने के बाद रावण को चौपाल पर खड़ा किया गया। बाकी सब ठीक था, लेकिन रावण का पेट और सिर जरूरत से ज्यादा मोटे बन गए। वहीं पैरों की मजबूती की ओर हमने ध्यान नहीं दिया, इसलिए वे कमजोर और पतले रह गए। पहली ही नजर में वह डरावना कम, हास्यास्पद ज्यादा लगता था। हमें इन सब बातों की ज्यादा परवाह नहीं थी। सबको रात होने का बेसब्री से इंतजार था।

शाम ढलने के बाद अंधेरा होने लगा। तभी अप्रत्याशित रूप से एक समस्या उत्पन्न हो गई। दिक्कत यह थी कि रावण का दहन कौन करे? यहां राम बनने के लिए हर कोई तैयार था और रावण बेचारा एक!! समस्या गंभीर थी। अंधेरा गहरा होने लगा। मुहूर्त्त सामने था। राम बनने की माथापच्ची में आधा घंटे से ज्यादा वक्त बीत गया। आखिरकार तय हुआ कि इसके लिए टॉस किया जाएगा, लेकिन किसी के पास सिक्का नहीं था। दो-तीन लोगों के पास नोट जरूर थे। उनसे टॉस नहीं हो सकता था। तब सभी नजदीक ही मेरे एक दोस्त के घर गए। वहां दो लोगों के नाम पर सहमति बनी और सिक्का उछाला गया। इसमें मेरे चाचा विजयी हुए। उत्साहित भीड़ ने नारे, सीटी और शोर से माहौल जोशीला बना दिया।

तुरंत धनुष-बाण और केरोसीन का इंतजाम किया गया। तीर पर आग लगाकर मेरे चाचा रावण दहन के लिए रवाना हुए, लेकिन यह क्या!! रावण तो जल रहा था। उसके पेट में लगाई फुलझड़ियां रंगीन रोशनी कर रही थीं। चाचा के पहुंचने से पहले ही किसी ने रावण को आग के हवाले कर दिया। चाचा का धनुष किसी काम न आया। मालूम हुआ कि जब हम टॉस करने में व्यस्त थे, तभी किसी ने मौके का फायदा उठाकर रावण दहन कर दिया। इस दौरान गुस्साए चाचा धनुष फेंक कर चले गए और उस शैतान को पकड़ने का संकल्प लिया जिसने इस पूरी बदमाशी को अंजाम दिया था। अगले दिन पूछताछ हुई, कसमें दिलाईं, लेकिन अपराधी पकड़ में न आया। इस घटना के बाद कई दशहरे आए और चले गए, फिर भी उस खुराफाती का भंडाफोड़ नहीं हुआ। चाचा जी को आज भी उसका इंतजार है। यदि आपको कोई खबर मिले तो जरूर बताइए।

राजीव शर्मा

संचालक

गांव का गुरुकुल

ganvkagurukul.blogspot.com

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