'वाईब्रेंट गुजरात' के सौराष्ट्र की जसदान तहसील के कनेसरा गांव में एक नन्हा-सा दलित बालक अपनी दादी से कहता है, 'मुझे एक गिलास पानी तो दो। बहुत प्यास लगी है'। वे उत्तर देती हैं, 'तुम्हारी मां को घर आ जाने दो। वे बहुत दूर से पानी लेने गयी हैं। जब वे वापस आ जावेंगी, तब हम दोनों पानी पियेंगे'। लड़का पूछता है, 'मेरी मां को एक मटका पानी लाने के लिए इतनी दूर तक क्यों जाना पड़ता है? गांव की हौदी में तो ढेर सारा पानी है'। दादी को इस प्रश्न का उत्तर बहुत अच्छी तरह से मालूम है परन्तु वे उस छोटे-से बालक को समझा नहीं सकतीं।
यह संक्षिप्त बातचीत, गुजरात के कुछ हिस्सों में व्याप्त अस्पृश्यता की भयावहता की ओर संकेत करती है -यह वही गुजरात है जहां की नरेन्द्र मोदी सरकार बार-बार कहती है कि “आल इज वेल”।
उस छोटे से बच्चे की मां जया मकवाना, गांव से तीन किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पानी भरकर लाती है। वह कहती है, “हमारे गांव में नर्मदा का पानी पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता है परन्तु ऊंची जातियों के लोग हम लोगों को पानी नहीं लेने देते”।
जसदान तहसील के दस गांवों में लगभग ९०० दलित परिवार रहते हैं। इस क्षेत्र में कोली जाति का दबदबा है। दलित गंभीर जलसंकट से जूझ रहे हैं परन्तु इसका कारण सूखा नहीं वरन जातिगत भेदभाव है। गांव में नर्मदा का पानी आसानी से उपलब्ध है परन्तु दलितों को उस पानी के उपयोग की इजाजत नहीं है। प्रभुत्वशाली जाति के किसानों के खुद के ट्यूबवेल हैं और उन्हें उनकी आवश्यकताओं के पूर्ति के लिए नर्मदा के पानी की जरूरत नहीं पड़ती।
खडवारी गांव में हैण्डपंप है परन्तु किसी दलित को उसके इस्तेमाल की इजाजत नहीं है। दलित स्वयं को ठगा हुआ सा महसूस करते हैं क्योंकि उनके प्रयासों से ही गांव में हैण्डपंप की सुविधा उपलब्ध करवाई गई है। अपना नाम न छापने की शर्त पर गांव का एक दलित व्यक्ति कहता है, “इस गर्मी में दलित महिलाओं और बच्चों को पानी के लिए कई मील पैदल जाना पड़ता है। बाहुबली जाति के लोग हमें हैण्डपंप से पानी नहीं भरने देते। वे कहते हैं कि हम पानी तभी ले सकते हैं जब वे अपने लिए पानी भर लें”। जैसी कि अपेक्षा की जा सकती है, जिला प्रशासन दलितों के साथ किसी भी तरह के भेदभाव से इंकार करता है।
‘नवसर्जन’ व ‘राबर्ट के. केनेडी सेन्टर फार जस्टिस एण्ड
ह्यूमनराईट्स’ द्वारा तैयार की रपट ’अन्डरस्टेडिंग अनटचेबिलिटी’ (समझें अस्पृश्यता को) कहती है कि गुजरात में ९० प्रकार की अस्पृश्यताएं व्यवहार में हैं। दलितों को सार्वजनिक स्त्रोतों से पानी नहीं लेने दिया जाता, वे मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते और आज भी गुजरात में १२ हजार से अधिक लोग सिर पर मैला ढोने के काम में लगे हुये हैं। वे अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ भी नहीं सकते क्योंकि पुलिस और प्रशासन उनकी मदद नहीं करता। विरोध करने पर उनका सामाजिक बहिष्कार भी किया जाता है।
अहमदाबाद जिले की धनधूका तहसील के गलसाना गांव में रहने वाले लगभग १०० दलित परिवारों की बदहाली, राज्य में वंचित वर्गों की स्थिति को प्रतिबिंबित करती है। ऊंची जातियों के लोग उन्हें गांव के मंदिरों के प्रांगण तक में नहीं घुसने देते। इस साल फरवरी में, सुरेन्द्र नगर के मुली स्वामीनारायण मंदिर के महन्त स्वामी, स्वामी कृष्णवल्लभ ने गांव के मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलवाने की पहल की थी परन्तु उनका प्रयास सफल न हो सका। ऊंची जातियां ने ऐसा नहीं होने दिया। गलसाना गांव के दलित रहवासी सुनील परमार कहते हैं, “जिस दिन प्रवेश करवाया जाना था, उस दिन गांववालों और मंदिर के पुजारियों ने यह तय कर लिया कि मंदिर के पट खोले ही नहीं जायेंगे”।
अगर राज्य के कुछ हिस्सों में ये हालात हैं तो फिर मोदी की दलित पुजारी वाली घोषणा का क्या होगा? यहां यह उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने यह प्रस्ताव किया है कि दलितों को मंदिरों में विवाह, जन्म आदि से जुड़े कर्मकाण्ड संचालित करवाने का प्रशिक्षण दिया जाये।
सन् २०१२ में न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता में, गुजरात दौरे पर आए ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग’ के एक दल ने यह पाया कि गुजरात के ७७ गांवों के दलितों को सामाजिक बहिष्कार के चलते मजबूरी में अपने गांव से पलायन करना पड़ा है। जाने-माने गुजराती लेखक कानूभाई आचार्य कहते हैं, “यद्यपि राज्य के शहरी इलाकों में दलितों के साथ भेदभाव में कमी आई है परन्तु गांव में अब भी यह बहुत आम है। सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तरी गुजरात के गांव में छुआछूत प्रचलित है। पिछले दो सालों से कुछ दलित परिवार दीसा के मामलतदार (तालुका स्तर के भू-राजस्व अधिकारी) के कार्यालय के बाहर विरोध-स्वरुप धरना दिए हुए हैं क्योंकि उनका सामाजिक बहिष्कार कर, ऊंची जातियों के ‘दरबारों’ (अनौपचारिक अदालतों) ने उन्हें गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। आज तक उनकी आवाज नहीं सुनी गयी है”।
गुजरात के गांव में दलितों के शासनतंत्र का हिस्सा बनने का भी प्राणपन से विरोध किया जाता है। गुजरात सरकार की ‘समरस योजना’ के अन्तर्गत कमला मकवाना नामक एक दलित महिला लखवाड गांव की सरपंच चुनी गयी। परन्तु उनके पूर्ववर्ती सरपंच, जो कि स्थानीय प्रभुत्वशाली पटेल जाति के थे, ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। उनके और उनके परिवार के खिलाफ अमानत में खयानत का मुकदमा दायर कर दिया गया। उन्हें और उनके परिवार के सभी सदस्यों को जेल जाना पड़ा क्योंकि उनके पास जमानत भरने के लिए भी पैसे नहीं थे। ऐसा आरोपित है कि गांव के पूर्व सरपंच प्रहलाद पटेल और उपसरपंच रातीलाल पटेल नहीं चाहते थे कि कमला गांव की सरपंच बने। हाल में, एक एनजीओ की मदद से कमला को जमानत मिल सकी।
दलितों को न केवल परेशान किया जाता है वरन प्रभावशाली लोगों के इशारे पर उन पर शारीरिक हमले भी होते हैं। हाल में, इसी साल अप्रैल में, जूनागढ़ के मेयर को अम्बेडकर नगर में एक घर में तोड़फोड़ करने, एक दलित पर हमला करने और एक गाड़ी को आग के हवाले करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
राजनैतिक-सामाजिक स्तर पर तो दलित भेदभाव के शिकार हैं ही, पुलिस भी उन पर अत्याचार करने में पीछे नहीं है। सुरेन्द्र नगर जिले के थानगढ़ शहर में पुलिस द्वारा किया गया गोलीचालन, दलितों के विरूद्ध पुलिस के अत्याचारों का सबसे ताजा उदाहरण है। इस गोलीचालन में तीन दलित मारे गये थे, जिनमें से दो अवयस्क थे। दलित कार्यकर्ता राजू सोलंकी कहते हैं, “२३ सितम्बर २०१२ को विरोध प्रदर्शन कर रहे दलितों पर गुजरात पुलिस ने ‘कारबाईन’ से गोलियां चलाईं। उसके पहले न तो उन पर लाठीचार्ज किया गया, न पानी की फुहारें छोड़ी गयीं और ना ही आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ। “
इसी तरह की ‘कारबाईन’ का इस्तेमाल सन् २००८ में मुंबई पर हमला करने वाले कसाब व अन्य आतंकवादियों के खिलाफ किया गया था।‘क्या ये दलित आतंकवादी थे? राजू सोलंकी पूछते हैं। दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी कहते हैं, “यद्यपि राज्य के अपराध अनुसंधान विभाग ने साफ-साफ कहा है कि भीड़ हिंसक नहीं थी परन्तु फिर भी पुलिस ने उस पर गोलियां चलाईं। आज तक पुलिस ने थानगढ़ के दलितों पर लादे गये झूठे मुकदमे वापस नहीं लिये हैं। उन पर आपराधिक षडयंत्र रचने और हत्या करने आरोप लगाये गये हैं”।
दलित अधिकारों के लिए संघर्षरत ‘नवसर्जन’ नामक एनजीओ के कार्यकारी निदेशक मंजूला प्रदीप कहते हैं,‘”राजकोट और थानगढ़ की घटनाओं से यह साफ है कि जिन लोगों पर कानून लागू करने की जिम्मेदारी है, वे दलितों के प्रति गहरे पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। ऐसा लगता है कि पुलिस अपनी मनमर्जी से यह तय करती है कि वह किसकी रक्षा और मदद करेगी और किसकी नहीं”।
गुजरात में ऐसी कई घटनाएं हुईं है जिनसे ऐसे लगता है कि पुलिस जानबूझकर अन्याय के खिलाफ दलितों के संघर्ष को कुचलना चाहती है। अरविन्द मकवाना नाम के एक दलित युवक को पंचमहल जिले के वैद गांव में केवल चड्डी पहनाकर पूरे गांव में घुमाया गया। उसका अपराध यह था कि उसने ऊंची जाति के एक सेवानिवृत्त पुलिस इंस्पेक्टर का किसी मुद्दे को लेकर विरोध किया था। बरासकांठा जिले के पथवाड़ा पुलिस थाने में अरविन्द चैहान नामक एक दलित युवक पुलिस हिरासत में मारा गया। दशरथ सोलंकी ने ढोलका पुलिस स्टेशन के सामने आत्महत्या कर ली क्योंकि पुलिस वालों ने व्यापार में उसके साझेदार, जो कि ऊंची जाति का था, के खिलाफ रपट लिखने से इंकार कर दिया था।
इन गंभीर व चिंतनीय हालातों के बीच एक अच्छी खबर यह है कि गुजरात की न्यायपालिका इस तरह की घटनाओं का स्वमेव संज्ञान लेकर दोषियों को सजा दे रही है।
‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ के एक रपट, गुजरात सरकार के इस दावे की पोल खोलती है कि राज्य में सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा समाप्त हो गयी है। रपट कहती है, “वाईब्रेंट गुजरात में १२,००० से अधिक लोग सिर पर मैला ढोने के काम में लगे हुए हैं। इनमें से ९० प्रतिशत को कोई सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराये जाते हैं और वे अपने हाथों से मैला साफ़ करने पर मजबूर हैं”। रपट के अनुसार, २४५६ परिवारों के १२,५०६ व्यक्ति इस घिनौने काम को कर रहे हैं. उनमें से ५० प्रतिशत, खुले में पड़ा मैला उठाते हैं। तथ्य यह है कि यह अध्ययन केवल १०,००० से अधिक आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में किया गया था. जाहिर है कि रपट में उन हजारों छोटे-बड़े गाँवों और कस्बों के हालात का जिक्र नहीं है जहाँ जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता और सिर पर मैला ढोने की प्रथा प्रचलित हैं.
वाल्मीकि समाज के परषोत्तम वाघेला, जो कि ‘गरिमा अभियान’ के संस्थापक-सदस्य हैं, का दावा है कि गुजरात में ३५,००० सफाई कर्मचारी हैं जिनमें से ९० प्रतिशत वाल्मीकि समाज के हैं। सफाई कर्मचारियों की एक बड़ी संख्या को आज भी हाथों से मैला साफ़ करना पड़ता है.
सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत बताते हैं कि, “कुछ सालों पहले, ‘इंदिरा आवास योजना’ पर मेरे अध्ययन के दौरान मुझे पता चला कि वाल्मीकि समाज के लोगों को अन्य समुदायों के आसपास घर नहीं दिए जाते हैं। बल्कि अन्य जातियों के लोगों को वाल्मीकि समाज से ‘सुरक्षित’ रखने के लिए, मोदी सरकार ने अलग से ‘वाल्मीकि आवास योजना’ शुरू की, जिसके अंतर्गत इस समाज के लोगों के मकान एकदम अलग-थलग, गांव के सुदूर कोने पर, बनाये जाते हैं।“
अर्नोल्ड क्रिस्टी का लिखा यह लेख फारवर्ड प्रेस के जून 2013 अंक में छपा है. फॉरवर्ड प्रेस भारत की पहली संपूर्ण अंग्रेजी–हिंदी मासिक पत्रिका है जो भारत के दलित और पिछड़े वर्ग पर एक नजरिया प्रदान करती है. फारवर्ड प्रेस से संबंधित किसी भी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के लिए [email protected] पर मेल या 011-46538687 पर फोन कर सकते हैं.





