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सात करोड़ रुपये बचाने के लिए शोभना भरतिया और शशि शेखर ले रहे हैं अपने 22 बुजुर्ग कर्मियों की बलि!

हिंदुस्तान प्रबंधन अपने ही मीडियाकर्मियों को परेशान कर रहा है। प्रबंधन की मंशा है कि मजीठिया वेजबोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले वह ज्यादा से ज्यादा स्थायी और बुजुर्ग कर्मचारियों से मुक्ति पा ले। इसी कारण प्रबंधन अपने कर्मचारियों को किनारे लगाने की कोशिश कर रहा है। प्रबंधन ने बाइस लोगों का तबादला कर दूर फेंक दिया है। जो तबादला स्वीकार कर नई जगह जा रहा है, उसे फिर किसी और सेंटर पर भेज दिया जा रहा है। जबरन डराया धमकाया जा रहा है ताकि इस्तीफा दे दें।

हिंदुस्तान प्रबंधन अपने ही मीडियाकर्मियों को परेशान कर रहा है। प्रबंधन की मंशा है कि मजीठिया वेजबोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले वह ज्यादा से ज्यादा स्थायी और बुजुर्ग कर्मचारियों से मुक्ति पा ले। इसी कारण प्रबंधन अपने कर्मचारियों को किनारे लगाने की कोशिश कर रहा है। प्रबंधन ने बाइस लोगों का तबादला कर दूर फेंक दिया है। जो तबादला स्वीकार कर नई जगह जा रहा है, उसे फिर किसी और सेंटर पर भेज दिया जा रहा है। जबरन डराया धमकाया जा रहा है ताकि इस्तीफा दे दें।

प्रबंधन चाहता है कि इन बाइस लोगों को किसी भी प्रकार से वेजबोर्ड की सिफारिशों को न देना पड़े। यदि उसे देना पड़ा तो उसके खाते पर करीब सात करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे। सुप्रीम कोर्ट में यदि मजीठिया बेजबोर्ड की सिफारिशों को मान लिया गया तो हरेक कर्मचारी को कम से कम तीस लाख रुपये का फायदा होगा। इसीलिए प्रबंधन चाहता है कि इन कर्मचारियों को इतना परेशान किया जाए कि वह खुद ब खुद यहां से भाग जाएं या इस्तीफा दे दें।

एक सूत्र ने बताया कि इन बीसों कर्मचारियों को न केवल काम से रोका जा रहा है बल्कि हर रोज स्थानांतरण की स्लिप पकड़ा दी जाती है जिससे वे परेशान हों। इनसे वह काम करने के लिए कहा जा रहा है जो इन्होंने किया ही नहीं है। अब ये बुजुर्ग भी हो गए हैं, यदि चाहेंगे भी तो उन्हें कहीं दूसरे जगह नौकरी नहीं मिलने वाली। इसलिए यूनिटों के मैनेजर उन्हें तरह तरह से परेशान कर रहे हैं। हालांकि इसमें कई लोगों ने लेबर कोर्ट में अपना मामला ले जाने का मन बनाया है जिसमें वे सीधे यूनिट मैनेजर को पार्टी बनाने की तैयारी में है।  

सूत्र बता रहे हैं कि पटना के एचआर हेड सोहराब खान ने एक रोज अजय चन्द कौशिक, विजय सिंह, दिनेश सिंह, राधेश्याम, बालेश्वर सिंह को पटना बुलाया था और बंद कमरे में उनको काफी डराया धमकाया और इस्तीफा के लिए दबाव बनाया पर किसी ने इस्तीफा नहीं दिया। सभी लोग हाई कोर्ट में इस बाबत याचिका डालने की तैयारी कर रहे हैं। उधर, कानपुर में प्रबंधन का हिटलरशाही जारी है। खबर है कि पटना से कानपुर स्थानांतरित होकर कानपुर आए एक कर्मचारी को यहां एक सप्ताह भी नहीं रहने दिया गया और उसका फिर स्थानांतरण महोबा कर दिया। फिर महोबा से कानपुर। अब कानपुर में उसे ड्यूटी नहीं करने दिया जा रहा है। 

वहीं अंजनी प्रसाद को पटना से कानपुर तबादला किया गया। इनको भी कानपुर में एक वीक तक भी नहीं रहने दिया गया और झाँसी स्थानांतरित कर दिया गया। अब वहां उन्हें काम से रोक दिया गया है। नवीन कुमार का पटना से कानपुर तबादला हुआ। फिर यहां से फतेहपुर भेजा गया। वहां जाने के बाद उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा है। इन लोगों पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा है। 

पीड़ित मीडियाकर्मियों में से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर आपको भी लगता है कि आपके साथ अन्याय हुआ है या आपके मीडिया हाउस में किसी के साथ अन्याय, उत्पीड़न, शोषण हो रहा है तो तुरंत भड़ास को लिख भेजें, [email protected] पर मेल कर दें.


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