कोई दो दशक पहले जब सीडी का चलन आम नहीं था और फिल्म वगैरह देखने के लिये किराये पर वीसीपी लाना पड़ता था, उन दिनों उमर शरीफ के एक नाटक ‘बकरा किस्तों में’ वीडियो बेहद मकबूल था। इसी नाटक में एक प्रसंग है कि एक दवा के सेवन से इंसान की उम्र घट जाती है। संयोग या दुर्योग से एक पुलिस वाला इस दवा की खुराक कुछ ज्यादा ही ले लेता है और वह पुलिसिया वर्दी में ही छोटे-से बच्चे में तब्दील हो जाता है। इस मजेदार दृश्य में पुलिस को गोद में उठाये नायिका से नायक कहता है, ‘‘बेगम, इसे पढ़ाओ – लिखाओ, इसे बेहतर परवरिश दो ताकि आने वाली नस्लों को एक अच्छी, पढ़ी-लिखी पुलिस मिल सके!’’ यानी पड़ोसी मुल्क में भी पुलिस का हाल वही है, जो अपने यहाँ है।
प्रेम साइमन के हिंदी नाटक ‘अरण्य-गाथा’ में राजप्रमुख अपनी पुलिस ‘दमनक’ से कहता है कि राम और लक्ष्मण नाम के दो अस्त्र-सज्जित युवक जंगल में घुस आये हैं। अनपढ़ पुलिस वाला कहता है ‘‘अस्त्र-सज्जित माने क्या?’’ राजप्रमुख कहता है, ‘‘बेवकूफ, अस्त्र-सज्ज्ति याने हथियार बंद….।’’ अब पुलिस वाले की घिग्घी बंध जाती है और वह हकलाते हुए कहता है,‘‘ प्रभु मैं बाल-बच्चेदार आदमी! मुझे किस बात की सजा दे रहे हैं? पहले किसी सर्वोदयी को वहाँ भेजकर उनके हथियार रखवा लें। फिर बाद के लिये तो हम हैं ही….।’’
अपने मुल्क की पुलिस का चरित्र यही है। हालांकि दिक्कत यह है कि पिछले कुछ दिनों में रंगकर्मियों के बीच ही यह आलोचना होने लगी है कि नाटक -खासतौर पर नुक्कड़ नाटक- अब स्टीरियो टाइप होने लगे हैं और घूम-फिरकर नेताओं या पुलिसवालों का ही मजाक उड़ाया जाता है। लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि इनका चरित्र ही कुछ ऐसा है कि नाटक में ही सही, जनता इनका मजाक पसंद करती है, क्योंकि असल जिंदगी में कोई इनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जिस संदर्भ में यह बात हो रही है, उस प्रसंग को समझने के लिये पहले बिहार के युवा रंगकर्मी-लेखक अमितेश की यह टिप्पणी पढ़ लें:

‘‘ऐसा क्या बिहार में ही होना था और वह भी बेगूसराय में! राज्य सरकार, केंद्र सरकार द्वारा सम्मानित और देश के उभरते हुए रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन को बिहार पुलिस के एक निर्मम दारोगा और उसके साथियों ने इसलिये बेरहमी से पीटा क्योंकि उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, क्योंकि उन्होंने यह बताने की कोशिश की वे एक रंगकर्मी है, क्योंकि उन्होंने पुलिस अधिकारी को कहा की आप इसकी ताइद अपने आला आधिकारियों से कर सकते हैं। बहरी पुलिस ने तब तक पीटा जब तक वे अस्पताल जाने लायक नहीं हो गये, बिना किसी आपराधिक रिकार्ड के हाजत में रखा…..सोचिये बिहार सरकार जिसको सम्मानित करती है उसके अधिकारी उसे अपमानित करते हैं, सोचिये कि आम नागरिक किस दहशत में रहते हैं, सोचिये कि बिहार के पुलिस अधिकारी के लिये एक रंगकर्मी की हैसियत नचनिये बजनिये से अधिक नही हैं। यह लिखते हुए अपने आप को संयत रखना कठिन है। यह सिर्फ़ उस पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी या निलंबन का मामला नहीं है. यह आम जनता के प्रति पुलिस के आपराधिक रवैये का मामला है. अपराधियों को पकड़ने में विफल निकम्मी पुलिस अपनी कुंठा इस तरह निकालती है। हस्पताल में पड़े गुंजन के साथ खड़े हों न हों पुलिस के इस रवैये के खिलाफ़ जरूर खड़े हों……’’
अब यह मालूम हो रहा है कि गुंजन बेगूसराय रेलवे स्टेशन के समीप आधी रात को जब अपने एक-दो मित्रों के साथ चाय पी रहे थे, तब यह वाकया हुआ। अभी पूरी खबर मुझे नहीं है, फिर भी हुआ क्या होगा, यह मैं दावे के साथ सच-सच बयान कर सकता हूं। गुंजन कलाकार हैं, दाढ़ी बढ़ी हुई है। कवि-कलाकारों का वेश अपने यहाँ कैसा होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है। पुलिस इस किसम के लोगों को उसी निगाह से देखती है, जैसे वह स्लेट में लिखे नामों वाली तस्वीरों को तकती है जो अपने यहाँ के अति-आधुनिक थानों में लगे होते है और जिसका विवरण ‘राग दरबारी’ नामक ग्रंथ में देखा जा सकता है। नगर में डकैती, आधी रात का वक्त, मोटर साइकिल पर सवार युवक, विचित्र -सी वेशभूषा और बढ़ी हुई दाढ़ी- पुलिसिया पिटाई के लिये यह आदर्श स्थिति होती है। ‘‘क्या हो रहा है?’’ पुलिस वाले ने कड़ाई से पूछा होगा। इस तरह के सवालों को कलाकार अपनी निजता का हनन मानते हैं। गुंजन ने कुछ बेरूखी से जवाब दिया होगा जो पुलिस वाले को नागवार गुजरा।
अब उसने सीधा सवाल पूछा होगा, ‘‘ का करते हो?’’ गुंजन ने कहा होगा, ‘‘रंगकर्मी।’’ पुलिस वाले को अब तक गुस्सा आने लगा होगा, ‘‘ इ रंगकर्मी का होता है?’’ गुंजन ने समझाया होगा कि ड्रामा करते हैं। अब पुलिस वाले का गुस्सा काबू के बाहर हो गया होगा। कहा होगा, ‘‘बुड़बक! हम पूछ रहे हैं कि काम का करते हो तो बता रहे हैं कि ड्रामा करते हैं। साले पुलिस वाले से ड्रामेबाजी करते हो..’’ यह कहते हुए उसने ‘सरकारी काम में बाधा डालने के जुर्म’ के तहत अपने हाथों व लाठी के सहारे उचित कारवाई शुरू कर दी होगी।
हिंदी पट्टी में नाटकों के गैर-व्यावसायिक होने का एक पहलू यह भी है। केवल नाटक ही नहीं वे सारे रचनात्मक काम जिनसे पैसा-धेला न मिलता हो, हिंदी समाज उन्हें हिकारत भरी नजरों से देखता है और इन कामों में लिप्त लोगों को वह न सही अपराधी, आवारा तो समझता ही है। ऐसे समाज में यदि गैर पढ़ी-लिखी पुलिस आधी रात को एक दाढ़ी बढ़ाये शख्स की पिटाई कर दे तो कौन-सी धारा लगती है? अब अपने यहाँ की पुलिस इतनी पढ़ी-लिखी व जहीन तो है नहीं कि वह निजता, उच्छृंखलता व अपराध में फर्क कर सके। यूपी-बिहार में तो और भी नहीं। आप फेसबुक में टिप्पणी डालने पर गिरफ्तार हो
सकते हैं और दाढ़ी बढ़ाने के जुर्म में पिट सकते हैं। फासिज्म और किसे कहते हैं?
लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्टा, डोगरगढ़ के अध्यक्ष हैं. सरकारी नौकरी से कुछ समय पहले रिटायर हुए. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के अन्य आलेख / संस्मरण / रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें… भड़ास पर दिनेश
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