Nitin Chandra : हम किस राज ठाकरे, किस बाल ठाकरे, किस शीला दीक्षित और किस दिल्ली वाले और किस मराठी को दोषी ठहराते हैं। यहाँ पर बिहार के अन्दर एक बिहारी दूसरे बिहारी के साथ जो करता है वो देश के किसी हिस्से में हमारे साथ नहीं होता है। बस बुद्ध और अशोक के नाम पर खोखले शान बघारते रह गए। अरे हम तो आईएएस और आईपीएस बनते हैं। बनकर क्या उखाड़ लिया? इज्ज़त तो कोई किसी की नहीं करना चाहता। इज्ज़त क्या है, ये भी पता है? सब बेइमानी है। अभी प्रवीन भाई से बात हुई। जितने धीरे उनके मुँह से शब्द थे, उससे कहीं ज्यादा दर्द चीख रहा था। प्रवीन भाई, मिट्टी खराब हो चुकी है।

ये जो नंगी पीठ देख रहे हैं, ये है बिहार की कला, और उस पर जो निशान दिख रहे हैं वो है कलाकार को बिहार में उसके कला के बदले में मिलने वाला इनाम, और आगे भी मिलता रहेगा, पुलिस के बेल्ट की मार से लाल, हड्डीयाँ टूटी और अरमान कीचड़ चाटते । अब आप ये मत कहिएगा की ऐसा तो हर जगह होता है । नहीं । ये बिहार में ही होता है । ये प्रवीन गुंजन हैं, राष्ट्रीय नाट्य अकादमी से मंच निर्देशन के पढ़ाई करके, बिहार के बेगुसराय में रहकर काम कर रहे हैं । इन्होने कभी दिल्ली और मुम्बई का मोह नहीं किया । जो करना चाहा बेगुसराय और वहाँ पर कला के लिए किया । राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह अपने दम पर करवाते हैं । लेकिन ये घटना बिहार के लिए आम घटना है ।
ये हंटर के निशान सिर्फ पीठ पर ही नहीं बल्कि बिहार में कला के क्षेत्र में कोइ कुछ भी करना चाहे तो उसके ह्रदय में लगती है । चाक़ू गोद दिए जाते हैं बिहार में एक कलाकार के कला में, वह अपने मन रूपी कनवास में रंग नहीं, अपने बिहार के लिए कुछ करने की सोच से चोटिल अपने दिल का बहा खून भरता है । मैं जानता हूँ इस हंटर का दर्द, शरीर पर तो नहीं मन पर झेला है । देख लीजिये बिहारी और गैर बिहारी, ये है बिहार और इसके कलाकार के शरीर पर रात भर मार से उभरे निशान । जिस राज्य के मुख्यमंत्री इस तरह थोक के भाव में जेल जाते हों । युवा हर साल भागते हों । ऊपर से नीचे तक संवेदनहीन किंकर्तव्य विमुढ़ हर कोने में बैठे हों वहाँ कला को कौन पुछता है । क्या संवेदना बची है लोगों में सरकार में और क्या संवेदना बचेगी प्रवीण गुंजन के मन में अपनी मिट्टी के लिए । सब ख़तम कर देना चाहते हैं वो लोग | धिक्कार है | धिक्कार है |
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प्रवीण गुंजन को सड़क पर घसीट कर डंडे से मारा, वो रोया, कहा कि सर, मुझे सम्मान मिला है, मैं नाटक करता हूँ, पुलिसवाले उसका उपहास करते हैं, और तब तक मारते रहते हैं जब तक वह सड़क के एक किनारे अधमरा ना हो जाए। जब प्रवीण गुंजन जैसा बड़ा कलाकार बेगुसराय जैसी जगह पर रहकर रंगकर्म के लिए इतने बड़े काम करता है तो उसको लगता है की ये मेरा छोटा सा शहर है, सब अपने हैं और सब मुझे जानते भी होंगे, लेकिन बस एक मिनट लगता है इस भ्रम को टूटने में । मैं पहले भी कह चुका हूँ की बिहार वह जगह नहीं है जहां पर कला भावना या आम इंसानी संवेदनाओं के लिए कोई भी जगह है। जहाँ पर इंसान अपनी पहचान नहीं बचा पाया। अपनी भाषा और संस्कृति नहीं बचा पाया। उस जगह पर क्या प्रवीण गुंजन जैसे दिग्गज और क्या कोई और। चीखने चिल्लाने का मन हो रहा है। Pravin Kumar Gunjan आप बताएं क्या करना है।
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आज प्रवीन गुंजन के घटना के बाद फिर मेरी एक पुरानी कविता याद आ गयी । बिहार की सड़कों/लोग/सोच को समर्पित ।
इन सड़कों पे..
सुन्न से मिजाज़, शिथिल से शरीर में, सोयी आत्माओं को, देखता हूँ विचरते इन सड़कों पे
खोता है धैर्य, रोता है मन, जब देखता हूँ अराजकता को संवरते इन सड़कों पे
ना आँख में नूर, ना चेहरे पर इनके चमक, देखता हूँ इंसानों को रोज बिखरते इन सड़कों पे
ना बदलनी है मिट्टी, ना बदलने को है फलक का रंग, मेरे सिर्फ बिफरने से इन सड़कों पे
शाशवत सन्नाटो से कोइ आवाज नहीं देता, इन इंसानों से उमड़ते इन सड़कों पे
ना जाने क्यूँ खो रही है आत्मा और सम्मान, गाड़ियों की गूँज से गरजते इन सड़कों पे
देखता हूँ इन रंग – बिरंगे कपड़ों में लिपटे विकृत असत्य को रोज गुजरते इन सड़कों पे
ना वोह सोचता है ना वोह सोचना जानता है की क्या बदलना है उसको इन सड़कों पे
किसी कुंठा में है या किसी षड़यंत्र का शिकार, वो क्यूं नहीं नहीं बिलखता इन सड़कों पे
"दूर के ढोल सुहावने" क्यूँ हो गए हैं, नहीं बरसता अब उस विरासत का रंग इन सड़कों पे
पान के उस लाल पीक में धरोहर का खून बिखरा पड़ा है इन सड़कों पे
जितनी बची है, क्या उतनी भी हम बचा पाएंगे परम्परा इन सड़कों पे
सुन्न है शायद, इस शुन्य में दिखता नहीं, इनको कुछ भी बिगड़ते इन सड़कों पे
हैरान सा मैं चला जाता हूँ, सोचता हूँ क्या ये वही शहर जो अब रहा नहीं इन सड़कों पे
क्यूँ खोती है जमीन यहाँ पर, और सोती हैं दसों दिशायें इन सड़कों पे
राह न कोइ मंजिल का पता, संस्कृति क्यूँ लरजती (कांपती) है इन सड़कों पे
ना कोइ भाषा ना कोइ पहचान मिट्टी की, तमीज़ क्यूँ सिहरती है इन सड़कों पे
आगे निकलने की होड़ तो दूर, पीछे रहने का रंज भी नही टपकता इन सड़कों पे
और सिर्फ बात ये नहीं है की उसने पुकारा नहीं हमें देख कर भी इन सड़कों पे
उसने देख कर अनदेखा किया जब मैं परेशान खड़ा था उलझते इन सड़कों पे
इस शहर को सिर्फ शामियाना भर, न जाने क्यूँ समझते हैं लोग इन सड़कों पे
हो सकता है आशियाना भी ये शहर अगर हम चाहे कभी, इन सड़कों पे
अब देखना है की कब फिर से वो दिलेर ख्वाब सजते हैं इन सड़कों पे
कब कोइ निकल आये और कह दे की अब सब कुछ बदलेगा इन सड़कों पे
नितिन चंद्रा के फेसबुक वॉल से.
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