Ravi Rawat : महीने भर पहले नवभारत टाइम्स में ग्वालियर से आए फिरोज खान ने ज्वाइन किया है। महीना भर उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ रहकर गुजार दिया, अब वे अपना अलग घर लेना चाहते हैं किराए पर। फिरोज मुंबई की अलग-अगल जगहों पर घर लेने की कोशिश कर चुके हैं और उनकी कोशिश लगातार जारी है। पर, उन्हें घर नहीं मिल रहा, क्योंकि उनका नाम फिरोज और उपनाम खान, उनके और मकान के बीच बाधा बन गया है।
दूसरे शहरों का तो नहीं पता, लेकिन मुंबई में घर देने से पहले एजेंट और मकान मालिक आपका नाम और धर्म जरूर पूछते हैं। क्या फिरोज या उनके जैसे कई लोगों को सिर्फ इसलिए घर नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि उनका धर्म वह है, जिस पर हमने आतंकवादी होने का ठप्पा लगा दिया है? और अगर नहीं, तो करो इस बात का विरोध और नहीं कर सकते, तो खुद को धर्म निरपेक्ष देशवासी कहना बंद करो।
रवि रावत के उक्त फेसबुक स्टेटस पर खुद युवा पत्रकार फिरोज खान ने जो टिप्पणी की है, वो इस प्रकार है…
Firoj Khan : 90 के बाद की सियासत का नतीजा है कि आदमी, आदमी से नफरत करने लगा। यह भी हुआ कि उसके मन में बेतहासा असुरक्षा की भावना पैदा कर दी गई। ये सिर्फ मुसलमान होने की सजा नहीं है। मुसलमानों की बहुसंख्या होने पर हिंदू होने की भी यही सजा है। सच कहूं तो इंसान होने की सजा है। लेकिन इस सब के बाद, दोस्तों को हमेशा साथ रहा। इससे बढ़के और चाहिए भी क्या। शुक्रिया दोस्तो…






