अपने पक्ष में कांग्रेस का समर्थन लेने पर मैं आपकी आलोचना का पात्र बन गया हूं. यह मैं सुबह से देख रहा हूं. सामाजिक और दलित आन्दोलनों के सभी साथी मुझसे नाराज़ हैं. मुलायम सिंह यादव और मायावती ने कांग्रेस की छतरी में जाकर अपने सारे आर्थिक पाप क्षमा करा लिए, किसी दलित और पिछड़े ने उनकी आलोचना क्यों नहीं की? आज भी वे जनता को धोखा दे रहे हैं और लोकसभा में कांग्रेस की ही सरकार बनाने के लिए सपोर्ट करेंगे. तोहफा उन्हें मिल ही चुका है. ये लोग जनता के विश्वासघाती क्यों नहीं हैं? सिर्फ कंवल भारती कांग्रेस की सपोर्ट लेकर विश्वासघाती हो गये?
अजीब तर्क हैं आप लोगों के. क्या डा. आंबेडकर ने कांग्रेस की सपोर्ट नहीं ली थी? क्या वे कांग्रेस की सरकार में मंत्री नहीं बने थे? क्या कांग्रेस की सपोर्ट लेकर वे ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी हो गये थे? रामपुर में आज़म खां ने मेरे विरुद्ध कितनी भयाभय स्थितियां पैदा कर दी हैं, आप में से किसी को भी उनका अंदाजा नहीं है. मेरे सामने रामपुर छोड़ने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया था. मैं क्या करता?
कांग्रेस से जुड़ना मेरी मजबूरी है, जिसका अहसास आप नहीं कर सकते. लेकिन क्या मैंने कांग्रेस के आगे अपनी वैचारिकी का भी समर्पण कर दिया है, अगर कोई ऐसा समझ रहा है, तो वो गलत समझ रहा है. मैं अपनी विचारधारा के साथ ही रहूँगा, मैं कांग्रेस के खूंटे से नहीं बंध गया हूँ. जिस दिन मुझे लगेगा कि मैं कांग्रेस के साथ नहीं चल सकता, बाहर निकलने में एक क्षण भी नहीं लगाऊंगा. यह मेरा स्पष्टीकरण नहीं है, पर मैं अपने आलोचकों को बताना चाहता हूँ कि मुझे समझना इतना आसान नहीं है, जितना आप समझ रहे हैं.
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जब तक रास्ता नहीं है, तब तक क्या करें? कहाँ जाए आदमी? चार दल के सिवा पांचवां कहाँ है? कम्युनिस्ट भी कल तक कांग्रेस के ही साथ थे. केरल में वे मुस्लिम लीग से गठजोड़ करते रहे हैं. मैंने वामपंथी संघठनों को भी नजदीक से देखा है. NGO चला रहे हैं और मस्त हैं. कोई विकल्प खड़ा किया उन्होंने? इन्हीं की वजह से पूंजीवादी दल फल फूल रहे हैं.
दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.





