क्या सचमुच हम मुसलमान हैं? क्या हम इस्लाम के बताये रास्ते पर चल रहे हैं? अगर आज हम अपने आप को और दुनिया के 61 इस्लामिक मुल्क की 1.50 अरब की आबादी मुसलमान को देखें तो जवाब ना में मिलता है. मुसलमान उसे कहते हैं जो एक अल्लाह और आखिरी रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल) को माने और इस्लाम के जो अरकान हैं उन पर अमल करे. इस के अतिरिक्त मुसलमानों का चरित्र भी अच्छा होना चाहिये. चरित्र तब ही अच्छा होगा जब आप में ये खूबियां होंगी जैसे ईमानदारी, हार्दिकता, वादा निभाना, सच्चाई और इंसाफ, जो बदकिस्मती से पूरी इस्लामी दुनिया में अब नहीं पायी जाती. जब तक ये खूबियां मुसलमानों में थीं दुनिया ने देखा कि हम कैसे पूरे विश्व पर छा गये थे.
सब से पहले आप ईमानदारी को देखिये. एक समय था जब मुसलमान को सबसे ज्यादा ईमानदार समझा जाता था. आज मुसलमानों से ईमानदारी खत्म हो गयी है. आप देखिए कि अरब मुल्कों में खाने पीने का सामान और दवा सभी अमेरिका और यरोप से आते हैं. डेनमार्क की कंपनी सऊदी अरब और दुबई में डेरी प्रोडक्ट और गोश्त सप्लाइ करती है. सारे मुस्लिम देश जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस, स्विटजरलैंड से दवायें लेते हैं. अब आप देखिए कि एक इस्लामिक मुल्क दूसरे इस्लामिक मुल्क से कोई सामान नहीं लेता, क्योंकि वे जानते हैं कि क्वालिटी अच्छी नहीं होती. मुसलमान होने के बावजूद हम मक्का में हज और उमरे के दौरान हाजियों की जेब काटते हैं. वहाँ पर भीख मांगते हैं और पाकिस्तानी मुसलमान तो हज़ और उमरे के नाम पर जा कर चरस, अफीम, हीरोइन ले जाते हैं, पकड़े जाने पर सब को फांसी भी हो जाती है.
पहले मुसलमान की खासियत हार्दिकता थी अब मुसलमानों में ये खत्म हो गयी है और हम तंगदिल हो गये हैं. अब मुसलमानों में भी छोटे-बड़े, गोरे-काले, अमीर-गरीब जैसे भेदभाव आ गये हैं. अरबी और गैर अरबी मुसलमानों में भेदभाव जितना इस्लामिक मुल्कों में पाया जाता है पूरी दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता. दुनिया में बहुत से ऐसे इस्लामी मुल्क हैं जहां लोग 30-40 साल से रह रहे हैं उन्हें नेशनलिटी नहीं दी जाती. आप मुसलमान हो कर भी अरब मुल्कों की लड़कियों से शादी नहीं कर सकते. आप बगैर किसी लोकल स्पांसर की सहायता से स्वयं अपना व्यापार नहीं कर सकते. मुसलमान 72 फिरकों मे बंटे हैं और हर एक दूसरे को काफ़िर कहता है. सब की अपनी अपनी मस्जिदें और अपना कब्रिस्तान है. आज सब से ज्यादा बेचैनी इस्लामिक मुल्कों में है. 61 इस्लामिक मुल्कों में से 25 मुल्कों में बादशाहत है.
इस्लाम दुनिया का पहला मज़हब है जिसने शिक्षा पर सब से ज्यादा जोर दिया है. क़ुरान की पहली आयत ही नाज़िल हुई कि इक़रा-पडो. हदीस है कि तुम्हें अगर शिक्षा लेने के लिये चीन भी जाना पड़े तो जाओ मगर आज शिक्षा में इस्लामिक मुल्क और पूरे मुसलमान, भारत के भी, और कौमों से बहुत पीछे हैं. ईसाई दुनिया के 40% नौजवान यूनिवर्सिटी तक पहुंचते हैं जब कि इस्लामी दुनिया के 2% नौजवान यूनिवर्सिटी तक पहुंचते हैं. इस्लामी दुनिया में 20 लाख लोगों में से सिर्फ 230 लोगों को विज्ञान की जानकारी है जब कि अमेरिका में 10 लाख लोगों में 4 हज़ार को विज्ञान की जानकारी है पूरे इस्लामिक मुल्क में 35 हजार रिसर्च स्कॉलर हैं जबकि सिर्फ अमेरिका में इनकी संख्या 22 लाख है. इस समय दुनिया की 200 बड़ी यूनिवर्सिटियों में एक भी यूनिवर्सिटी मुस्लिम मुल्क की नहीं है.
इस्लाम ने सब से ज्यादा जनहित, परोपकार या समाज सेवा के लिये मुसलमानों को प्रेरित किया है. इस्लाम ही एक ऐसा धर्म है जिसमें गरीबों की मदद के लिये ज़कात देने को कहा गया है. मगर अफसोस आज मुसलमान इन कामों से दूर होता जा रहा है. अगर हम दुनिया के 50 सबसे ज्यादा दान देने वालों की सूची देखें तो उसमें एक भी मुस्लिम का नाम नज़र नही आता है साथ में कोई हमारे हिन्दू भाई भी नही हैं. इस काम में सिर्फ ईसाई धर्म के लोग आगे हैं. रेडक्रॉस जो दुनिया का सब से बड़ा मानवीय संगठन है इस के बारे मे बताने की जरूरत नहीं है. आप को मालूम होगा कि बिल-मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन में बिल गेट्स ने 10 बिलियन डॉलर से इस फाउंडेशन की बुनियाद रखी है जो कि पूरे विश्व के 8 करोड़ बच्चों की सेहत का ख्याल रखता है. इसके अतिरिक्त एड्स और अफ्रीका के गरीब देशों को खाना और मानवीय सहायता पहुचाता है. दुनिया उस समय दंग रह गयी जब वॉरेन बफेट ने इस फाउंडेशन को 18 बिलियन डॉलर दान में दे दिया. मतलब वॉरेन ने 80% अपनी पूँजी दान में दे दी. दुनिया के 50 सब से ज्यादा दान देने वालों में एक भी मुसलमान नहीं है. अरब का अमीर शाहज़ादा अपने स्पेशल जहाज पर 500 मिलियन डॉलर खर्च कर सकता है मगर मानवीय सहायता के लिये आगे नहीं आ सकता है.
इस्लाम ने मुसलमानों को जिन बुराइयों से रोका था आज सब से ज्यादा मुसलमानों में और इस्लामिक मुल्कों में पायी जा रही हैं. शराब, जुआँ, ब्याज, अय्याशी की इस्लाम में सख्त मनाही है मगर आज ये मुसलमानों में आम हो गया है. यही कारण है कि आज हम अल्लाह की सबसे अच्छी कौम होने के उपरान्त भी पूरी दुनिया में हम बदनाम और रुसवा हो रहे हैं.
हमारी नमाज़ें और दुआयें कबूल नहीं हो रही हैं. इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इस्लाम के बताये रास्ते पर चलें, शिक्षा पर ध्यान दें, बुरे कामों से तौबा करें और वक्त के साथ चलें. अगर ऐसा न हुआ तो वो दिन दूर नहीं जब मुसलमान दुनिया से पिछड़ जायेंगे. इसी लिये अभी भी समय है कि मुसलमान जागें नहीं तो बहुत देर हो जायेगी. बकौल एक शायर- तुम्हारी दास्तां तक न होगी दस्तानों में.
लेखक अफ़ज़ल ख़ान का जन्म समस्तीपुर, बिहार में हुआ. वर्ष 2000 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमबीए की पढ़ाई कंप्लीट की. इन दिनों दुबई की एक कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत हैं. 2005 से एक उर्दू साहित्यिक पत्रिका 'कसौटी जदीद' का संपादन कर रहे हैं. संपर्क: 00971-55-9909671 और [email protected] के जरिए.





