''संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है'' कौन दिया था यह नारा? 1974 में जेपी के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति की ज्योति बिहार में जल रही थी। इसी ज्योति में कई छात्र नेता नेतागिरी का ककहरा सीखने में लगे थे। ककहरा सीखने में लालू यादव सबसे आगे थे। पटना विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष थे लालू यादव। सुशील मोदी महासचिव व रविशंकर प्रसाद संयुक्त महासचिव थे। इसके अलावा रामविलास पासवान, नीतिश कुमार, राजीव प्रताप रूडी, नरेंद्र सिंह, मंगनी लाल मंडल, रामजीवन सिंह, शिवानन्द तिवारी… ये सभी छात्र राजनीति की धारा में आ कर राजनीति का पाठ पढने में जुटे थे। लालू यादव,रामविलास पासवान,सुशील मोदी व नीतिश कुमार ने अपने अपने स्तर से राजनीतिक स्पेस खोजकर अपनी पहचान बनाई। नब्बे के द्शक में लालू यादव पिछड़ी जाति के मसीहा बनकर सामने आए।
सर्वणवाद के खिलाफ लालूजी ने नारा भी दिया। भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) को साफ कर देा। मतलब साफ था कि लालू यादव पिछड़ी जाति का कार्ड खेलने में सफल हुए थे,खासकर मुसलमान और यादव समीकरण का फामूर्ला हिट हो गया था जिसे माय समीकरण के नाम से जाना गया। शुद्ध देसी ठेठ में राजनीति करने का अंदाज लालू यादव को जनता के बीच लोकप्रिय बनाते चला गया। मुझे याद है बिहार के सहरसा जिले के पंचगछिया गांव में एक सभा हुई थी लालू यादव की।
मैं नवीं कक्षा का छात्र था लेकिन मुझे भी इच्छा थी कि लालू जी को देखेंगे। लेकिन लोकप्रिय होने के बीच लालू जी विकास का फार्मूला भूल गए या कहे तो उन्हें लगने लगा कि अब हम बिहार के परमानेंट सीएम हो गए हैं। चारा का चोरी भी कर डाला। लेकिन जनता ने लालू को धीरे धीरे बायपास पर धकेल दिया जिसका पता शायद लालू यादव को नहीं चल सका। फिर समता पार्टी के जार्ज फर्नांडिस समाजवाद के ओरिजनल स्वरूप को जनता के बीच ले जाने में सफल रहे। जनाधार दिन ब दिन बढता गया। समता पार्टी टूट कर जदयू बनी। जार्ज फर्नांडिस ,शरद यादव ने रात दिन मेहनत की । नीतिश जी इसी मेहनत पर सियासत कर आगे बढते रहे।
शरद यादव ने लोकसभा चुनाव मे मधेपुरा के जमीन पर लालू यादव को पटकनी दी उसी वक्त इस बात का अंदेशा लग गया था कि जनता अब दूसरे मूड में है। जनता ने लालू की पार्टी को सत्ता से बाहर कर दी। हांलाकि पूर्व चुनाव आयुक्त के जे राव व इलेक्टानिक वोटिंग मशीन ने भी लालू राज के गुंडई चुनावी व्यवस्था पर अंकुश लगाने में अहम भूमिका निभाई थी। भाजपा -जदयू के गठबंधन में बनी पहली सरकार में नीतिश कुमार को आगे करकें भाजपा भावी राजनीतिक जमीन तैयार करने का खेल खेलना चाह रही थी जिसमें नीतिश कुमार जीते। यही से नीतिश कुमार जदयू में हावी होते गए। शरद यादव को भी नीतिश कुमार जार्ज बाबू की तरह हटाने का प्रयास करते रहे। लेकिन शरद यादव मंझे हुए राजनीतिज्ञ थे और यह बात नीतिश जी भी समझ चुके थे। मसलन,ये सभी नाम समाजवाद और समाजवादी राजनीति के आधार पर पला बढा और फला भी । जिसमे रामविलास पासवान भी कामयाब रहे थे।
बहरहाल, बिहार में न लालू जी, न नीतिश जी, न रामविलास जी और न अन्य जी कोई भी अब समाजवादी नेता कहलाने के योग्य नहीं है । सब ने अंततः इंदिरा के कांग्रेस को स्वीकार कर लिया । यही हाल उत्तर प्रदेश का है जहां के एक मात्र समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव कब का कांग्रेसिया चोला ओढ लिऐ। और चल दिए तीसरा मोर्चा का गठन करने ,वो भी उस मार्क्सवादियों के साथ. जिसपर जयप्रकाश जी ने कारावास की कहानी पुस्तक में लिखा था की ''बहुत सारे कांग्रेसी छिपे हुए कम्युनिस्ट हैं। वे श्रीमती गांधी का साथ अंतिम हद तक देंगे। वे हमेशा ही लोकतंत्र के शत्रु रहे हैं ''. लोहिया, जयप्रकाश बाबू के सिद्यांत को ताड़ ताड़ और शर्मसार कर दिया इन सभी समाजवादी नेताओं ने। आज जेपी होते तो रोते,फूट फूट कर रोते। अरे जिस कांग्रेस पार्टी को जड से उखाडने के लिए जयप्रकाश नारायण जी जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे । जिस इंदिरा गांधी ने जेपी बाबू को जेल मे सड़ने पर विवश कर दिया।
आज उसी पार्टी के गोद में मुलायम सिंह यादव, नीतिश कुमार, लालू यादव, रामविलास पासवान सहित कई नेता जा बैठे। यहां मैं शरद यादव का जिक्र इसलिए नहीं करूंगा क्योंकि शरद यादव आज एक ऐसे नेता हैं जो दिल से समाजवादी हैं। जेपी जी की तरह ताउम्र कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे है और लड़ते रहेंगे। युवा वर्ग में आज भी शरद जी का क्रेज उतना ही है जितना किसी अन्य रास्ट्रीय पार्टी के लोकप्रिय नेता का है।
तो ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आनेवाले दिनो में कौन होगा समाजवाद का खेवहनहार? या ये मान लिया जाए कि मार्क्सवाद के बाद अब भारत में समाजवाद भी अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर है। ये कौन सी राजनीति कर रहें हैं समाजवादी का सिंबल लेकर घूमने वाले,बताएंगे जरा। यह सवाल उन सभी नेताओं से जो जेपी बाबू के पदचिन्हों पर चलकर राजनीति का एबीसीडी सीखा और आज जब जेड तक लाने की बारी आई तो ऐसा क्या हो गया कांग्रेस मे जहां सभी समाजवादियों को कांगेस में पूर्ण समाजवाद दिखने लगा। राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण जी को तो नहीं दिखा था कभी कांग्रेस में समाजवाद।
बहरहाल, कितना अच्छा होता अगर लोहिया और जेपी के सिद्यांत पर चलकर समाजवाद के आधार पर राजनीति करते समाजवादी नेता। सत्ता ,सत्ता और बस सत्ता यही भावना समाजवाद के ढलान का सबसे बड़ा कारण बना है। अगर जयप्रकाश जी चाहते तो प्रधानमंत्री का पद उनके लिए दुर्लभ नहीं था। क्या ऐसे में यह उम्मीद की एक किरण शरद यादव हो सकते हैं यह भी एक गंभीर विषय है। लालू यादव,रामविलास पासवान,नीतिश कुमार तो अब समाजवादी नेता नहीं रहे,इसमें कोई संदेह नहीं। तो ऐसे में आज हमें जेपी बाबू के लिखे उन शब्दों पर गौर करने की जरूरत है‘‘चारों ओर हुंआ-हुआं और हू हू की आवाज सुनायी पड़ती है। लेकिन कालचक्र तो घूमता ही रहता है। रात चाहे कितनी ही अंधेरी हो,प्रभात तो फूटकर ही रहता है‘‘ ।
लेखक जितेन्द्र ज्योति पत्रकार सह सामाजिक कार्यकर्ता हैं. इनसे संपर्क 08860325838 के जरिए किया जा सकता है.





