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गाजीपुर

गाजीपुर के बुजुर्गों को ब्रितानिया हुकुमत याद आई

यह बात जन सामान्य की समझ से परे है कि क्यों पूर्वी उ0प्र0 के गाजीपुर जिले में विश्वविद्यालय की मांग पर लोकतांत्रिक तरीके से आमरण अनशन कर रहे अनशनकारियों को जबरन अर्द्धरात्रि में उनके सहयोगियों सहित उठवा लिया गया। उनके अन्य साथियों की राजतंत्र के लठैतों द्वारा बर्बरतापूर्वक धुनाई कर उन्हें बन्द क्यों किया गया और यह लठैत इतने जूनूनी क्यों हो गये कि इन्हें राह चलते वादकारी तथा अन्य का फर्क भी नहीं समझ में आया।

यह बात जन सामान्य की समझ से परे है कि क्यों पूर्वी उ0प्र0 के गाजीपुर जिले में विश्वविद्यालय की मांग पर लोकतांत्रिक तरीके से आमरण अनशन कर रहे अनशनकारियों को जबरन अर्द्धरात्रि में उनके सहयोगियों सहित उठवा लिया गया। उनके अन्य साथियों की राजतंत्र के लठैतों द्वारा बर्बरतापूर्वक धुनाई कर उन्हें बन्द क्यों किया गया और यह लठैत इतने जूनूनी क्यों हो गये कि इन्हें राह चलते वादकारी तथा अन्य का फर्क भी नहीं समझ में आया।

यह कार्यवाही तो दुर्भाग्यपूर्ण रही ही, इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह सरकारी बयान का आना कि लाठीचार्ज हुआ ही नहीं। यह गैर जिम्मेदाराना बयान जारी भी हुआ तो उस जिलाधिकारी के हवाले से जिसे जिले की जनता निहायत ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और बेहद सुलझे अधिकारी के रूप में जानती है। इतना ही नहीं बल्कि हाल ही में आई बाढ़ की विभिषिका में राहत कार्य व अन्य विकास कार्यों में इनकी व्यक्तिगत रुचि की सार्वजनिक सराहना भी करती है। ऐसे जिलाधिकारी के रहते जनपद में इस प्रकार की विसंगति निश्चित रूप से चिन्तनीय है तथा प्राशासनिक गुप्त तंत्र की कार्यशैली को आक्षेपित करती है।

प्रशासनिक गुप्त तन्त्र जो आज अनशनकारियों व उनके सहयोगियों या संरक्षकों की जन्म कुण्डली खोज रहा है वह उस समय किस तन्द्रा में लीन था जब नगर स्थित बड़ा महादेवा मन्दिर पर यह छात्र समूह सार्वजनिक रूप से इस संदर्भ में बैठक कर रहे थे, या फिर रेलवे स्टेशन से प्रारम्भ कर पूरे नगर में मशाल जुलूस निकाल रहे थे। इसी संदर्भ में जनप्रतिनिधियों और माननीयों से अपील करते फिर रहे थे या फिर प्रदेश के समस्त माननीयों को राखी भेजकर बदले में विश्वविद्यालय की मांग कर रहे थे। यह गुप्त तन्त्र उस समय कहां व्यस्त था जब अपने ही खून से इन अनशनकारियों द्वारा प्रदेश के मुखिया तथा महामहिम श्री राज्यपाल को इस संदर्भ में पत्र प्रेषित किया गया था, या फिर यह जब उसी बड़ा महादेवा मन्दिर पर हुए एक बडे़ बैठक में सर्वांगीण विचारोपरान्त आमरण अनशन के लिए संकल्पित हुए।

जाहिर है कि आन्दोलनकारियों द्वारा यह सब कार्य एक दिन या एक महीने मात्र में नहीं किया गया होगा। हमें समझना होगा कि यह मांग भी पुराना है और प्रयास भी। हर स्तर पर किये गये प्रयास के बाद निराशा के शिकार लोगों द्वारा ही आमरण अनशन का संकल्प लिया जाता है। इन जन्म कुण्डली तलाशने वालों को अपनी खोज में यह बात भी ध्यान रखना होगा कि आज समाचार पत्रों के हाकरों द्वारा यह कहा जाना कि आज अखबार कम पड़ गया इसलिए सभी नियमित ग्राहकों को नहीं दिया जा सका। यह निश्चित रूप से जिले में विश्वविद्यालय के मांग के प्रति आमजन के सरोकार तथा इस विषय से सम्बन्धित समाचारों के लिए उत्सुकता का परिचायक है।

हम सभी को यह भी समझना होगा कि सत्याग्रह के जनक महात्मा गांधी का यह मानना था कि ‘‘आमरण उपवास या अनशन सत्याग्रह के शस्त्रागार का अन्तिम शस्त्र है, इसे इसके सम्पूर्ण निहितार्थ के साथ स्वीकार करना चाहिए। महत्वपूर्ण स्वयं उपवास या उपवासकर्ता नहीं बल्कि उसका निहितार्थ है।''

कुल मिलाकर यह मुठ्ठीभर जनों का आन्दोलन नहीं वरन सभी के सहयोग से जारी जनान्दोलन है और जनहित में है जिस पर किये गये हर दमनात्मक प्रयास, प्रयासकर्ताओं को ही हर दृष्टि से निन्दित करेगा। यही कारण है आज जिला प्रशासन चहुंओर हर वर्ग द्वारा किये जा रहे निन्दा का पात्र बन चुका है। आज नागरिक और प्रशासन दोनों असहज स्थिति के शिकार हैं जिसे सामान्य बनाने की दिशा में उपयुक्त होगा कि जनपद के बौद्धिक जनों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के बीच वर्तमान हालत विषयक एक गोष्ठी तत्काल आयोजित की जाय फिर समस्त के विचार विनिमय के उपरान्त निकले निष्कर्ष से समाचार पत्रों आदि के माध्यम जनपदवासियों को भी अवगत कराया जाय जिससे जिले के बुजुर्गों के इस कथन ‘‘कि विश्वविद्यालय की मांग कर रहे छात्र आन्दोलनकारियों के प्रति प्रशासन द्वारा बर्बरता पूर्वक की गयी दमनात्मक कार्यवाही ने ब्रितानिया हुकुमत की याद दिला दी है’’ पर विराम लग सके।

शिवेन्द्र पाठक
गाजीपुर
सम्पर्क- 09415290771

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