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जनता का पैसा और सिस्टम का नाकारापन

भारत सरकार पर जनता के पैसे को खर्च करने की जिम्मेवारी होती है, जिसे वह अनेक प्रकार के टैक्स के रूप में जनता से वसूल करती है. केंद्र तथा राज्य सरकारें मिलकर एक साल में लगभग 15 से 16 लाख करोड़ रुपये खर्च करती हैं, जिसमें 60 प्रतिशत केंद्र द्वारा तथा 40 प्रतिशत राज्यों द्वारा खर्च होता है. इस पैसे का लेखा-जोखा (audit) रखने की जिम्मेवारी Comptroller and Auditor General (CAG, कैग) पर होती है.

भारत सरकार पर जनता के पैसे को खर्च करने की जिम्मेवारी होती है, जिसे वह अनेक प्रकार के टैक्स के रूप में जनता से वसूल करती है. केंद्र तथा राज्य सरकारें मिलकर एक साल में लगभग 15 से 16 लाख करोड़ रुपये खर्च करती हैं, जिसमें 60 प्रतिशत केंद्र द्वारा तथा 40 प्रतिशत राज्यों द्वारा खर्च होता है. इस पैसे का लेखा-जोखा (audit) रखने की जिम्मेवारी Comptroller and Auditor General (CAG, कैग) पर होती है.

संविधान द्वारा स्थापित चुनाव आयोग (EC), केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC) तथा कैग- इन तीन संस्थाओं पर शासन की गुणवत्ता निश्चित करने की जिम्मेवारी होती है. इनकी प्राथमिकी पर ही केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) गहराई से छान-बीन कर मामले को अदालत तक पहुंचाता है. आज़ादी के तुरंत बाद डाक्टर अम्बेडकर ने कहा कि कैग द्वारा पैसे का सही हिसाब-किताब रखना उच्चतम न्यायालय के काम से ज्यादा महत्वपूर्ण है. भ्रष्टाचार के विकराल रूप लेने में इन संस्थाओं की निष्क्रियता एक मुख्य कारण बनती है.

1990 के दशक में टी.एन. शेषन ने चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र एवं सक्रिय रूप दिया, जिसके कारण चुनावों के दौरान अपराधिक घटनाओं पर नियंत्रण आया. अभी चुनावों में पैसे की शक्ति को कम करना बाकि है. 90 के ही दशक में बिहार राज्य का 37 करोड़ 70 लाख रुपये का चारा घोटाला लगातार सुर्ख़ियों में रहा, जिसमें 17 वर्ष बाद इस वर्ष दोषियों को सज़ा हुई है. बिहार राज्य का एक छोटा सा विभाग कई वर्षों तक खजाने से सीधे पैसा निकालता रहा और शीर्ष संस्था कैग को इंडियन एक्सप्रेस (मार्च 25, 1996) की एक विस्तृत रिपोर्ट से इसका पता चला.

पिछले पांच वर्षों में कैग संस्था की अचानक बढी सक्रियता से सरकार हतप्रभ हुई. कैग विनोद राय सुर्खिओं में आये जब उन्होनें २ जी, कोलगेट, कामनवेल्थ गेम्स आदि अनेक घोटालों को उजागर किया. इन घोटालों को जनता के समक्ष लाने में टीवी मीडिया ने भी सक्रिय भूमिका निभाई. इन सभी मामलों में सीबीआई ने गहराई से छान-बीन की और अदालत से दोषियों को सजा भी दिलवाई.

कैग के अनुमान के अनुसार कोयला घोटाले में  1.86 लाख करोड़ रुपये का नुक्सान हुआ. केंद्र सरकार ने कैग पर कार्यपालिका की नीतिओं में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया. परंतू सन २००४ में कोयला मंत्रालय के सचिव ने पुरानी स्क्रीनिंग कमेटी की खामिओं के बारे में सरकार को आगाह किया था परन्तु कोयला मंत्रालय ने अपने सचिव के नोट की अनदेखी की. कैग ने अपनी कोई नीति न बनाते हुए सरकार की नीतिओं के आधार पर ही नुक्सान की गणना की. सन 1971 में पारित कैग (डीपीसी) एक्ट के अनुसार कैग को सरकार की वित्तीय जांच के अतिरिक्त उसके प्रदर्शन की जांच का भी अधिकार है. सरकार ने जनता के पैसे का कुशलता से उपयोग किया या नहीं – यह कैग के अधिकार क्षेत्र मैं आता है.

यहाँ पर मंत्री तथा मंत्रालय के सचिव के अधिकारों की विवेचना करना जरूरी है. हालांकि पोलिसी बनाने में सचिव अपनी राय देता है, परंतू पालिसी की जिम्मेवारी मंत्री की होती है. भारत सरकार द्वारा सन 2005 में जारी किये वित्तीय नियमों के अनुसार सचिव मंत्रालय का मुख्य लेखा-जोखा अधिकारी है. उसके ऊपर पालिसी के तहत प्रोग्राम को अंजाम तक ले जाने की भी जिम्मेवारी है. इसके अलावा किसी भी पालिसी पर पार्लियामेंट की जन लेखा कमिटी (PAC) के समक्ष जबाबदेही भी उसी की है. फिर मंत्रालय के काम की समीक्षा के लिए कैग भी है. यदि कैग मंत्रालय के कामकाज पर कोई अनुचित टिप्पणी करता है तो धारा 311 के तहत मंत्री अपने अधिकार से सचिव को दण्डित भी कर सकता है.

कैग को अपनी कार्यशैली की भी समीक्षा करनी चाहिए. भारत ही ऐसा एक देश है जहाँ ऑडिट कोड, मैनुअल्स आदि गुप्त रखे जाते हैं, जबकि यहाँ भी कुछ दशक पहले ये आसानी से बुकस्टोर्स पर उपलब्ध होते थे. उसी प्रकार भारत कुछ विरले देशों में आता है जहाँ पर कैग केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों का ऑडिट खुद ही करता है. राज्य स्तर पर लेखा अधिकारी को कोई अधिकार नहीं हैं.

सन १९९२ में जब कैग पर सुस्त होने के आरोप लगे तो उसने शकधर कमेटी का गठन किया. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया की राज्य विधान सभा की वित्त कमेटीयां लेखा रिपोर्ट्स पर बहस को वर्षों तक टाले रखती हैं. इस सन्दर्भ में राजीव गांधी में राज्यों के कार्यक्षेत्र में आने वाले ग्रामीण विकास कार्यक्रम पर की गयी टिप्पणी महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा था कि इन योजनाओं पर सरकारी बजट का केवल 15 प्रतिशत पैसा ही गाँवों तक पहुँचता है.

लेखक कन्हैया झा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के शोध छात्र हैं. उनसे संपर्क +919958806745, (Delhi) +918962166336 (Bhopal) या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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