Dev Gupta : 'जानेमन' का इंतजार था, पर इजहार करने में इंतहा हो गयी….. 'जानेमन' को आनलाइन मंगाने के बाद पढ़ने के लिए बेसब्री से इंतजार था। 'जानेमन' के मिलने की डेट 20 अगस्त के बाद तय थी, न मिलने पर फोन भी किया तो तकनीकी कारण का पता चला। 22 को किताब मिल गयी। भेजने वाले शख्स शैलेष भारतीय का धन्यवाद करने के बाद पढ़ना शुरू किया। पत्रकारिता करते हुए पढ़ना था तो अपना मनपसंद समय निकाला रात का। तीन दिनों में पूरी किताब पढ़ ली।
किताब के बीच में कुछ पत्रकार मित्रों का जिक्र था, तो लगा कि मैने कमेंट करने में जल्दी की होती तो मैं भी वहां होता। सोचा किताब पर प्रतिक्रिया मैं ही पहले लिखूंगा, पर यहां भी मेरे लिखने में इंतहा हो गयी। आखिरकार अन्य लोगों की प्रतिक्रिया को देख प्रतिक्रिया देने का मन हुआ, सो लिख दिया। जैसे के हर खबर की जान उसका शीर्षक व इंट्रो होता है, वैसे ही 'जानेमन जेल' का नाम ही काफी है, अन्दर के पन्ने पलटने के लिए।
सबसे बड़ी बात कि जेल की जीके बढ़ाती है किताब जिसमें बंदी और कैदी का अन्तर सबसे महत्वपूर्ण है। इस अन्तर को पत्रकारिता के कर्इ पर्वतदिगार द्वारा एक समान अर्थात बंदी व कैदी में कोर्इ अन्तर नहीं करते देखा गया है। जेल की रिपोर्टिंग मैंने नहीं की। कायदे से मुझे भी क्लीयर नहीं पता था, पर जानेमन पढ़ने के बाद पता चला मठाधीश क्या लिख देते हैं।
दूसरी बात इस किताब को पढ़कर कर्इ और किताबें पढ़ने की उत्सुकता बढ़ी। उपन्यास कभी पढ़ा नहीं, बस उसकी मोटार्इ देखकर मन बोर हो जाता था। पर जानेमन से कर्इ किताबों के पढ़ने व कलेक्शन करने का भाव पैदा हुआ। जानेमन की एक वनलाइनर जिसे शायद हर स्ट्रींगर के मुंह से निकल जाता है, खास कर पूर्वांचल की फेमस वन लाइनर है। सबसे बड़ी बात जो मेरा भी विचार है कि कुछ भी हो जाये, जिन्दगी रुकती नहीं। उसी तरह किताब 'जानेमन जेल' ये प्रेरणा देती है कि आप कहीं भी हों, जिन्दगी रुकती नहीं…..उसे चलाते जाओ। जेल से सबको डर लगता है और लगना भी चाहिए। जेल सजा के लिए होता है पर सच्चे लोग भी जेल जाते हैं। तो वहां भी अपनी सच्चार्इ को जारी रखो….. जैसे जेल के सच्चे अनुभव से जारी हुआ जानेमन………।
जनसंदेश टाइम्स में कार्यरत मिर्जापुर निवासी पत्रकार देव गुप्ता के फेसबुक वॉल से.





