वर्धा : लोकनायक जयप्रकाश के जन्म दिवस पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अहिंसा और शांति अध्ययन विभाग की ओर से ‘संपूर्ण क्रांति: एक मूल्यांकन’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान समारोह का आयोजन किया गया। विवि के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरूजी शांति अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने जयप्रकाश के प्रांरभिक जीवन एवं सामाजिक जीवन के बीच के पडा़वों को स्पष्ट करते हुए कहा कि साम्यवादी जयप्रकाश समाजवादी होते हुए सर्वोदय में प्रशिक्षण लेते हैं।
उन्हें कहना पड़ता है कि समाजवाद को सर्वोदय में विलीन होना पडे़गा। बिहार आंदोलन की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि 25 मार्च, 1974 के बाद अहिंसक क्रांति का बीज जे.पी. ने बोया और इसी कारण श्रीमती इंदिरा गांधी को कहना पडा़ कि ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता सक्रिय राजनीति में उतरने की कोशिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, इन पर सेना और पुलिस को भड़काने का भी आरोप लगा। 5 जून को गांधी मैदान से जे.पी. ने घोषणा की थी कि यह कोई विधानसभा विघटन का आंदोलन नहीं है बल्कि संपूर्ण क्रांति का आंदोलन है। 1973 में ही जेपी इस संकट को समझ चुके थे इसलिए उन्होंने ‘यूथ फार डेमोक्रेसी’ का गठन किया था।
12 जनू,1977 को इलाहबाद उच्च नयायालय के ऐतिहासिक फैसले ने देश में जिस आतंक का बीजारोपण किया उसकी परिणति आपातकाल में हुई लेकिन बनने वाली सरकार ने जनता के संदेश को नहीं समझा। आंदोलन का स्पष्ट संकेत था कि अगर कोई प्रतिनिधि या सरकार भ्रष्ट आततायी या निकम्मी हो गई तो मतदाता को उनका इस्तीफा मांगने का अधिकार है। इनके बीच सार्वजनिक तू-तू मैं-मैं के तमाशे से जनता ऊब गई और सरकार का ‘प्रिमैच्योर एबार्शन’ हो गया।
प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि संपूर्ण क्रांति एक स्वप्न है उसे एक व्यक्ति पूरा कर ही नहीं सकता एक पीढी़ भी उसके लिए कम है। दरअसल संपूर्ण क्रांति की पूरी संकल्पना तानाशही के विरूद्ध छेडे़ गए आंदोलन के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। जनता को सरकार से अधिक मजबूत बनाने का स्वप्न धरा रह गया। जे.पी. ने साफ कहा था कि मनुष्य और समाज की जड़ता वैचारिक बौद्धिक क्रांति से समाप्त होती है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि –
‘है जयप्रकाश वह नाम जिसे
इतिहास समादर देता है
बढ़कर जिसके पद चिन्हों को
उर पर अंकित कर लेता है’
आनंद पटवर्धन ने 1975 में लिखा कि ‘दलगत राजनीति संसदीय कार्य प्रणाली में सुधार ला सकती है परन्तु क्राति नहीं ला सकती। जनता पार्टी की सरकार में भी प्रतिशोध के कृत्य चलते रहे और जब लौटकर इंदिरा गांधी की सरकार आयी तो उसने भी कुदाल जॉच आयोग का गठन कर गांधीय संस्थाओं को कटघरे में खडा़ करने की तमाम कोशिश की। इन सभी के बीच हमारे सामने यह सवाल खडा़ है कि संपूर्ण क्रांति ने जो संदेश दिया था उस संदेश का अनुपालन उसी प्रकार नहीं हुआ या विस्मृत किया गया जिस तरह 1947 के बाद गांधी के सपनों को सपना ही रखा गया।
अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग के अध्यक्ष डॉ.नृपेन्द्र प्रसाद मोदी ने अपने स्वागत एवं संचालन करते हुए कहा कि लोकनायक दूसरी आजादी के नायक थे और वे हमारे लिए अविस्मरणीय हैं। इस अवसर पर डॉ.धूपनाथ प्रसाद, डॉ.चित्रा माली, डॉ.मिथिलेश सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थिति रहे।
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