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मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में फीलगुड चौहान को सिंधिया की चुनौती

भोपाल : कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में चुनाव अभियान समिति की कमान अंततः केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी हैं।  कांग्रेस के इस ऐलान से सत्तारूढ़ भाजपा की धुकधुकी बढ़ गयी है। इस घोषणा के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संगठन के महत्वाकांक्षी मुखिया  नरेंद्र तोमर और  सांसद प्रभात झा समेत भाजपा नेताओं के बयानों से  जाहिर है कि भयाक्रांत बीजेपी को अब अपनी रणनीति  नये सिरे से तैयार करनी होगी। कांग्रेस आलाकमान के ताजा फैसले से फीलगुड में डूबी भाजपा की दिक्कतें इस नाते बढ़ गयी है कि कांग्रेस ने ब्रांड शिवराज के मुकाबले ऐसे ब्राण्ड को मैदान में उतारा है, जो कहीं अधिक आकर्षक, चमकीला और आबदार है तथा पांसा  पलटने की  ताब  रखता है।

भोपाल : कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में चुनाव अभियान समिति की कमान अंततः केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी हैं।  कांग्रेस के इस ऐलान से सत्तारूढ़ भाजपा की धुकधुकी बढ़ गयी है। इस घोषणा के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संगठन के महत्वाकांक्षी मुखिया  नरेंद्र तोमर और  सांसद प्रभात झा समेत भाजपा नेताओं के बयानों से  जाहिर है कि भयाक्रांत बीजेपी को अब अपनी रणनीति  नये सिरे से तैयार करनी होगी। कांग्रेस आलाकमान के ताजा फैसले से फीलगुड में डूबी भाजपा की दिक्कतें इस नाते बढ़ गयी है कि कांग्रेस ने ब्रांड शिवराज के मुकाबले ऐसे ब्राण्ड को मैदान में उतारा है, जो कहीं अधिक आकर्षक, चमकीला और आबदार है तथा पांसा  पलटने की  ताब  रखता है।

फिलवक्त मध्य प्रदेश चुनावों की देहलीज पर है औेर भारतीय जनता  तीसरी पारी खेलने को  बेताब। कांग्रेस में आंतरिक बिखराव औेर गुटबाजी के चलते बीजेपी कुछ सालों से फीलगुड में डूबी हुई हैं। उनका यह फीलगुड इनके छोटे बड़े नेताओं  के बयानों में फिर फिर व्यक्त होता रहा हैं । कांग्रेस का मखौल उड़ाने  में बीजेपी के वार्ड स्तर से लेकर राज्य और राष्ट्र स्तर तक के नेता पीछे नहीं रहे, लेकिन 3 सितंबर को तस्वीर बदलने के सिलसिले की शुरुआत तब हो गयी, जब  कांग्रेस आलाकमान ने तमाम धड़ों  को एकजुट कराने के कदम उठाये और मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान केंद्रीय  ऊर्जा राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी। इसके साथ ही  पार्टी ने कमलनाथ दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुरेश पचौरी, अजय सिंह, अरूण यादव, प्रेमचंद गुड्डू आदि को भी महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे।

यह अकारण नहीं है कि कांग्रेस ने रामेश्वर नीखरा, बालकवि बैरागी, प्रतापभानु शर्मा, मीनाक्षी नटराजन, बाला बच्चन, कुणाल चौधरी,  असलम शेर खां, आरिफ अकील, नरेन्द्र नाहटा, महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा, सत्यब्रत चतुर्वेदी, सज्जन वर्मा, एनपी प्रजापति, सत्यदेव  कटारे, गोविंद सिंह, विश्वेश्वर भगत,  कैप्टेन जयपाल सिंह, लक्ष्मण सिंह, विजयलक्ष्मी  साधो आदि को भी महत्वपूर्ण  दायित्व सौंपे । पार्टी के विभिन्न धड़ों में एका कायम करने के मकसद से कमलनाथ को विभिन्न समितियों का समन्वयक बनाया गया।

तीन सितंबर के  फैसले से यह तय हो गया कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में विधानसभा का चुनाव एक व्यक्ति नहीं, बल्कि टीम के बूते लड़ने के मूड में हैं । उसने चुनाव के  पूर्व सीएम के नाम का ऐलान नहीं करने की  अपनी परंपरा  कायम रखी और ‘ वन मैन मार्का‘ रणनीति अख्तियार नहीं की। साथ ही आत्ममुग्ध बीजेपी को  कड़ी टक्कर देने के  प्रयोजन से उसने ब्रांड शिवराज के मुकाबले ब्राण्ड सिंंिधया मैदान में उतार दिया ।

मध्य प्रदेश बीजेपी  की तीसरी  पारी की उम्मीद सुषमा स्वराज और अरूण जेटली से लेकर राजनाथ सिंह  तक को इसलिये  है कि उन्हें ब्राण्ड शिवराज पर जरूरत से ज्यादा यकीन है। इस ब्राण्ड की दूसरी बार सफलता के भरोसे वे इसलिये पेशगी फूले नहीं समा रहे थे कि कांग्रेस की ओर से मुकाबले में कोई ब्राण्ड न था।, जिस तरह नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव 2014 के संपन्न होने के करीब एक  साल पहले से  प्राइम मिनिस्टर की तरह ‘ बिहेव‘ करना शुरू कर दिया है, इसी तरह पांव पांव  वाले  भैया जी कई माह पहलीे  से ऐसा आचरण  करने लगे है मानों प्रदेश की जनता ने उन्हें चुनाव के पहले बिना  मतदान के फिर से सीएम चुन लिया हो।

मप्र में बीजेपी के पास  एक ही सिक्का है। एक मात्र सिक्का शिवराज । फकत शिवराज। कोई दूसरा सिक्का नहीं । कोई चवन्नी अठन्नी नहींे । कोई रेजगारी नहींे। सिक्का ऐसा है कि पार्टी ने सारी चिल्हर पर धूल डाल दी। मप्र में बीजेपी की दशा देखिये शिवराज कप्तान। इलेवन (एकादश) के 11 खिलाड़ियों का अता पता नहीं। शिवराज  अलोन विल प्ले द गेम। गुमान का  आलम यह है कि कप्तान को टीम की जरूरत ही नहीं। मप्र में सत्ता दल के वरिष्ठतम नेता ने जब निजी चर्चा में कहा कि शिवराज को टीम की जरूरत ही नहीं । वे तो स्वयं को महाबली मानते हैं, तो अचरज नहींे हुआ। यकीनन शिवराज को न तो मप्र की राजनीति के अपराजेय योद्धा। बाबूलाल गौर के मश्वरे की जरूरत है और न ही अपने करिश्माई व्यक्तित्व से मप्र में बीजेपी को सत्ता में लाने  वाली गैरिक वसना संन्यासिनी उमा भारती की ओैर तो और वे प्रभात झा और अनिल दवे जैसे  बौद्धिक सहयोगियों पर भी ज्यादा यकीन नहीं करते । संगठन के  कूचे से प्रभात झा की बहुत बेआबरू विदाई का सबब कोई ओर नहीं चोैहान ही थे और जावली के कमांडर अनिल माधव दबे से उनके रिश्तों का आलम यह है कि चौहान ने उन्हें  करीब एक  साल तक मिलने के लिये अपाइन्टमेंट तक  नहीं दिया। प्रभुता से मद आता हैं मद  से गुरूर ओैर गरूर गफलत पैदा करता है। इन गफलतों में सलाहकारों और नौकरशाहों ने खूब  हवा भरी हैं मलाई चाट-चाट कर भरी हवा से फुग्गा फूल गया हैं चाचा- ताऊ , बुआ- मौसी की जरूरत नहीं, बीजेपी की नैया मप्र में अकेले मामा जी पार लगायेंगे।

तो अब शिवराज मामा के मुकाबले कांग्रेस ने अपना ब्राण्ड उतार दिया हैं। इधर ब्राण्ड का ऐलान हुआ, उधर बीजेपी की जुबान फिसलने का  दौर शुरू । तरकश का पहला तीर निकला सामंतवाद का । सिंधिया से  करारा जवाब मिला । शिव राज  बूमरैंग के शिकार हुए । वे राजमाता को भूल गये। इन राजमाता विजयराजे सिंधिया को जिन्होंने बीजेपी की  मप्र में सही अर्थों में स्थापना की। शिवराज ने  बयान देने से  पेश्तर बेहतर होता कि  अपने  गुरू सुंदरलाल पटवा से  मश्वरा कर लिया होता। बीजेपी में  सखलेचा के मुकाबले पटवा की सत्ता  स्थापित हुई तो किसकी बदौलत? उमा भारती को  बीजेपी में कौन लाया? शीतला सहाय, नरेश जौहरी, जगदीश गुप्ता, दादा  सुखेन्द्र सिंह,  शेजवलकर, ईश्वर दास रोहाणी जैसे नेताओं के राजनीतिक  करियर को किसने संवारा? मप्र में  भगवा-ब्रिगेड की प्रातः स्मरणीय शख्सियत  राजमाता को एकबारगी छोड़ भी दें तो वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया के बारे में  सामंतवादी होने का बयान किसान पुत्र शिवराज ने अब तक क्यों नहीं किया ?

वस्तुतः इस देश में आपात्काल के बाद ऐसी घटानाएं घटी हैं कि वंशवाद और  सामंतवाद के मुद्दे  अप्रासंगिक हो गये है। दरअसल शिवराज का  बयान ब्राण्ड सिंधिया के ऐलान से पैदा हुई झुरझुरी का नतीजा है। बताते हैं कि बीजेपी ने फैसला किया है कि पार्टी की ओर से जयभान पवैया, प्रभात झा और यशोधरा राजे  ज्योतिरादित्य को घेरेंगे। यदि ऐसा है तो यह चयन ही अटपटा और और हास्यास्पद है । एक ओर जहां  पवैया की सामर्थ्य को लेकर संशय है, वहीं राहुल  भैया की की गुगली के शिकार प्रभात झा, जो अपनी ही पार्टी के सखा के  दिये घाव सहला रहे हैं, आखिर किन मुद्दों को लेकर सिंधिया को घेरेंगे? रही बात यशोधरा की, सो यह सिंधिया,  घराने की परिपार्टी है कि  उसके सदस्य एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा नहीं बांधते।

ज्योतिरादित्य के मैदान में आने, उनकी भाव भंगिमा और तेवरों से बीजेपी का  यकीन मुगालते में बदल गया है कि ब्राण्ड शिवराज का कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं है। जहां तकि ब्राण्ड सिंधिया की बात है, अपने घराने की गौरव  गरिमा,  पिता  स्व माधवराज सिंधिया की  बेदाग छवि और रजानीतिक  पुण्य प्रताप तथा अपने  आकर्षक व्यक्तित्व के  कारण ज्योतिरादित्य ऐसे  चमकीले  ब्राण्ड है, जिसके सामने ब्राण्ड शिवराज मलिन दीखते है। ज्योतिरादित्य  युवा हैं, डायनामिक हैं और कहीं भी परिचय के मोहताज नहीं है। इनकी कमीज बेतरह उजली है। न वहां नेपथ्य में  डंपर का शोर है और न ही शर्मा और सूर्यवंशी को प्रश्रय का लांछन । यह सिंधिया का क्रेज, उनका ग्लैमर और उनकी छवि है कि 11 सितंबर को  राजधानी भोपाल की फिजां बदली हुई नजर आयी । प्रेस कांफ्रेंस और मीट द प्रेस में उन्होंने जिस तरह प्रश्नों के उत्तर दिये, वह उनकी परिपक्वता, सोच और समझ दर्शाता है। उनके पास प्रांजल भाषा है, आकर्षक प्रभावशाली शैली है और वे स्पष्टवादी  व सकारात्मक हैं। सामंती पृष्ठभूमि के लांछन पर उन्होंने जिस तरह बीजेपी को दोमुंहेपन के लिए आड़े हाथों लिया, वह बेशक सराहनीय हैं उन्होंने  कहा कि  सामंतवाद जनम से  नहीं होता, कार्यप्रणाली से होता हैं उन्होंने यह भी कहा कि वे महाराज या श्रीमंत कहलाना  पसंद नहीं करते ।  उन्हें लालबत्ती भी पसंद नहीं और वे कम बोलने, ज्यादा करने में भरोसा रखते हैं।

ताजा फैसले से  कांग्रेस की यह कोशिश साफ नजर आती है कि ज्योतिरादित्य की फेस वैल्यू और बेदाग छवि को भुनाया जाये। पार्टी सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी मानते हैं कि ज्येातिरादित्य युवाओं को बखूबी आकर्षित कर सकते हैं । प्रतीत होता है कि सिंधिया को इस  आशय का संकेत बहुत पहले मिल गया था, नतीजतन वे चंबल- ग्वालियर के अलावा  मालवा, निमाड़, बुंदेलखंड के दौरे कर चुके है। मुरैना  रैली में उनका स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित हुआ । राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के जरिये वे करीब तीन दर्जन जिलों में सभायें कर चुके है। उन्होंने किसान सम्मेलनों में भी शिरकत की है। एक बड़ी  बात  जो भाजपा भूल रही है, यह है कि ज्योतिरादित्य के पास पिता और  पितामही का जादुई ताबीज है। यह ताबीज आसन्न चुनाव में असर दिखायेगा । राजमाता कभी मध्य प्रदेश की राजनीति में नयी इबारतें लिखने का सबब बनी थीं और माधव ……..? माधव राव तो इस महादेश की राजनीति के अपराजेय योद्धा थे । यह उनकी अपार लोकप्रियता ही थी कि उन्होंने देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे अटलबिहारी  वाजपेयी को पौने दो लाख मतों से शिकस्त दी थी। बीजेपी के आत्ममुग्ध पुरोधाओं  को यादव होगा कि  तब अटल जी ने मतगणना समाप्ति के पूर्व ही विनम्रतापूर्वक अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी।

कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता है । क्या मध्य प्रदेश में किंचित भिन्नता के साथ इतिहास दोहराया जायेगा? इस फैसले में अभी थोड़ा व समय है किंतु अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्राण्ड सिंधिया के मुकाबले के लिये सरकारी टकसाल में  गढ़े ब्राण्ड शिवराज की ओर से क्या रणनीति  अख्तियार की जाती है? इस बीच  नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह लोकायुक्त के  सम्मुख इस आशय की शिकायत दर्ज कर चुके हैं कि सीएम शिवराज ने तीन माह में खुद की ब्रांडिंग पर 500 करोड़ रूपये  खर्च किये हैं।

डा. सुधीर सक्सेना मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वर्षों तक 'माया' के ब्यूरो प्रमुख रहे हैं. वर्तमान में 'दुनिया इन दिनो' मैग्जीन के संपादक हैं. उनसे संपर्क 09711123909 या 09425022404 के जरिए किया जा सकता है.

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