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आपदा के बाद ईटीवी, उत्तराखंड को बहुगुणा सरकार ने पौने दो करोड़ रुपये दिए

: आपदा से कराह रहा था उत्तराखंड, विजय बहुगुणा एंड कंपनी मीडिया मैनेज कर रही थी : कर्णप्रयाग : उत्तराखंड में 15, 16 जून को आई भारी बारिश ने उत्तराखंड की विजय बहुगुणा की सरकार के आपदा प्रबंधन के दावों की पोल खोल कर रख दी. स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया लचर आपदा प्रबंधन और उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किए गए विनाशकारी विकास की खबरों के साथ राज्य सरकार पर टूट पड़ा. खोज, राहत और बचाव का अभियान शुरू हुआ और धीरे-धीरे मीडिया की सरकार के प्रति तल्खी भी कुछ कम पड़ने लगी. समाचार पत्रों में उत्तराखंड की सरकार की अपील और उपलब्धियां भी दिखनी शुरू हो गयी. स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया के नर्म सुरों से लगा की सरकार ने अपनी लापरवाही से सबक सीखते हुए व्यवस्था को चाक-चौबन्द करना शुरू कर दिया है.

: आपदा से कराह रहा था उत्तराखंड, विजय बहुगुणा एंड कंपनी मीडिया मैनेज कर रही थी : कर्णप्रयाग : उत्तराखंड में 15, 16 जून को आई भारी बारिश ने उत्तराखंड की विजय बहुगुणा की सरकार के आपदा प्रबंधन के दावों की पोल खोल कर रख दी. स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया लचर आपदा प्रबंधन और उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किए गए विनाशकारी विकास की खबरों के साथ राज्य सरकार पर टूट पड़ा. खोज, राहत और बचाव का अभियान शुरू हुआ और धीरे-धीरे मीडिया की सरकार के प्रति तल्खी भी कुछ कम पड़ने लगी. समाचार पत्रों में उत्तराखंड की सरकार की अपील और उपलब्धियां भी दिखनी शुरू हो गयी. स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया के नर्म सुरों से लगा की सरकार ने अपनी लापरवाही से सबक सीखते हुए व्यवस्था को चाक-चौबन्द करना शुरू कर दिया है.

लेकिन अब सूचना अधिकार से हुआ खुलासा बता रहा है कि मीडिया के स्वरों में नरमी की वजह सरकार का आपदा से निपटने के प्रति संवेदनशील रवैया नहीं बल्कि कुशल मीडिया मैनेजमेंट है. आर.टी.आई.कार्यकर्ता गुरविन्दर सिंह चड्ढा द्वारा सूचना अधिकार के अंतर्गत प्राप्त आंकड़े सरकार के प्रति मीडिया के रुख में आई नरमी का कारण काफी हद तक स्पष्ट करते हैं. राज्य के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के लोक सूचना अधिकारी आशीष कुमार त्रिपाठी द्वारा उपलब्ध करवायी गयी सूचना के अनुसार आपदा आने के बाद से 04 सितम्बर 2013 (सूचना आवेदन की तिथि) तक राज्य सरकार ने इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया को 22,77,42,510 रु.(बाईस करोड़ सत्तर लाख बयालीस हज़ार पाँच सौ दस रुपये) के विज्ञापन बांटे. इसमें से 10,62,28,042 (दस करोड़ बासठ लाख अट्ठाईस हज़ार बयालीस रुपए) के विज्ञापन तो समाचार चैनलों की झोली में ही गिरे.

प्रतिदिन सरकारी विज्ञापन को खबर की शैली में दिखाने वाले न्यूज़ चैनल-ई.टी.वी.पर तो सरकार की विज्ञापनी मेहरबानी जम कर बरसी. ई.टी.वी.को 1,78,33,650 रु. (एक करोड़ अठत्तर लाख तैंतीस हज़ार छह सौ पचास रुपया) जून 2013 के बाद दिया गया. इतना ही नहीं  ई.टी.वी. उर्दू को भी 25,28,850 रु. विज्ञापन के रूप में मिला. निजी एफ.एम.चैनल-रेडियो मिर्ची जिंगल पर भी सरकार ख़ासी मेहरबान रही, जिसे 1,27,39,122 रु. का विज्ञापन दिया गया।

यह इसलिए भी चौंकाने वाला है कि उत्तराखंड के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में तो एफ.एम.रेडियो चलता ही नहीं है.टी.वी.100, इंडिया न्यूज, समाचार प्लस, वॉयस आफ नेशन, जैन टी.वी.आदि स्थानीय न्यूज चैनल आपदा के विज्ञापनों की बौछार में एक करोड़ के क्लब में शामिल होने से मात्र कुछ लाख रुपये ही पीछे रहे. दिल्ली वाले न्यूज चैनल हालांकि इनसे काफी पीछे थे पर विज्ञापनों में उनका शेयर भी लाखों में ही था.

सरकार द्वारा आपदा के समय विज्ञापनों का भार कितना था, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि 23 जून 2013 को मुसीबत की घड़ी में साथ रहने का विज्ञापन 28.50 लाख रुपये का था तो 24 जून 2013 को ऐसा ही विज्ञापन 31.50 लाख रुपये “मात्र” का था। मुख्यमंत्री की अपील 6. 55 लाख की थी तो आपदा प्रबंधन मंत्री की अपील 5.80 लाख रुपये की थी.

प्रदेश से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्रों को दैवीय आपदा पर आधारित विज्ञापनों के लिए दो भुगतानों का ब्यौरा सूचना एवं लोकसमपर्क विभाग द्वारा दी गयी सूचना में है. प्रदेश से प्रकाशित समाचार पत्रों को एक भुगतान 31,26,826 का है तो दूसरा 62,389 रुपये का है तथा इसमें अवशेष भुगतान 26,053 रुपये का है। विज्ञापन एजेंसियों के माध्यम से किया गया भुगतान 82,76,446 रुपये का है और इनको दी जाने वाली बकाया धनराशि 70,84 360 रुपये है.

भारत की कम्युनिष्ट पार्टी (माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी कहते हैं की एक ऐसे समय में जबकि लोग अपना सब कुछ गंवा रहे थे या गँवाने के कगार पर खड़े तो उन्हें संकट से उबारने के त्वरित उपाय करने के बजाय सरकार का ज़ोर इस पर ज्यादा रहा कि इन अभागों की बदहाली की दास्तान सामने ना आने पाये और समाचार माध्यमों को प्रभावित करके वह अपनी साख बचा ले. सरकार द्वारा समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों को विज्ञापन दिया जाना एक रूटीन प्रक्रिया है। लेकिन पिछले एक साल से तमाम समाचार माध्यमों के प्रति अपने रूखे व्यवहार के लिए चर्चित सरकार, जब संकट की घड़ी में विज्ञापनों की भारी बारिश करती है तो उसकी मंशा पर संदेह होना लाज़मी है.

कर्णप्रयाग से अरविंद चौहान की रिपोर्ट.

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