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जब शूर्पणखा नाक कटाने से पहले भाग गई

साल 2000 का दशहरा मनाने के बाद हमारी मंडली को रामलीला करने का खयाल आया। उन दिनों गांवों में टीवी की ज्यादा पहुंच नहीं थी, इसलिए रामलीला, स्वांग और इसी तरह के आयोजन मनोरंजन का बड़ा माध्यम थे। आखिरकार हमारी मित्र मंडली ने फैसला किया कि इस बार हम रामलीला का मंचन करेंगे। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि इस बारे में ज्यादा प्रचार नहीं किया जाएगा, क्योंकि हमारे पात्रों की यह पहली ही रामलीला थी।

साल 2000 का दशहरा मनाने के बाद हमारी मंडली को रामलीला करने का खयाल आया। उन दिनों गांवों में टीवी की ज्यादा पहुंच नहीं थी, इसलिए रामलीला, स्वांग और इसी तरह के आयोजन मनोरंजन का बड़ा माध्यम थे। आखिरकार हमारी मित्र मंडली ने फैसला किया कि इस बार हम रामलीला का मंचन करेंगे। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि इस बारे में ज्यादा प्रचार नहीं किया जाएगा, क्योंकि हमारे पात्रों की यह पहली ही रामलीला थी।

अगर मंचन में कोई गड़बड़ हुई तो बड़े लोग खिल्ली उड़ाएंगे और इस असफलता को हमेशा याद रखा जाएगा। इसलिए बड़ों को रामलीला देखने का निमंत्रण नहीं दिया गया और हम चुपके-चुपके तैयारी करने लगे। समय कम था और काम ज्यादा। तय हुआ कि रामलीला के पहले ही दिन लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा का नाक काटा जाएगा। उस महान दिन के लिए हमने धनुष-बाण, धोती, चाकू और दूसरी जरूरतों का इंतजाम किया। रामलीला के संवाद लिखे गए। मन ही मन हमें गर्व की अनुभूति हो रही थी कि इस गांव के इतिहास में जो कभी नहीं हुआ वह आज होकर रहेगा। हम साबित कर दिखा देंगे कि बच्चे भी किसी से कम नहीं।

तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं। बस शाम होने का इंतजार था। तभी मेरे एक दोस्त ने कहा, रामलीला के मंचन के लिए यह जरूरी है कि मेरे बड़े भाई साहब यहां न आएं। अगर उन्होंने मुझे शूर्पणखा बनते देख लिया तो घर जाकर बहुत पिटाई होगी। मामला गंभीर था, लेकिन इसका तुरंत कोई बड़ा समाधान हमारे पास भी नहीं था। हम सिर्फ  दुआ कर सकते थे कि भाई साहब कुछ देर के लिए यहां से दूर रहें। अन्यथा रंग में भंग पड़ना तय है। रात को रामलीला के मंचन की तैयारी शुरू हुई। मालूम हुआ कि भाई साहब किसी जरूरी काम से बाहर गए थे। लगता था हमारी दुआ जल्द कबूल हो गई। रामलीला के पात्र शृंगार करने में व्यस्त थे। रावण तवे की कालिख से बड़ी-बड़ी मूंछें बना रहा था। लक्ष्मण अपने धनुष-बाण और चाकू की जांच कर रहा था। वहीं शूर्पणखा लक्ष्मण को बता रही थी कि नाक काटने के अभिनय में चाकू और नाक के बीच कितनी दूरी रहनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि सच्ची में नाक कट जाए। तैयारियां जोर-शोर से जारी थीं। सभी हालात हमारे पक्ष में लग रहे थे। मंच पर दरी बिछा दी गई थी। लालटेन पूरी रोशनी के साथ जल रही थी।

आखिर इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं और रामजी के जयकारे के साथ रामलीला का श्री गणेश हुआ। लंकेश रावण जरूरत से ज्यादा डरावना लग रहा था, तो लक्ष्मण अपने रोल के मुताबिक बहुत छोटा था। शूर्पणखा को देखकर डर कम और हंसी ज्यादा आ रही थी। इस विचित्र जमावड़े को देखकर दर्शकों का बुरा हाल था। पात्रों के हर संवाद पर लोग ताली पीटकर हंस रहे थे। रामलीला पूरे परवान पर थी। कुछ ही देर में शूर्पणखा की नाक कटने वाली थी। तभी हमें गांव की ओर आने वाले रास्ते पर कुछ रोशनी दिखाई दी। मोटरसाइकिल पर सवार कुछ लोग गांव की ओर आ रहे थे। कुछ और नजदीक आने पर आकृति जानी-पहचानी लगी। जब मोटरसाइकिल थोड़ी ही दूरी पर थी तो मालूम हुआ कि ये तो शूर्पणखा और रावण के बड़े भाई साहब थे। ऐसी स्थिति की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। यह देखकर शूर्पणखा और रावण मंच से सरपट भागे। शूर्पणखा अपने कपड़े फेंक कर निकर-शर्ट पहन चुकी थी। रावण अंधेरे में छुपकर दाढ़ी-मूंछ धो रहा था। हमारे अरमानों पर इतनी जल्दी पानी फिरेगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। मंच के पास आकर भाई साहब ने मोटरसाइकिल रोकी। यहां दर्शक बैठे थे और सभी पात्र गायब। इस पर वे बोले, नाटक बंद क्यों कर रखा है भाई? चालू करो तमाशा। अगर हमारे दोनों शैतान दिखाई दें तो उन्हें घर भेज देना। उनकी गणित की कॉपी देखे बहुत दिन हो गए।

इसके बाद वे घर चले गए। इधर रंग में भंग पड़ चुका था। रावण के चेहरे से दाढ़ी-मूंछ साफ हो चुकी थीं। शूर्पणखा का कोई अता-पता नहीं था। लक्ष्मण वहीं मौजूद था लेकिन अब उसका होना, न होना बराबर था। तभी एक लड़के ने खड़े होकर रामलीला समाप्ति की घोषणा की। दरी समेट कर अलमारी में रख दी। लालटेन बुझा दी गई। इतिहास में शायद यह पहली रामलीला थी जब शूर्पणखा नाक कटाने से पहले ही भाग गई।

राजीव शर्मा

संचालक

गांव का गुरुकुल

ganvkagurukul.blogspot.com

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