Samar Anarya : राजेन्द्र यादव के घर में कार्यरत एक व्यक्ति द्वारा एक युवा लेखिका का अशालीन वीडियो बना लिए जाने की और उसे सार्वजनिक कर दिए जाने की धमकी दी जाती है और लेखिका के शिकायत करने पर राजेन्द्र जी सुबह बात करने की बात करते हैं. तमाम प्रयासों के बाद अंततः जब बात होती है त उनके समे उस लड़की पर यौन हमला होता है, उसके कपड़े फाड़े जाते हैं और जब वह पुलिस बुलाने की कोशिश करती है तो राजेन्द्र यादव पहले पुलिस को वापस फोन कर न आने की सलाह देते हैं आर फिर आ जाने पर शराब की रिश्वत दे कोशिश करते हैं कि मामला दब जाय.
और इस सब पर उस लेखिका के बयान के बावजूद हिंदी पट्टी में इतना गहरा सन्नाटा होता है कि थानेदार विभूति बाबू का छिनाल प्रसंग याद आ जाता है. क्यों? सिर्फ इसीलिए कि इस मामले को एक साम्प्रदायिक, घोषित मोदी भक्त पत्रकार सामने ले कर आया? यकीन करिये कि आपकी चुप्पी से उस संघी पत्रकार की पहले से ख़त्म विश्वसनीयता को न कोई फ़र्क पड़ना था न पड़ा. हाँ आपकी प्रगतिशीलता की कलई जरूर थोड़ी सी और साफ़ हो गयी है. (भाई पंकज कुमार झा के इस प्रसंग पर मेरी 'चुप्पी' का राज पूछने पर हतप्रभ भर हुआ था मैं, क्योंकि खबर तक नहीं थी. अब हुई तो बोल रहा हूँ.)
लेखक अविनाश पांडेय 'समर' अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी हैं और इन दिनों हांगकांग में पदस्थ हैं. उन्होंने उपरोक्त बातें अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित की हैं. उनकी उपरोक्त बातें पर जो कुछ प्रतिक्रियाएं आई हैं, वो नीचे हैं..
पंकज कुमार झा धन्यवाद Samar भाई.
Indra Mani Upadhyay राजेन्द्र जी साहित्य के आशाराम हैं
Samar Anarya धन्यवाद कैसा पंकज भाई? मैं तो स्तब्ध हूँ कि खबर ही नहीं हुई इतनी बड़ी बात की, वरना जितना हो पाए बोलता हूँ मैं, चुप रहने वालों में से नहीं हूँ. हाँ, यह जरुर है कि संदिग्ध विश्वसनीयता वाले लोग सही सवाल भी उठायें तो हश्र यही होता है. ज्योति जी ने गलत आदमी चुन लिया अपनी बात रखने के लिए. और यहाँ मामला संघी होने की वजह से गलत होने का नहीं है, आप संघी हैं, मैं वामपंथी, एक दूसरे के लिए विचारधारात्मक रूप से गलत, पर उससे हम दोनों एक दूसरे की तथ्यात्मकता पर कहाँ शक करते हैं. पर कोई निष्पक्षता के नकाब में (या उस आदमी के लिए बुरका) मोदी भजन करे तो शक होना लाजमी है. पर आइये, अब मिल के लड़ते हैं. See Translation
Mohammad Yusuf English mein likhye
Surajit Dasgupta Who's this new netherworld creature?
Samar Anarya Rajendra Yadav is the most celebrated Hindi litterateur, editor of Hans and a champion of Dalit/feminist issues. The impartial patrkar is one Ashish Kumar Anshi, a sanghi stooge Surajit.
Surajit Dasgupta सड़कों पर जुलूस निकालो इनकी. नंगा करके मारो सालों को.
Surajit Dasgupta I am increasingly convinced there is no effective way of handling the women's security issue other than violent vigilantism.
Samar Anarya That's no solution Surajit, that would actually end up legitimizing the right wing vigilante groups only!!!
Surajit Dasgupta Apolitical vigilantism. On the spot justice. Whoever comes to know this has happened in his neighbourhood must immediately spring into action before any political group comes to know of it.
खां साहेब अंशु बाबू इतने मासूम तो नहीं हैं जितना मासूमियत भरा उनका लेख है। हुआ कुछ ये है कि ज्योति बोलती गयी और अंशु भाई दर्ज करते गए। कुछ स्वाभाविक सवाल या तो ज्योति से किए नहीं गए या फिर करने के बावजूद दर्ज नहीं किए गए।
अमिता नारायण जीओ समर!! जब तक सफ़ेदपोश यह सोचते रहेंगे की वो कुछ भी करें वो बच जाएँगे, बाक़ी डर की वजह से चुप रहेंगे, ऐसे वाक़या होते रहेंगे। hypocrisy can only go by baring such truths. It has to be fought at all levels.See Translation
Sandeep Kumar मामला केवल उतना ही नहीं है जितना अंशूजी बता रहे हैं. यह ज्योति कुमारी का सच है. एक सच प्रमोद का भी है लेकिन निस्संदेह इस सबमें सबसे घटिया भूमिका राजेंद्र यादव की है और उन सबकी भी जो इस बात को महत्त्वहीन या घटिया- छिछला बताकर इसे सार्वजनिक करने या सार्वजनिक टीप करने से बच रहे हैं.
Samar Anarya नारीवाद की जितनी समझ है खां साहेब, Sandeep भाई उसमें स्त्री के पक्ष को प्रधानता देनी ही होती है। और बात यहाँ उस संघी अंशु की है ही कहाँ, मामला यह है कि ज्योति ने पुलिस में जाने का, जाँच करवाने का हौसला किया है और अब तक की सूचना के मुताबिक़ राजेन्द्र यादव जाँच रोकने की कोशिश कर रहे हैं। बहुत कुछ साफ़ हो जाता है इसी से।
Sandeep Kumar आप को बातों से पूरी सहमती है Samar. पुरुष सत्ता इतनी घाघ है की आप जिन चीज़ों से बचने के लिए घर से बहार निकलते हैं आखिर में खुद को उन्ही बातों के अगुआ मठाधीशों के चंगुल में पाते हैं. तब आपकी बचाव की कोशिअहोन का ये लोग ऐसे ही गला घोंट देते हैं.
Meenu Jain मैं हिंदी की साहित्यकार नहीं हूं न ही हिंदी लेखक जगत की अंदरूनी राजनीति से परिचित हूं परंतु एक महिला लेखक पर हुए यौन हमले को रफा दफा करने की साजिश का पर्दाफाश किए जाने का जोरशोर से समर्थन करती हूं . इस प्रसंग को लेकर हिंदी पट्टी में छाए सन्नाटे की बात का उत्तर तो यह है कि ' बड़े आदमी ' से पंगा लेने में घबराते हैं सभी लेखक – चाहे पुरुष हों या स्त्री , वामपंथी हों या दक्षिणपंथी . मेरा सवाल यह है कि हिंदी की सारी नारीवादी महिला लेखकों की ज़ुबान को लकुवा क्यों मार गया? मुझे लगता है कि राजेंद्र यादव महिला लेखकों को टॉयलेट पेपर समझते हैं . कुछ दिन पहले भी फेसबुक पर पढ़ रही थी कि कैसे एक महिला को उन्होंने रातोंरात एक पत्रिका के सम्पादनकार्य से रातोंरात बिना कोई नोटिस इत्यादि दिए हटा दिया था .
पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए नीचे दिए गए दो शीर्षकों पर क्लिक करें…
जब मैं समझ गई कि राजेंद्र यादव के घर से बच कर निकलना नामुमकिन है, तब मैंने सौ नंबर मिलाया
xxx
राजेंद्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भेजे, वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी





