चुनाव को देखते भले ही महाराष्ट्र में गांव-गांव, गली-गली पेपर निकल रहे हैं लेकिन पेपर शुरू करना अलग बात है और चलाना दूसरी बात है. इसका अहसास 'विश्व सह्याद्री' के मैनेजमेंट को तो भली भांति हुआ होगा. चार महीने पहले पुणे से 'विश्व सह्याद्री' मराठी न्यूज पेपर की लांचिंग बडे जोर-शोर से की गयी. 16 पेज के फोर कलर में शुरू हुए इस पेपर ने पहले महीने से ही लड़खड़ाना शुरू कर दिया था.
पेपर में पत्रकारों के अलावा 106 कर्मचारी थे. पहले महीने से ही पेमेंट का वादा चल रहा था. दूसरे और तीसरे महीने की पेमेन्ट अक्टूबर में की गयी. बढता खर्चा और इस हिसाब से एडवरटाइजमेंट की आय नहीं होने से विश्व सह्याद्री की तबीयत हर आते दिन बिगड़ती चली गयी.
आखिरकार शुक्रवार को मैनेजमेंट ने कर्मचारियों के साथ बैठकर विश्व सह्याद्री बंद करने का निर्णय लिया. इससे इस दैनिक में पिछले चार महीने से काम कर रहे 106 कर्मचारी और पत्रकार रास्ते पर आ गये हैं. पुणे में पहले ही कुछ बड़े न्यूज पेपर ने रिसेशन के नाम पर पत्रकार-कर्मचारियों की छटाई शुरू की गयी है. अब विश्व सह्याद्री बंद होने से पुणे में काफी पत्रकारों को बेकारी की मार झेलनी पड़ रही है.
कुछ दिन पहले कोल्हापुर से प्रसिद्ध होने वाला 'विजन वार्ता' बंद हुआ था. अब 'विश्व सह्याद्री' बंद हुआ है. इससे एक बात साबित हुई है. एक तो बड़े मीडिया ग्रुप के पेपर चल सकते हैं, या पूंजीपति, जिनके पास काला धन पड़ा है वे पेपर चला सकते हैं, या जो पुराने पेपर हैं वे चल सकते हैं. विशिष्ट भूमिका लेकर अगर कोई पेपर निकालने की सोच रहा होगा तो उसे 'विश्व सह्याद्री' के अकाल अंत का बोध लेना चाहिए.
एसएम देशमुख की रिपोर्ट.





