अभी हाल ही में दैनिक भास्कर ने अपने मुख पृष्ठ पर पूरे पेज का विज्ञापन प्रकाशित करके नो पेड न्यूज करने का भरोसा अपने पाठकों को दिलाया है. अव्वल तो यह विज्ञापन खुद जताता है कि पाठकों के मन में भास्कर की खबरों के प्रति विश्वास नहीं है इसलिए उसे 'नो पेड न्यूज' का भरोसा अपने पाठकों को दिलाना पड़ा. दूसरी बात है कि यहां भी भास्कर ने अपने पाठकों के साथ धोखा ही किया है.
दरअसल जिस दिन भास्कर ने यह विज्ञापन प्रकाशित करने का फैसला किया उसके कुछ दिन पहले ही भास्कर के जयपुर कार्यालय में सम्पन्न सम्पादकीय एवं विज्ञापन टीम की मीटिंग में सभी पत्रकारों को साफ साफ ताकीद किया गया था कि विधानसभा चुनावों तक कोई भी पालिटिकल खबर बिना विज्ञापन के नहीं छपेगी. इस मीटिंग के दौरान जब पत्रकारों ने चुनाव आयोग और आचार संहिता का हवाला दिया तो बाकायदा संपादकीय टीम ने विज्ञापन को खबरों के रूप में छापने का नुस्खा भी पत्रकारों को बताया.
साथ ही चुनाव तक 100 प्रतिशत प्रीमियम दर पर प्रकाशित करने का निर्णय भी प्रबन्धन द्वारा लिया गया. मसलन यदि किसी भी एडिशन में विज्ञापन दर 200 रूपये प्रति वर्ग सेमी है तो चुनावों में भास्कर उसके 400 रूपये प्रतिवर्ग सेमी वसूलेगा. विज्ञापन बुक कराने के बाद ही उसकी कोई खबर भास्कर में प्रकाशित की जायेगी.
और ऐसा भी नहीं है कि भास्कर में केवल चुनावों के समय ही ये पेड न्यूज का खेल चलता हो. लगभग छोटे स्तर पर भास्कर में ये खेल पूरे साल चलता है. भास्कर में एक नियम को लागू हुए तकरीबन चार साल से ज्यादा हो गये हैं जिसमें किसी भी निजी स्कूल या कालेज की किसी भी प्रकार की कोई भी खबर भास्कर में तभी प्रकाशित की जायेगी जब वो भास्कर को विज्ञापन देगा. विज्ञापन देने वाले स्कूल/कालेज की खबर के साथ पत्रकार बाकायदा विज्ञापनदाता लिखकर भेजते हैं तभी खबर प्रकाशित की जाती है. अब चंद दिन पहले ये सब तय करने वाले भास्कर ने क्या सोचकर 'नो पेड न्यूज' का विज्ञापन प्रकाशित किया है ये तो वो ही जाने.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





