Ujjwal Bhattacharya : सवाल ले-देकर वहीं पहुंच जाता है : आख़िर वो वहां गई क्यों? बल्कि, बिल्कुल शुरू में ही क्यों गई? उसे अपने-आप से कहना चाहिये था- प्रतिभा तो मुझमें है नहीं, मुझे ग़लत रूप से आगे बढाया जा रहा है… नहीं, मेरी इतनी महत्वाकांक्षा नहीं होनी चाहिये…
रही बात वीडियो की, तो औरत जब कपड़े उतारेगी…चाहे बाथरुम में हो या किसी के साथ…तो तस्वीर तो उसकी ली ही जाएगी. आखिर औरत का बदन है…
कोई कह रहा है कि दूसरा पक्ष भी है, जिसकी बात सुनी जानी चाहिये. कोई कह रहा है कि तीसरा पक्ष "नौकर" भी है. मैं देख रहा हूं कि इस बीच एक चौथा पक्ष भी उभर चुका है – हम देखने वालों का. हम सब "वीडियो" देख रहे हैं, जहां औरत सिर्फ़ बदन है. उससे परे उसे सिर्फ देवी या अतिमानवी होना चाहिये, जिसमें महत्वाकांक्षा या दूसरी इंसानी कमज़ोरियां न हों.
वरिष्ठ पत्रकार उज्जवल भट्टाचार्या के फेसबुक वॉल से.
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जब मैं समझ गई कि राजेंद्र यादव के घर से बच कर निकलना नामुमकिन है, तब मैंने सौ नंबर मिलाया
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राजेंद्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भेजे, वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी






