Nadim S. Akhter : टीवी पर 'एशियन पेन्ट्स' का एक बेहूदा ऐड आता है. इसमें अपने नए घर में इंट्री मारते ही पत्नी अपने फौजी पति से कहती है –ये तो मेरे घर जैसा है…पति कहता है कि दीवारों पर ये साज-सज्जा इसलिए कि ताकि घर तुम्हें अपने जैसा लगे. पत्नी इमोशनल हो जाती है, आंखों में आंसू आ जाते हैं. यानी एशियन पेंट्स वालों का कहना है कि घर तभी अपना लगेगा, जब आप उनका पेंट लगाएंगे. चाहे वहां कोई भी रहे, आए-या जाए.
अब तक तो हम यही जानते थे कि घर अपनों से बनता है, अपनों के प्यार से बनता है. पति, पत्नी, बच्चे, मां, बाप, दादा, दादी, ताई वगैरह के साथ-साथ रहने से बनता है. यानी जहां अपने हैं, वही घर है. फिर चाहे वह झोपड़ी हो, तंबू या टेंट हो या फिर कोई भी आशियाना.
विज्ञापनों की दुनिया ने किस तरह हमारे रिश्तों का सौदा कर दिया है, इसका हमें अंदाजा भी नहीं होता. हम रोज ऐसे तमाम फालतू विज्ञापन टीवी पर देखते हैं. जो जाने-अनजाने, अवचेतन मन में ही सही, हमें बाजारवाद का गुलाम बनाते चले जाते हैं. फलां नमक खाओ, फलां चाय पियो, ये ड्रिंक पिओगे तो दिमाग का विकास होगा, ये परफ्यूम लगाओगे तो रोमियो बन जाओगे, वो वाला टूथपेस्ट सांसों को ताजगी देगा क्योंकि कभी भी इसकी जरूरत पड़ सकती है, चश्मे के लेंस-फ्रेम से लेकर गोरा बनाने की क्रीम तक. सब ऐसे मिर्च-मसाला लगाकर बेचा जा रहा है मानो इससे पहले इंसान पुरापाषाण काल में ही जी रहा था. इन्हीं कंपनियों ने उसे आदिम मानुष से आधुनिक इंसान बनाया है. विज्ञान ने नहीं.
ये भी सोचता हूं कि विज्ञापन की दुनिया में क्या वाकई क्रिएटिव लोगों की कमी हो गई है, आइडियाज का टोटा हो गया है, जो ऐसे बेसिर-पैर के ऐड हमें देखने को मिलते रहते हैं. क्या वहां भी कोई संवेदनशील कॉपी राइटर-प्रोड्यूसर नहीं बचा है? कम से कम वहां तो भेड़चाल नहीं होनी चाहिए. और अगर है तो ये Ad इंडस्ट्री अपने बुरे दौर से गुजर रही है.
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.





