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आपको लेखिका बनने के लिए उसके जैसे गल चुके भ्रष्ट दलालों की ज़रूरत नहीं है

Priyanka Dubey : हिंदी साहित्य से मेरा ठीक-ठीक परिचय निर्मल वर्मा के लेखन के लिए अपने दीवानेपन को समझने की यात्रा से शुरू हुआ था. हिंदी में अब तक सिर्फ कुछ चुनिन्दा लेखकों को ही पढ़ा है लेकिन जहाँ तक याद आता है, हमेशा हिंदी में महिलाओं की खराब स्थिति, उनके कमज़ोर लेखन, और यह की उन्हें मौके कैसे और क्यों नहीं मिले, कैसे महिलाएं प्रकाशित होने के लिए खुद को साहित्य के सामंतों के सामने प्रस्तुत करती रही हैं…कैसे वे अब तक अपना कोई स्थान नहीं बना पाईं हैं और अपने स्व..अपने आत्म सम्मान की धज्जियाँ उड़वाकर भी तीसरे दर्जे का कहानियों पर तथाकथित चोटी के आलोचकों की समीक्षाएँ जुगाड़ती रही हैं…जैसी बातें अक्सर कानों में पड़ती रही हैं.

Priyanka Dubey : हिंदी साहित्य से मेरा ठीक-ठीक परिचय निर्मल वर्मा के लेखन के लिए अपने दीवानेपन को समझने की यात्रा से शुरू हुआ था. हिंदी में अब तक सिर्फ कुछ चुनिन्दा लेखकों को ही पढ़ा है लेकिन जहाँ तक याद आता है, हमेशा हिंदी में महिलाओं की खराब स्थिति, उनके कमज़ोर लेखन, और यह की उन्हें मौके कैसे और क्यों नहीं मिले, कैसे महिलाएं प्रकाशित होने के लिए खुद को साहित्य के सामंतों के सामने प्रस्तुत करती रही हैं…कैसे वे अब तक अपना कोई स्थान नहीं बना पाईं हैं और अपने स्व..अपने आत्म सम्मान की धज्जियाँ उड़वाकर भी तीसरे दर्जे का कहानियों पर तथाकथित चोटी के आलोचकों की समीक्षाएँ जुगाड़ती रही हैं…जैसी बातें अक्सर कानों में पड़ती रही हैं.

कई बार साहित्य से जुड़े मित्रों और साथियों के साथ हुई घंटों लंबी चर्चाओं में कान ये सुनते-सुनते पक जाते हैं कि हिंदी में अपनी वर्तमान स्थिति के लिए महिलाएं खुद जिम्मेदार हैं. दुख भी होता था, गुस्सा भी आता था.

ज़ाहिर है, किसी भी स्त्री के साथ अगर शारीरिक या मानसिक हिंसा होती है तो उस हिंसा के खिलाफ खड़ा होना ज़रूरी है, जायज़ भी. लेकिन अगर हमारे भीतर कुछ सड़ा हुआ है तो उसका विरोध भी हमारे ही अंदर से निकल कर आना चाहिए. यह भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है कि हम यह बात खुद समझें कि साहित्यिक सामंतों की कृपादृष्टि पाने के लिए तमाम जतन करने के बाद छापी कहानियों और उपन्यासों के लिए हम और जतन करके समीक्षाएँ तो जुगाड़ सकते हैं, तथाकथित ‘चोटी के’ (भाईसाहब, चोटी के) आलोचकों द्वारा अपनी किताब की कम और अपनी तारीफ में ज्यादा- दो-चार पंक्तियाँ भी लिखवा सकते हैं. लेकिन इससे हमें सिर्फ सू-रियल बेस्ट-सेलर होने का तथाकथित तमगा मिलेगा, सम्मान नहीं.

सृजनकर्ता और पाठक के बीच का सम्बन्ध बहुत हद तक प्रेमियों जैसा होता है. इसमें ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण है. बेईमानी से किये गए सृजन को हमेशा पाठक सूंघ लेता है. फिर आपको सस्ती लोकप्रियता तो मिल सकती है ( वो भी सिर्फ पन्द्रह मिनट की) लेकिन स्नेह और सम्मान नहीं.

महिलाओं को, चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो…यह समझना और स्वीकार करना होगा कि अपनी मेहनत और अपने स्किल से लिखी और प्रकाशित हुई एक लाइन को मिला एक पाठक भी किसी दो कौड़ी के (होगा बड़ा जो भी है, अपने घर में) के सामने बिछ कर या झुक कर छपे बीसीयों उपन्यासों से बेहतर है. अपनी मेहनत और अपने कौशल से कमाया और रचा गया अपना सृजन…जिस पर हम नाज़ कर सकें.

इससे सबसे अच्छी बात यह होगी की आपके अंदर एक मॉरल एरोगेंस आ पाएगा. इस बात की हिम्मत आ पायेगी की जो भी लेखक आपकी किताब छपवाने के लिए आपको उभरती हुई युवा लेखिका बताकर वादे कर रहा हो और अगले संडे अपने घर या दफ्तर बुला रहा हो…(कहानी डिस्कस करने के लिए ‘साथी’) आप उसको दो गलियां देकर उसके चेहरे पर दो तमाचे जड़ कर उसे गरिया कर वापस आ पाएंगीं. यह कहकर की आपको लेखिका बनने के लिए उसके जैसे गल चुके भ्रष्ट दलालों की ज़रूरत नहीं है…जो खुद खत्म हो चुके हैं.

बाद में फंसने पर और गुहार लगाने पर औरत (या इंसान कहना ज्यादा सटीक होगा) होने के नाते आपको मदद तो मिल सकती है लेकिन सम्मान सिर्फ ईमानदारी और मेहनत से मिलता है.

'तहलका' से जुड़ीं पत्रकार प्रियंका दुबे के फेसबुक वॉल से.


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जब मैं समझ गई कि राजेंद्र यादव के घर से बच कर निकलना नामुमकिन है, तब मैंने सौ नंबर मिलाया

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राजेंद्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भेजे, वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी

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