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सुख-दुख...

राजेंद्र यादव के यहां काम करने वाले प्रमोद का पक्ष तहलका में प्रकाशित हुआ

 : प्रमोद पिछले डेढ़ महीने से तिहाड़ जेल में है. उसकी सुनने वाला कोई नहीं. साहित्य की दुनिया में राजेंद्र यादव और युवा लेखिका के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, जिनकी खूब चर्चा भी है. लेकिन इस सबके बीच जेल में कैद प्रमोद का पक्ष गायब है. तहलका ने तिहाड़ जेल में उससे मिलकर जब उसका पक्ष जानना चाहा तो उसने पूरी घटना का विवरण कुछ इस तरह दिया :

 : प्रमोद पिछले डेढ़ महीने से तिहाड़ जेल में है. उसकी सुनने वाला कोई नहीं. साहित्य की दुनिया में राजेंद्र यादव और युवा लेखिका के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, जिनकी खूब चर्चा भी है. लेकिन इस सबके बीच जेल में कैद प्रमोद का पक्ष गायब है. तहलका ने तिहाड़ जेल में उससे मिलकर जब उसका पक्ष जानना चाहा तो उसने पूरी घटना का विवरण कुछ इस तरह दिया :

“मेरा नाम प्रमोद कुमार महतो है. मैं जिला मधुबनी, बिहार का रहने वाला हूं. मेरी उम्र 24 साल है. वैसे सर्टिफिकेट में बढ़ा कर 26 साल की गई है. मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं. चौथी क्लास तक ही स्कूल गया हूं, लेकिन हिंदी पढ़ लेता हूं और लिख भी लेता हूं. मैं दिल्ली में कई साल से काम कर रहा हूं. बाऊ जी (राजेंद्र यादव) के घर पर पिछले 5-6 महीने से था. उससे पहले मुनिरका में एक वकील साहब के घर पर काम करता था. बाऊ जी के घर पे मुझे मेरी एजेंसी वालों ने लगवाया था. बाऊ जी के सारे काम मैं ही करता था. उनको दवा देना, उठाना-बैठना, बाथरूम लेकर जाना, कपड़े पहनाना सब कुछ मैं ही करता था. मैं रहता और सोता भी बाऊ जी कमरे में ही था. बाऊ जी को ऑफिस या और कहीं भी जाना होता तो भी मैं साथ ही जाता था. बाऊ जी बिना सहारे के चल-फिर नहीं सकते हैं, इसलिए मैं हमेशा ही उनके साथ रहता था. इस काम के लिए मुझे दस हजार रुपये मिलते थे. ये रुपये बाऊ जी की तरफ से मेरी एजेंसी को दिए जाते थे और फिर एजेंसी वाले मुझे देते थे. मैं दो हजार रुपये अपने लिए रखता और बाकी घर भेज देता था. घर में मैं ही सबसे बड़ा हूं. मेरे पिता जी नहीं हैं. छोटे भाई-बहनों और मां का खर्च मेरे भेजे रुपयों से ही चलता था.

बाऊ जी के घर में किशन और उनका परिवार भी रहता था. किशन भैया बाऊ जी के ड्राइवर हैं. हमारे अलावा दीपिका (युवा लेखिका का बदला हुआ नाम) भी बाऊ जी के घर और ऑफिस में काम करने आती थी. उसे भी उतने ही रुपये मिलते थे जितने मुझे. वो भी बिहार की ही रहने वाली थी. मेरी कभी-कभी उससे घर पर ही बात होती थी. एक दिन मुझे दीपिका के बाऊ जी के साथ संबंधों के बारे में पता चला. मैंने इस बारे में किशन भैया से बात की. उन्होंने बताया कि उनकी तो किसी ने वीडियो भी बनाई है. किशन भैया ने मुझे कहा, ‘प्रमोद मैं तो बाऊ जी को भी समझा चुका हूं कि आप इस लड़की को यहां मत बुलाया कीजिए.’

दीपिका हमारे साथ ही काम करती थी और वो भी बिहार की ही रहने वाली है. इसीलिए मैंने दीपिका को फोन किया. ये शायद 30 जून के आस-पास की बात है. मैंने कोई धमकी देने के लिए फोन नहीं किया था. मैंने उसे बस यह समझाने के लिए फोन किया था कि ऐसा न किया करे. मैंने उससे फोन पर भी यही कहा था, ‘देखो, तुम भी मेरे इधर की ही रहने वाली हो इसीलिए मैं तुम्हें समझा रहा हूं.’ वो मुझ पर गुस्सा होने लगी. तब मैंने उसे बताया था कि ‘मैं ऐसे ही नहीं कह रहा बल्कि तुम्हारा वीडियो भी बन चुका है.’ उस दिन मैंने दीपिका से जो बात की थी उसे रिकॉर्ड भी किया था. मैं बहुत सारे लोगों से बात करते हुए रिकॉर्ड कर लेता था. मेरे फोन में पहले से भी मेरे कई दोस्तों की बातें रिकॉर्ड हैं. मैंने बाद में पुलिस को भी उस दिन जो बात हुई उसकी रिकॉर्डिंग सुनाई थी. मैंने मैडम (राजेंद्र यादव की बेटी) को भी वो रिकॉर्डिंग सुनाई थी.

अगले दिन शाम को दीपिका बाऊ जी के घर आई. उस दिन घर पर कुछ मेहमान भी आए हुए थे. दीपिका के आने पर घर का दरवाजा भी मैंने ही खोला. उसके आने के थोड़ी देर बाद बाऊ जी ने मुझे बुलाया. उन्होंने मुझसे पूछा कि तूने कोई वीडियो बनाया है क्या. मैंने कहा कि मैंने कोई वीडियो नहीं बनाया है. दीपिका भी वहीं खड़ी थी. उसने कहा कि ये झूठ बोल रहा है और उसने मुझे थप्पड़ मार दिया. तब मैंने भी उसे थप्पड़ मारा. उसने बाऊ जी के घर से ही पुलिस को फोन कर दिया. बाऊ जी वहीं पर लेटे हुए थे. वो फोन करने से मना भी कर रहे थे. वो कभी किसी पर नाराज नहीं होते. वो दीपिका पर भी नाराज नहीं हुए और मुझ पर भी नहीं. थोड़ी देर बाद पुलिस आई. किशन भैया ने मैडम (राजेंद्र यादव की बेटी) को फोन किया. मैडम ने कहा कि मैं अभी आ रही हूं. पुलिस मुझे और दीपिका को थाने ले गई. थाने में मुझसे किसी ने कुछ नहीं पूछा. मुझे एक कोने में बैठा दिया. मेरा मोबाइल भी पुलिस ने ले लिया था. रात को एक बजे तक मैं वहीं बैठा रहा. दीपिका वहां से चली गई थी. मुझे कोई लेने भी नहीं आया. तब पुलिसवालों ने कहा कि हमारे पास यहां तुझे रखने की जगह भी नहीं है, तू किसी को बोल कि तुझे आकर ले जाएं. तब मैंने किशन भैया को फोन किया. उन्होंने कहा कि मैडम किसी को भेज रही हैं. मैंने अपने एजेंसी वाले भैया को भी फोन किया. उन्होंने कहा कि मैं आ रहा हूं. लेकिन थोड़ी ही देर में किशन भैया का फोन आ गया कि मैं ही आ रहा हूं तुझे लेने. किशन भैया ने पांच हजार रुपये थाने में जमा किए और मुझे वापस घर ले गए.

उस दिन के बाद दीपिका बाऊ जी के घर नहीं आई. ऑफिस में भी मैंने कभी उसे नहीं देखा. उसकी बाऊ जी से फोन पर बात होती हो तो मुझे नहीं पता. लगभग एक महीने बाद बाऊ जी ने नोएडा चलने को कहा. वहां एक रेस्टोरेंट है मैकडोनाल्ड. हम बाऊ जी को लेकर वहां गए. मुझे नहीं पता था कि दीपिका भी वहां आने वाली है. थोड़ी देर बाद दीपिका अपने एक दोस्त के साथ वहां आई. वो किसी अखबार में काम करता है. उसने कई बार मुझे फोन करके धमकाया भी है.

मैं और किशन भैया बाहर ही खड़े थे. बाऊ जी उन लोगों के साथ अंदर रेस्टोरेंट में बैठे थे. लगभग एक-डेढ़ घंटे बाद हम बाऊ जी को लेने गए. बाऊ जी ने कहा कि दीपिका से सॉरी बोलो. मैंने सॉरी भी बोल दिया. फिर मैं बाऊ जी को उठाने लगा तो दीपिका ने मुझे कहा, ‘अब तुझे अपनी औकात पता चल गई?’ उसने मुझे गाली भी दी. तब मैंने उसे कहा कि क्यूं यहां होटल में लड़ाई करना चाह रही है. उसने मेरा हाथ खींचा और कहा कि बता क्या कर लेगा तू. किशन भैया ने ही फिर उसे समझाया कि बाऊ जी को गाड़ी में तो बैठा लेने दो वरना वो गिर पड़ेंगे. मैंने बाऊ जी को संभाला हुआ था और वो मेरा हाथ खींच रही थी. मैंने फिर बाऊ जी को गाड़ी में बैठाया और मैं भी बैठ गया. बाऊ जी पीछे बैठे और मैं आगे किशन भैया के बगल वाली सीट पर. लेकिन दीपिका ने गाड़ी का दरवाजा पकड़ लिया और कहा कि ‘दिखा तू क्या कर सकता है?’ बाऊ जी ने उसे कहा कि ऐसा मत कर और दरवाजा छोड़ दे लेकिन वो नहीं मानी. किशन भैया गाड़ी नहीं चला रहे थे कि कहीं चक्का उसके पैर पर न चढ़ जाए. फिर किशन भैया ने मुझे ड्राइवर वाली तरफ से उतरने को कहा. मैं और किशन भैया उतरकर कुछ आगे चले गए. किशन भैया ने कहा कि तू यहां से चला जा वरना ये हमें जाने नहीं देगी और झगड़ा हो जाएगा. फिर मैं बस से बाऊ जी के घर तक पहुंचा.

जज मैडम ने मुझसे पूछा भी कि तुझे अपनी जमानत नहीं करानी क्या? तो पुलिसवाले ने ही जज मैडम को बोला कि जमानत लगाई थी लेकिन नहीं मिली.

उस दिन के बाद से मेरी न तो दीपिका से कोई बात हुई ना ही मैंने उसे देखा. मैं बाऊ जी के घर पर अपना काम करता रहा. फिर अगस्त के आखिरी दिनों में एक दिन मेरे मोबाइल पर तीन मिस्ड कॉल थीं. मैं बाऊ जी को बाथरूम लेकर गया था तो फोन नहीं उठा सका. उन तीन मिस्ड कॉल में से एक मेरे दोस्त की थी और दो किसी ऐसे नंबर से जिसे मैं नहीं पहचानता था. मैंने पहले अपने दोस्त को फोन किया और उससे बात की. उसके बाद मैंने दूसरे नंबर पे फोन किया. उधर से थोड़ी देर तो कोई आवाज नहीं आई. फिर जब मैंने पूछा कि कौन बोल रहा है तो दीपिका की आवाज आई. उसने बोला, ‘तू मुझे नहीं पहचानता. तुझे नहीं पता तूने किसको फोन मिलाया है?’ मैंने जैसे ही उसकी आवाज पहचानी फोन काट दिया. मेरे फोन में उसका एक नंबर तो था. लेकिन इस बार जिस नंबर से फोन आया था वो कोई और नंबर था. मुझे पता होता कि ये नंबर भी दीपिका का ही है तो मैं फोन करता ही नहीं.

अगले दिन बाऊ जी ने मुझसे पूछा कि क्या तूने दीपिका को फोन किया था? मैंने उन्हें बताया कि मेरे फोन पर किसी नंबर से फोन आया था. मैं उस वक्त उठा नहीं पाया इसलिए बाद में फोन किया. मुझे पता नहीं था कि ये नंबर भी दीपिका का ही है. इस बात के एक-दो दिन बाद पुलिसवाले घर पर आए. उन्होंने बाऊ जी से कहा कि प्रमोद को तीन सितंबर को कोर्ट लेकर जाना होगा. तीन तारीख को मंगलवार था और बाऊ जी को कहीं बाहर जाना था. तो बाऊ जी ने पुलिस से कहा कि तुम प्रमोद को या तो सोमवार को कोर्ट ले जाओ या फिर बुधवार को ले जाना. पुलिसवाले मान गए और उन्होंने कहा कि ठीक है बुधवार को ले जाएंगे. चार सितंबर, बुधवार को पुलिस मुझे लेने बाऊ जी के घर पे आई. उन्होंने बताया था कि कोर्ट में पेश करेंगे और शाम तक घर पर छोड़ जाएंगे. फिर पुलिस मुझे लेकर कोर्ट गई और वहीं से यहां भेज दिया. तब से मैं तिहाड़ जेल में ही हूं.

मुझे यहां लगभग डेढ़ महीना हो चुका है. शुरू के 15-20 दिन तो कोई मिलने भी नहीं आया. फिर एक दिन किशन भैया यहां आए थे. उन्होंने कहा कि बाऊ जी तुम्हे छुड़ाने के लिए वकील से बात कर रहे हैं. लेकिन आज तक कोई वकील भी नहीं आया. मैंने किशन भैया को बताया था कि मेरे पास कपड़े भी नहीं हैं. मैं जो कपड़े पहन के आया था इतने दिनों से उन्हीं कपड़ों को पहने हुए हूं. उन्होंने कहा कि वो कपड़े ले आएंगे और मुझे जल्दी ही छुड़ाने के लिए भी बात करेंगे. इस बीच मुझे दो बार कोर्ट भी ले जाया गया. वहां भी मुझसे कोई नहीं मिलने आया. मेरे लिए कोर्ट में कोई वकील भी नहीं था. जो जज मैडम थी उन्होंने मुझसे पूछा भी कि तुझे अपनी जमानत नहीं करानी क्या. तो पुलिसवाले ने ही जज मैडम को बोला कि जमानत लगाई थी लेकिन नहीं मिली.

कुछ दिन पहले ही मेरी एजेंसी वाले भैया मुझसे मिलने आए. वो ही मेरे कपड़े लेकर आए. उन्होंने बाऊ जी के घर से ही कपड़े लिए होंगे क्योंकि मेरा सामान वहीं था. मेरे घरवालों को तो शायद पता भी नहीं है कि मैं डेढ़ महीने से तिहाड़ जेल में बंद हूं. जिस दिन मुझे घर से कोर्ट ले गए थे तो बाऊ जी ने कहा था कि शाम तक तुझे ये लोग वापस ले आएंगे. लेकिन वो मुझे वहीं से जेल ले आए. बाऊ जी ने किसी वकील को भी मुझे छुड़ाने नहीं भेजा. वो तो जानते हैं कि मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है. फिर भी मैं इतने दिनों से जेल में हूं. मैंने तो बस उसे बिहार की होने की वजह से समझाने के लिए फोन किया था. उसने मुझसे झगड़ा किया और पुलिस से झूठ बोला कि ये मेरे साथ जबरदस्ती कर रहा था. बाऊ जी तो वहीं थे. उन्होंने तो सब कुछ देखा था जो भी हुआ. पुलिसवालों ने भी मुझसे कुछ नहीं पूछा. मैं बिना कुछ किए ही जेल में बंद हूं. बाऊ जी सब जानते हैं फिर भी पता नहीं क्यों मुझे नहीं छुड़ा रहे. मैं आजकल यहां जेल की कैंटीन में काम कर रहा हूं. पता नहीं मुझे यहां कब तक रहना पड़ेगा.”

'तहलका' में प्रकाशित राहुल कोटियाल की रिपोर्ट का एक अंश.


पूरे प्रकरण को समझने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें…

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