Yashwant Singh : आज देहरादून में होना था, भाई Deepak Azad की शादी में शिरकत करने. पर परसों लखनऊ से लौटने के बाद तबीयत ढीली होनी जो शुरू हुई तो उसका अंजाम ये निकला कि चलने-फिरने लायक भी नहीं बचा. कल शाम दवा लेकर आया. आज थोड़ा-सा बेहतर महसूस कर रहा हूं.
कल देर रात की ट्रेन थी देहरादून के लिए, उसे छोड़ना पड़ा, मजबूरन. लूज मोशन, बुखार, कमजोरी और थकान.. ये सिंपटम हैं. नींद खूब आ रही. कुछ भी खाने को जी नहीं कर रहा. चौबीस घंटे तक दवा नहीं ली. बीसियों साल बाद इस तरह बीमार पड़ा हूं. बीमारी का आनंद पूरा लेना चाहता था. इसलिए शुरुआत में दवा से परहेज किया.
बीमारी की मदहोशी से रूबरू होकर अच्छा लग रहा था. शरीर-अंग साथ हैं या नहीं, पता नहीं चल रहा था. जागे जागे सोये और सोये सोये जागे की अवस्था अजब थी. घरवाले मेरे सूखते जा रहे चेहरे से परेशान. पत्नी और बेटी खुद गईं अस्पताल दवा लाने. बाद में हिम्मत करके मैं खुद गया. बीपी वैगरह नार्मल निकला. डाक्टर ने दवा देकर कहा- खुश रहो, कुछ नहीं है, दो खुराक में सब ठीक हो जाएगा. दवा खाने के बाद थोड़ी खिचड़ी खाई और सो गया. रात भर सपने देखता रहा, तरह-तरह के.
क्या कि मैंने अनाज छोड़ दिया है. सिर्फ फल सब्जियों और जूस पर रहने का फैसला कर लिया है और यह सब करने के कारण एक दिन अचानक खुद को 18 साल के नौजवान में तब्दील हुआ पाता हूं.
क्या कि घर बार छोड़कर बाबा बन गया हूं और जंगल जंगल फिर भटक रहा हूं और अचानक एक शेर आकर खा जाता है मुझे…
क्या कि अपनी एक प्रेमिका के साथ नया घर बसाने चल पड़ा हूं जहां कोई रोग न होने की गारंटी है लेकिन शर्त उसकी ये भर कि मैं मटन रोज उसे बनाकर खिलाउंगा…
क्या कि अपने गांव लौट गया हूं और एक बगीचे में स्पेशल मड़ई (कुटिया) अपने लिए बनवाकर वहीं रह रहा हूं, सबसे नाता तोड़कर…
जाने कितने सपने देखे एक रात में… बीमारी के अवसाद, डिप्रेशन, सुस्ती, कमजोरी, आह-आह के दौर में एक झटके में हर कोई बेमानी, स्वार्थी, पराया नजर आने लगता है.. साथ ही, जीवन के दिन भी गिने-चुने बस घंटों-सेकेंडों भर वाले नजर आते हैं…
थैंक्यू बीमारी, काफी कुछ नया फ्रेश फील एंड ड्रीम देने के लिए …
लव यू, बामारी, फिर आना… क्योंकि नए एहसास में ही आनंद है, वो चाहे बीमारी से मिले या शराबी से…
भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.





