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विज्ञापन रेट साल में दो बार बढ़ाए पर ग्रामीण संवाददाताओं का पैसा दस साल से नहीं बढ़ा

जयपुर : राजस्थान के लगभग सभी बड़े अखबारों द्वारा अपने ग्रामीण संवाददाताओं का जमकर शोषण किया जा रहा है. प्रदेश के दो बड़े अखबारों दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका की हालत यह है कि जहां ये लोग साल में दो बार विज्ञापनों की दरों में बढ़ोत्तरी कर देते हैं वहीं संवाददाताओं/स्ट्रिंगरों को किये जाने वाले भुगतान की दरों में पिछले दस सालों से कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गयी है.

जयपुर : राजस्थान के लगभग सभी बड़े अखबारों द्वारा अपने ग्रामीण संवाददाताओं का जमकर शोषण किया जा रहा है. प्रदेश के दो बड़े अखबारों दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका की हालत यह है कि जहां ये लोग साल में दो बार विज्ञापनों की दरों में बढ़ोत्तरी कर देते हैं वहीं संवाददाताओं/स्ट्रिंगरों को किये जाने वाले भुगतान की दरों में पिछले दस सालों से कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गयी है.

वर्तमान में दैनिक भास्कर द्वारा अपने ग्रामीण संवाददाताओं को प्रकाशित खबरों के लिये 2.5 रुपये प्रति वर्ग सेमी की दर से तथा पत्रिका द्वारा 3.30 रुपये की दर से भुगतान किया जा रहा है. वहीं प्रकाशित फोटो के 25 रुपये तथा पत्रिका द्वारा 30 रुपये का भुगतान किया जा रहा है. विज्ञापन की दरें भास्कर के जिला अंकों में 250 से 300 रुपये प्रति वर्ग सेमी की दर से वसूली जा रही हैं तथा पत्रिका की दरें भी कमोबेश यही हैं. अब तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सर्कुलेशन बढ़ाने के चक्कर में अखबारों की एसएमडी टीम की तरफ से जिले भर में संवाददाताओं की एक फौज भी खड़ी कर दी गई है. अकेले भास्कर के जयपुर जिले की दस पंचायत समितियों में (सांगानेर, झोटवाड़ा और शहर छोड़कर) करीब 45 से 50 पत्रकारों की भीड़ जमा कर रखी है. इनमें अधिकतर हॉकर या न्यूज एजेंसी वाले लोग शामिल हैं.

अब चूंकि पत्रकारों की अच्छा खासी भीड़ यहां जमा कर रखी है तो ऐसे में औसतन अधिकांश पत्रकारों का भुगतान तीन सौ से चार सौ रुपये से ज्यादा नहीं हो पाता है. फिर इन लोगों द्वारा अपने क्षेत्र से उगाही जैसे काम किये जाते हैं. इतना ही नहीं, करेला उस पर भी नीम चढ़ा की स्थिति तब पैदा हो जाती है जब पत्रकारों को ये नाममात्र का भुगतान भी तीन से चार माह बाद किया जाता है. प्रदेश के दोनों बड़े अखबारों के शोषण की आड़ में दूसरे दैनिक अखबार भी जम कर पत्रकारों का शोषण करते हैं. राष्ट्रदूत, पंजाब केसरी, महानगर टाइम्स जैसे अखबारों द्वारा तो अपने पत्रकारों को कोई भुगतान दिया ही नहीं जाता बल्कि उनसे न्यूज एजेंसी के नाम पर पैसे ले और लिये जाते हैं.

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