इंदौर। उन्हें राजनीति विरासत में मिली, लेकिन वे अपने राजनेता माता-पिता की छाया से अलग अपनी पहचान बनाने को आतुर हैं। राजनीतिक विरासत को वे अपनी ताकत मानते हैं, लेकिन वे अपने काम और सोच के आधार पर जनता के बीच जगह बनाना चाहते हैं। विरासत के दम पर जनता पर थोपे हुए उम्मीदवार न बनकर स्वीकार्य नेतृत्व देना चाहते हैं। वे पैराशूट प्रत्याशी नहीं, बल्कि पैराटूपर्स कहलाना अधिक पसंद करते हैं। उन्होंने राजनीतिक और कारपोरेट के मिक्सअप मैनेजमेंट को साफगोई से स्वीकार किया। राजनीति को गंदा तालाब कहने वालों के लिए उन्होंने कहा कि तालाब में उतरी बिना यह गंदगी वैâसे साफ होगी। लिहाजा युवाओं को भी राजनीति में आना होगा।
इंदौर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित टॉक शो ‘विरासत के वारिस’ में प्रदेश के चार नेता पुत्रों ने अपनी सोच, अपने इरादे और विजन को कुछ इसी अंदाज में सामने रखा। विधानसभा के टिकटों की दौड़ के बीच इस अलहदा कार्यक्रम में सांसद एवं भाजपा नेता सुमित्रा महाजन के पुत्र मंदार महाजन, पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के पुत्र सचिन यादव, प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव के पुत्र अभिषेक यादव, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के पुत्र डॉ. विक्रांत भूरिया शामिल हुए। टॉक शो के सूत्रधार महासचिव अरविंद तिवारी थे। इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने स्वागत भाषण दिया। सभी नेता-पुत्रों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं, लेकिन सियासी मिल्कियत के उपभोग के बीच वे अपनी जिम्मेदारी से भी बेहतर ढंग से वाकिफ हैं।
लायकी होगी तो पार्टी टिकट देगी: मंदार महाजन, प्रोफेशनल पायलट, वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर
मेरी राजनीति विरासत के कारण नहीं, यदि मुझमें लायकी होगी तो ही पार्टी टिकट देगी। मेरी मां ने मुझे यही सिखाया है कि पार्टी सक्षम है तेरा बलबूता होगा तो पार्टी तेरी लायकी समझकर तुझे टिकट देगी। मेरा भी यही मानना है कि भाजपा मुझे लायक समझेगी तो आगे आऊंगा। आगे रहकर टिकट नहीं मांगूंगा। यदि पार्टी चाहेगी कि संगठन में रहकर काम करूं तो वह भी कर सकता हूं। मेरा मानना है कि राजनीति में अच्छे लोगों की भी जरूरत है। मुझे तो नहीं लगता कि राजनीति इतनी बुरी हो गई है। सक्रिय राजनीति करनी है तो वूâटनीति भी उसका एक स्वरूप है। मां कहती है कि अपनी लाइन बड़ी करना, किसी की लाइन छोटी करने पर ध्यान मत देना। राजनीति भी करुंगा तो ऐसी ही। भले ही कल को मुझे कुछ हासिल न हो। यदि विपक्ष में भी रहा तो मुद्दों की राजनीति होगी तो वहां भी सत्ता पक्ष का साथ दूंगा।
जनता चाहेगी तो अवसर मिलेगा: सचिन यादव
यह सही है कि मुझे अपने पिता के कारण एडवांटेज मिलेगा, लेकिन मुझे भी जनता के बीच जाना पड़ेगा। जनता को लगेगा तो ही आगे बढ़ सवेंâगे। पार्टी भी तभी निर्णय लेगी, जब आप में काबिलियत होगी। विरासत के कारण एक बार ही अवसर मिल सकता है, आगे का रास्ता तो खुद को बनाना पड़ेगा। मेरे पिता का ४० वर्षों तक राजनीति में हस्तक्षेप रहा। कई पदों पर रहे। वे भी किसी राजनीतिक विरासत के मालिक नहीं थे। धन्ना सेठ के बेटे नहीं थे किसान के बेटे थे। अपने संघर्ष, परिश्रम और लगन से राजनीति में मुकाम बनाया। मैं भी पैराशूट से लैंड हुआ उम्मीदवार नहीं हूं। कई सालों से अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र में जनता की परेशानियों को दूर करने का प्रयास कर रहा हूं। पिता का सपना था कि हर किसान के खेत पानी पहुंचे। उन्होंने बहुत प्रयास किए। उनके सपने को आगे बढ़ाने के लिए सहकारिता के क्षेत्र में काम करूंगा।
राजनीति से समाजसेवा करूंगा: अभिषेक भार्गव
मैं राजनीतिज्ञ परिसार से हूं तो राजनीति ही करूंगा। मुझे अपने आपको साबित करना है। राजनीति समाजसेवा का सशक्त माध्यम है। मैं राजनीति के माध्यम से ही समाजसेवा करना चाहता हूं। इसके जरिए आम आदमी की समस्या का हल बेहतर और अचूक तरीके से कर सकते हैं। हमारे दादाजी शुद्ध ब्राह्मण है। पूजा-पाठ करके परिवार का पालन-पोषण करते थे। बड़ा हुआ तो पिताजी को राजनीति करते देखा। लोग उनके पैर पड़ते थे। मुझे भी लगता लोग मेरे पैर पड़े, लेकिन उम्र और अनुभव बढ़ा तो राजनीति समझ में आने लगी। पहले पिताजी का सहयोगी था, अब सलाहकार भी हूं। यदि आप राजनीतिज्ञ परिवार से हैं तो लोगों की आपसे उम्मीदें बढ़ जाती है। यदि वह पेâल होता है तो थू-थू होती है, इसलिए हम ऐसा काम करें टिकट देना पार्टी की मजबूरी हो जाए।
प्रतिभा का कोई वारिस नहीं: डॉ. विक्रांत भूरिया, डीएवीवी कार्यपरिषद के सदस्य
परिवार में धन और जमीन के तो वारिस हो सकते हैं, लेकिन राजनीति का और किसी के दिमाग का कोई वारिस नहीं हो सकता। जरूरी नहीं कि मेरे पिता इंटेलीजेंट है तो मुझमें भी उतनी इंटेलीजेंसी हो। हम पैराशूट की तरह एंट्री नहीं चाहते, पैराटूपर्स हैं हम। यानी वे लोग जब अर्जेंट मदद की जरूरत हो तो वहां तत्काल पहुंच जाए। हमें अपने पिता की परछाई से निकलना हैं तो दुगुना काम करना होगा। पिताजी ने कहा कि तुम्हें राजनीति करना है तो यह तुम्हारा निर्णय हैं, मेरा कभी कोई दबाव नहीं रहेगा। वे कहते हैं- राजनीति जितना देती है, उससे ज्यादा लेती है। पार्टी का टिकट राजनीति करने का माध्यम नहीं होना चाहिए। यदि आप डॉक्टर या कुछ और हैं तो इसके माध्यम से भी सेवा कर सकते हैं। बेटा होने के नाते मेरा दायित्व है कि मैं पिता की मदद करूं।





