भोपाल। पत्रकार जब स्वयं व्यवस्था से परेशान हो कर भ्रष्टाचार की जंग लड़ते हुए सुसाइड कर ले तो सिस्टम की असंवेदनशीलता को समझा जा सकता है। पत्रकार राजेंद्र कुमार अंतिम बार शासन के सर्वोच्च अधिकारी मुख्य सचिव एंटोनी डिसा से मिलने की कोशिश की जिसमें वो असफल रहे। इसके बाद राजेन्द्र कुमार गहरी निराशा में डूब गए और आत्महत्या करके यह साबित कर दिया कि मध्य प्रदेश की राजधानी में पुलिस के उच्चाधिकारी से लेकर थानों के सिपाही तक कितने असंवेदनशील हैं।
भ्रष्टाचार अन्याय से लड़ने में प्रदेश का साधारण नागरिक जब थाने के चक्कर लगाकर रिपोर्ट लिखने के लिये परेशान हो जाता है, तो वह तंग आकर आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। पुलिस थाना, प्रशासन ने भी उसकी पुकार नहीं सुनी तो वह आत्महत्या को गले लगाने को मजबूर हो गया। राजेंद्र ने कई करप्ट अफसरों के खिलाफ 30 सितंबर को सोशल मीडिया के माध्यम से कार्यवाही न होने पर आत्महत्या की चेतावनी दी थी। 10 अक्टूबर को गोविन्द पुरा थाने में डी़जीपी नंदन दुबे के नाम पत्र देकर 7 दिन में कार्यवाही नहीं होने पर आत्महत्या की चेतावनी दी थी।
प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष नाकारा सिद्ध होते जा रहे हैं। शासन और पुलिस के अधिकारियों की जन सुनवाई भी अशक्त नागरिक, गरीबों, पीड़ितों को कोई समाधान नहीं दे रही है। डी.आई.जी. को दिया आवेदन जब थाने तक पहुंचता है तो उस प्रकरण को भ्रष्टाचारियों से रिश्वत लेकर दबा दिया जाता है। यदि कोई पत्रकार शिकायत थाने में करता है तो उस पर कार्यवाही के स्थान पर पत्रकारों के विरूद्ध कार्यवाही की जाने लगती है।
भ्रष्ट अधिकारियों और पुलिस वाले पत्रकार को अपनी उच्च कमाई में सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं। पिछले 45 साल के पत्रकारिता के कार्यकाल में हजारों प्रकरण मेरे पास आये जिसमें पुलिस वालों ने पत्रकार पर आरोप लगा कर भ्रष्टाचारी को बचाया है और कोर्ट में प्रकरण कमजोर कर दिया है। मध्य प्रदेश शासन के सचिवालय में निराश पत्रकार स्व. राजेन्द्र रामचंद्र की आत्म हत्या एक भ्रष्टाचार की लड़ाई में लड़ते हुए घटी जो एक पत्रकार की बलि हैं, जो उसने अपनी जान देकर चुकाई है। यदि शासन इससे नहीं चेता तो भविष्य में इससे भी बड़ी घटना हो सकती है।
राजेन्द्र कश्यप का विश्लेषण.





