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मेरठ

मुजफ्फरनगर दंगा : विश्वास की डोर में जो गांठें पड़ी हैं, वे अभी ढीली तक नहीं पड़ी हैं

मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के क्षेत्र में हुए दंगों को एक महीने से ज्यादा हो चला है। वक्त के साथ खेतों में खड़ी गन्ने की फसल भी बड़ी हो गई है। गन्ने की लहलाहती जो फसल लोगों को मिठास का एहसास कराती थी, आज की तारीख में डराती ज्यादा है। लोग अपने अनुभव बताते हैं कि रात की बात तो दूर, दिन में भी गन्ने के खेतों के बीच से गुजरते वक्त हवा की वजह से र्इंख में थोड़ी-सी भी सरसराहाट होते ही इस आशंका से आदमी अपनी चाल तेज कर देता है कि कहीं कोई वहां से निकलकर उस पर वार न कर दे। यदि एक महीने से ज्यादा गुजरने के बाद भी इतनी दहशत कायम है, तो कहना पड़ता है कि विश्वास की डोर में जो गांठें पड़ी हैं, वे अभी ढीली तक नहीं पड़ी हैं।

मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के क्षेत्र में हुए दंगों को एक महीने से ज्यादा हो चला है। वक्त के साथ खेतों में खड़ी गन्ने की फसल भी बड़ी हो गई है। गन्ने की लहलाहती जो फसल लोगों को मिठास का एहसास कराती थी, आज की तारीख में डराती ज्यादा है। लोग अपने अनुभव बताते हैं कि रात की बात तो दूर, दिन में भी गन्ने के खेतों के बीच से गुजरते वक्त हवा की वजह से र्इंख में थोड़ी-सी भी सरसराहाट होते ही इस आशंका से आदमी अपनी चाल तेज कर देता है कि कहीं कोई वहां से निकलकर उस पर वार न कर दे। यदि एक महीने से ज्यादा गुजरने के बाद भी इतनी दहशत कायम है, तो कहना पड़ता है कि विश्वास की डोर में जो गांठें पड़ी हैं, वे अभी ढीली तक नहीं पड़ी हैं।

सच बात तो यह है कि अविश्वास की इन गांठों को ढीली करने या खोलने के लिए कोई भी ईमानदार कोशिश नहीं की गई है। राजनीति की शतरंज की बिसात पर बिछे मोहरे उन्हें और ज्यादा मजबूत करने पर लगे हैं। जिन लोगों ने इन गांठों को खोलने का प्रयास भी किए, उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन गई। मुजफ्फरनगर सहित मेरठ में कुछ सामाजिक संगठनों ने अमन पसंद लोगों को जोड़ा। लेकिन हैरत हुई कि अमन पसंदों की संख्या सैकड़ा भी बमुश्किल पार कर पाई। कार्यक्रम खत्म होते-होते सुनने वाले कम बोलने वाले ज्यादा रह गए। दो दिन पहले ही जल पुरुष राजेंद्र सिंह मुजफ्फरनगर के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में ‘आग पर जल’ डालने की कोशिश करते नजर आए, तो उनके साथ चंद लोग ही थे।

जल पुरुष जैसे लोगों को सुनने और समझने के लिण् लोगों की भीड़ नहीं जुटती, लेकिन ‘संगीत सोमों’ और ‘कादिर राणाओं’ की एक आवाज पर लोग किसी पंचायत में मय हथियारों के जुट जाते हैं, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है और राजनीति का एजेंडा कौन तय कर रहा है? दंगा प्रभावित क्षेत्रों में जाने पर पता चलता है कि एक वर्ग इस बात से नाराज है कि बेकसूर लोगों को जेल भेजा जा रहा है। लेकिन जब उनसे प्रश्न किया जाता है कि फिर कसूरवार कौन हैं, तो अकल्पनीय जवाब आता है कि दंगाई ‘बाहर’ से आए थे, हमें नहीं पता कौन थे?

नंगलामंदोड़ की पंचायत से लौट रहे लोगों पर हमला करने वाले भी बाहर के नहीं थे और कुटबा, लांक और बहावड़ी जैसे गांवों के में हिंसा करने वाले भी कहीं से और से नहीं आए थे। कांधला के राहत शिविर में रह रहे 70 साल के बुजुर्ग को इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला है कि ‘जिन बच्चों को हमने अपनी गोद में खिलाया, उन्होंने हमें क्यों बेघर कर दिया। हत्या, लूटमार और आगजनी करने वाले लोग यह कहकर कैसे बच सकते हैं कि दंगाई बाहर से आए थे।’ दंगा प्रभावित क्षेत्रों में वही लोग सक्रिय हैं, जिन पर परोक्ष या अपरोक्ष रूप से दंगा भड़काने का आरोप है।

राजनीति के समीकरणों के चलते, वे वही कह और कर रहे हैं, जो उनके राजनीतिक हित में है। दुर्भाग्य से दोनों ही समुदाय के लोग उन्हें ही सुन भी रहे हैं। अभी अविश्वास की दीवार में थोड़ी-सी भी दरार नहीं पड़ी है, इसलिए राहत शिविरों में रह रहे हजारों लोग भी अपने गांवों में जाने को तैयार नहीं हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर कब तक वे राहत शिविरों में रहते रहेंगे। वक्त के साथ राहत सामाग्री भी कम होती जाएगी, जो शुरू होना भी हो गई है। उसके बाद क्या होगा? कौन किसको जिंदगी भर ऐसे ही खिलाता है? जहां तक सरकारी इमदाद की बात है, तो सब जानते हैं कि उसे लेना कितना दुश्वार है?

शुरू में कुछ लोगों ने ऐलान किया था कि पीड़ितों को मुसलिम बाहुल्य गांवों में बसाने के लिए जमीनें दी जाएंगी। वक्त के साथ वे आवाजें कमजोर होती जा रही हैं। आज के युग में जब जमीन के दाम आसमान छू रहे हैं, जमीन के एक टुकड़े के लिए भाई, भाई की जान ले रहा है, तो कौन मुफ्त या बहुत कम पैसों में अपनी जमीन किसको देगा? सबसे जरूरी सवाल यह है कि मुजफ्फरनगर की फिजाओं में गन्ने की मिठास की जगह सांप्रदायिकता का जो जहर तैर रहा है, उसे कैसे खत्म किया जाए? इसको खत्म करने की जिम्मेदारी किसकी है?

यदि कोई सोच रहा है कि राजनीतिक दल या प्रशासन इसे खत्म कर देगा, तो वह ख्वाबों की दुनिया में जीता है। इसकी जिम्मेदारी नागरिक समाज की है, जो दुर्भाग्य से सामने नहीं आना चाहता। दरअसल, नागरिक समाज डरता है। कोई जातिवाद का शिकार है, तो कोई राजनीतिक कारणों से चुप है। लेकिन वह वर्ग सबसे बड़ा है, जो ‘हमें क्या पड़ी है’ सोचकर मस्त है। एक वर्ग है, जो कमरों में बैठकर हालात पर अफसोस करता है, गोष्ठियों में लंबा-चौड़ा भाषण देता है और अगले दिन अखबार में अपनी तस्वीर देखकर सोचता है कि उसने अपना फर्ज पूरा कर दिया। यदि आज भी र्इंख के खेतों के पास से गुजरते हुए लोगों को दहशत होती है और हजारों लोग राहत शिविरों से जाना नहीं चाहते, तो यह उस नागरिक समाज की असफलता है, जो दिल्ली रेप कांड पर पूरे देश को हिला देता है। सरकार कानून बदलने के लिए मजबूर हो जाती है। दरअसल, सांप्रदायिकता के खिलाफ मुखर होना मुश्किल काम है बनिस्बत दिल्ली रेप कांड जैसे मुद्दे पर मुखर होने के। अभी भी देर नहीं हुई, सरकार नागरिक समाज के धर्मनिरपेक्ष लोगों को साथ लेकर अविश्वास की गांठें खोलने का काम करे।

लेखक Saleem Akhter Siddiqui हिंदी दैनिक जनवाणी, मेरठ में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09045582472 के जरिए किया जा सकता है.

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