दैनिक ‘सहाफत’ ने मुसलमान और सेक्युलरिज़्म के शीर्षक से लिखा है कि मुसलमानों का ये रवैया बहुत अजीब है कि जिन देशों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं और जिन्हें मुस्लिम देश कहा जाता है, वहां कभी सेक्युलरिज़्म का नाम नहीं लिया जाता, लेकिन जिन देशों में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, वहां मुसलमानों की तरफ़ से बराबर सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पर जोर दिया जाता है.
अख़बार कहता है कि मिसाल के तौर पर भारत में मुस्लिम नेता धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को बहुत ज़रूरी बताते हैं, लेकिन कभी किसी मुस्लिम नेता ने यह नहीं कहा गया है कि सऊदी अरब और दूसरे मुस्लिम देशों में भी धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था होनी चाहिए.
अशोक कुमार, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली





