Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

मध्य प्रदेश

मीडिया में आत्महत्या

भोपाल में हाल ही में पत्रकार राजेन्द्र राजपूत ने तंत्र से तंग आकर आत्महत्या कर ली। ऐसा करने वाले राजपूत अकेले नहीं हैं। मीडिया वाले अनेक वेबसाइट पर जांचा तो देखा कि हर प्रदेश में एक राजेन्द्र राजपूत हैं। कुछेक राजेन्द्र के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं तो कुछेक अभी मुसीबत से घिरे हुये हैं। यह आश्चर्यजनक ही नहीं, दुखद है कि जिन लोगांे ने समाज को जगाने और न्याय दिलाने की शपथ लेकर फकीरी का रास्ता चुना है, आज उन्हें मरने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। सरकार गला फाड़-फाड़ कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दे रही है और पत्रकार एक के बाद एक जान देने के लिये मजबूर हैं।

भोपाल में हाल ही में पत्रकार राजेन्द्र राजपूत ने तंत्र से तंग आकर आत्महत्या कर ली। ऐसा करने वाले राजपूत अकेले नहीं हैं। मीडिया वाले अनेक वेबसाइट पर जांचा तो देखा कि हर प्रदेश में एक राजेन्द्र राजपूत हैं। कुछेक राजेन्द्र के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं तो कुछेक अभी मुसीबत से घिरे हुये हैं। यह आश्चर्यजनक ही नहीं, दुखद है कि जिन लोगांे ने समाज को जगाने और न्याय दिलाने की शपथ लेकर फकीरी का रास्ता चुना है, आज उन्हें मरने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। सरकार गला फाड़-फाड़ कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दे रही है और पत्रकार एक के बाद एक जान देने के लिये मजबूर हैं।

अभिव्यक्ति की आजादी का यही सिला है तो पराधीन भारत ही ठीक था जहां गोरे जुल्म करते थे लेकिन शिकायत तो यह नहीं थी कि अपने लोग ऐसा कर रहे हैं। स्वाधीन भारत में पत्रकारों का यह हाल देखकर यह सोचना लाजिमी हो गया है कि आने वाले दिनों में पत्रकार नहीं, प्रोफेशनल्स ही मिलेंगे। और ऐसी स्थिति में पत्रकार मिले भी क्यों? क्यों वह समाजसेवा भी करे और बदले में जान भी गंवाये। एक प्रोफेशनल्स के सामने कोई जवाबदारी नहीं होती है। वह टका लेता है और टके के भाव काम कर खुद को अलग कर लेता है। तंत्र को उससे कोई शिकायत नहीं होती है और वह तंत्र से पूरा लाभ लेता है।

पत्रकारों की इस ताजा स्थिति की जानकारी प्रखर वक्ता और केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारीजी को भी होगी। उनकी तरफ से या मंत्रालय की तरफ से अब तक पत्रकारों की सुरक्षा के लिये अथवा दोषियों पर कार्यवाही के लिये कोई संदेश नहीं आया है। इस सवाल पर शायद जवाब होगा कि यह मामला राज्यों का है और राज्य शासन के मामले में हस्तक्षेप करने का हक केन्द्र को नहीं है। इन स्थितियों में ऐसे ही जवाब की उम्मीद की जा सकती है। खैर, सरकारें तो अपनी तरह से ही काम करती हैं। शिकायत तो उस समाज से है जिसके लिये पत्रकार जूझते और मरते हैं। हाल ही में प्राकृतिक आपदा फैलिन के समय जब लोग टेलीविजन को निहार रहे थे, सूचना पाने के लिये आतुर थे तब पत्रकार ही ऐसा शख्स था जो अपनी जान की परवाह किये बिना जन-जन तक सूचना दे रहा था। उनकी कुशलता के लिये आगाह और सजग कर रहा था। आज उसी पत्रकार की मौत पर समाज खामोश है। उसे इस बात की चिंता नहीं है कि सीमा पर सेना और समाज में पत्रकार ही उसके रक्षक हैं और रक्षक जब हताशा के पायदान पर पहुंच जाये तो आगे की स्थिति समझ लेना चाहिये।

पत्रकार जब अपना दायित्व करते हुये मौत के मुंह में समा जाते हैं तो वह शहीद होने के बराबर होता है। जिस तरह सीमा पर दुश्मनों से दो-दो हाथ करते हुये सैनिक शहीद हो जाते हैं तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है और जब पत्रकार शहीद हो जाता है तो कम से कम पत्रकार बिरादरी का सीना गर्व से फूल जाता है। दुख इस बात का है कि पत्रकार शहीद नहीं हो रहे हैं बल्कि उन्हें मरने के लिये मजबूर किया जा रहा है। यह एक जागरूक समाज के लिये मामूली सवाल नहीं है बल्कि तंत्र को सजग बनाये रखने वाले समाज के प्रहरी जब खतरे में हो तो आवाज हर तरफ से उठना चाहिये कि आखिर ऐसा क्यों। मुझे विश्वास है कि पत्रकारांे को मरने के लिये समाज यूं ही नहीं छोड़ेगा बल्कि उनकी भी खैर-खबर लेगा जो इसके लिये दोषी हैं। समाज का चैथास्तंभ इस समय खतरे में है और चौथा स्तंभ ही ढहने लगा तो समूचा लोकतांत्रिक ताना-बाना ध्वस्त हो जाएगा। खतरे की शुरूआत में ही रोक लिया जाये तो बेहतर।

लेखक मनोज कुमार भोपाल के पत्रकार हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...