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सुख-दुख...

मेरे खिलाफ शिकायत पर रामकृपाल सिंह ने नोट लिखा कि इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए

: नभाटा में चौदह साल की नौकरी के बाद मिला डिसमिसल : संस्थान में एक मैनेजर थे जो कबीर चौरा के फैन थे इसलिए उनके साथ मित्रता का भाव था। वैसे भी वह मेरे हमदर्द थे। संस्थान से नौकरी छोड़ कर अन्यत्र जा रहे थे। जाने से पहले उन्होंने मुझे बताया कि ''मुकुल की चार्जशीट तैयार थी मगर वह त्याग पत्र दे कर चला गया, डॉ. साहब आप सतर्क रहना, अगला नम्बर आपका है, और भी दो-तीन निशाने पर हैं, मगर उनके नाम नहीं बताउंगा और आप से भी वायदा लेना चाहता हूं कि आप यह सब किसी को नहीं बताएंगे।''

: नभाटा में चौदह साल की नौकरी के बाद मिला डिसमिसल : संस्थान में एक मैनेजर थे जो कबीर चौरा के फैन थे इसलिए उनके साथ मित्रता का भाव था। वैसे भी वह मेरे हमदर्द थे। संस्थान से नौकरी छोड़ कर अन्यत्र जा रहे थे। जाने से पहले उन्होंने मुझे बताया कि ''मुकुल की चार्जशीट तैयार थी मगर वह त्याग पत्र दे कर चला गया, डॉ. साहब आप सतर्क रहना, अगला नम्बर आपका है, और भी दो-तीन निशाने पर हैं, मगर उनके नाम नहीं बताउंगा और आप से भी वायदा लेना चाहता हूं कि आप यह सब किसी को नहीं बताएंगे।''

मुझे सतर्क रहने की जरूरत नहीं थी। न मैं लेट आता या ना पहले जाता था और ना ही काम के प्रति लापरवाही बरतता था। किसी से झगड़ा भी नहीं करता था। इसलिए निश्चिंत था मगर मैनेजर ने मुझ से झूठ नहीं बोला था इसलिए चिंता स्वाभाविक थी, तो सतर्क भी रहता था, मगर इतना जानता था कि जब मैनेजमेंट और उनके जमूरे संपादकों ने तय ही कर लिया है तो शीघ्र ही यहां से जाना पड़ सकता है। मुझे तो अपने बारे में पता था कि यूनियन गतिविधियों के कारण मैनेजमेंट मुझ से खुश नहीं है मगर दो तीन और कौन हो सकते हैं, इसका अनुमान मैं नहीं लगा सका। काफी सतर्कता के बावजूद एक दिन समाचार संपादक से मामूली विवाद हो ही गया।

समाचार संपादक महीने में एकाध बार यह करता था कि अवकाश छह दिन के स्थान पर सात दिन में देता था। मैं इसको सहज भाव से मान लेता था मगर इस बार छह दिन बाद अवकाश की सोच कर मैंने एक कार्यक्रम बना रखा था। सातवें दिन अवकाश पर मैंने आपत्ति की तो समाचार संपादक ने अफसरी लहजे में मुझे डांट दिया। इस पर मैंने भी तेज आवाज में कहा कि यह बनिये की दुकान नहीं है जो आप मनमर्जी चलाएंगे। बस इतना ही विवाद हुआ था। समाचार संपादक पहले रामकृपाल के कक्ष में गया और फिर नीचे चला गया। आकर उसने एक पत्र टाइप कराया।

टाइपिस्ट ने मुझे थोड़ देर बाद चुपके से आ कर बताया कि मेरी शिकायत की जा रही है। मैं समझ गया कि मैनेजर की बात सही थी। मेरे खिलाफ शिकायत पर रामकृपाल सिंह ने नोट लिखा कि इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। रामकृपाल सिंह उस समय सहायक संपादक थे और उन के पास किसी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश का अधिकार ही नहीं था। किसी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार संपादक का होता है और संपादक उस समय सूर्यकांत बाली थे। राजेंद्र माथुर से लेकर बाली जी तक यह परंपरा रही थी कि अगर दो लोगों में विवाद होता था तो उसकी शिकायत मैनेजमेंट से नहीं की जाती थी।

लगभग एक घंटे बाद मैनेजमेंट का बुलावा आया। मैं गया तो मुझे चार्जशीट थमा दी गई। मैंने राम कृपाल की सिफारिश पर एतराज किया तो मैनेजर सकपका गया। मैं चार्जशीट ले कर आया। विभाग में पता चला तो अधिकांश ने समाचार संपादक को बुरा भला कहा। मगर तब तक वह जा चुका था। इसके एक घंटे बाद एक सर्कुलर नोटिस बोर्ड पर लगा जिस में रामकृपाल सिंह को नभाटा के अनुशासन का इंचार्ज बनाया गया था। चार्जशीट में आरोप थे कि मैंने अपने सीनियर से अभद्रता की, काम में बाधा डाली और संस्थान को बनिये की दुकान कहा। इन सारे आरोपों का जवाब दे दिया गया तो जांच का नाटक आरंभ हो गया। मुझे पता था कि यह सब नाटक ही है। जो होना है वह तो पहले ही तय किया जा चुका है। जब सीनियर से अभद्रता की बात आई तो मैंने सोचा कि अब समाचार संपादक से अभद्रता कर ही दी जाए सो एक दिन जांच अधिकारी और अन्य मैनेजरों के सामने मैंने जांच के दौरान ही किसी बात पर सममाचार संपादक का हाथ पकड़ कर उसे उठा लिया और बाहर की ओर धक्का दे कर कहा कि चल आज तुझे बताता हूं कि अभद्रता क्या होती है, अगर तेरे हाथ पैर ना तोड़े तो मेरा नाम बदल देना।

मेरे इस व्यवहार पर सारे लोग हक्का बक्का रह गए। समाचार संपादक घिघियाने लगा तो मैंने उसे छोड़ दिया। जांच अधिकारी ने मेरे शब्द जस के तस उस दिन की कार्यवाही में लिख दिए। जांच में मेरी ओर से विभाग तथा बाहर के छह गवाह पेश हुए। समाचार संपादक की ओर से केवल एक सहायक समाचार संपादक पेश हुआ। जांच में मुझे अपराधी सिद्ध कर सेवा समाप्ति का नोटिस दे दिया। नोटिस का जवाब दे कर मैं घर आ गया और एक सप्ताह का मैडिकल भेज दिया। मैनेजमेंट ने इसी बीच सेवा समाप्ति का आदेश घर के पते पर भेज दिया और यह प्रचारित कर दिया कि मैंने त्याग पत्र दे दिया है।

दरअसल मेरी सेवाएं समाप्त कर मैनेजमेंट, राम कृपाल और समाचार संपादक अपराध बोध से ग्रस्त थे। मुझसे कई सहयोगियों ने पूछा तो मैंने बता दिया कि मुझे डिसमिस किया गया है। मैनेजमेंट को यह भी डर था कि मैं डिसमिसल के खिलाफ अदालत न चला जाउं, इसलिए मैनेजमेंट ने केवियट भी डाल दी थी। दो दिन बाद मैं दिल्ली आया और मैनेजमेंट से हिसाब करने को कहा तो मैनेजमेंट चौंका। उन्हें उम्मीद थी कि मैं अदालत जाउंगा मगर मैंने यूनियन, डी.यू.जे. और साथियों को बता दिया था कि मैं अदालत नहीं जाउंगा। दरअसल अदालती चक्कर से मुझे बड़ी उलझन होती है। दूसरे कई लोगों को मैंने देखा कि 10-12 साल से अदालत के चक्कर लगा रहे थे और अभी किसी फैसले के आसार नहीं थे। मैं किसी प्रकार की टेंशन रखने के मूड में नहीं था। टेंशन फ्री होकर मैंने पढने लिखने पर ध्यान लगाया। एक व्यंग्य संग्रह तैयार कर उसे छपवाया और एक उपन्यास भी छप कर उर्दू और पंजाबी में अनूदित हो गया। अब मैं अन्य अखबारों में लिखने के लिए स्वतंत्र था। सब्जेक्ट मेरे पास कम नहीं थे सो दिल्ली के सब अखबारों में खूब छपा। इसके साथ ही तीन उपन्यासों का खाका पहले से तैयार था सो शाह टाइम्स में जाने से पहले वह भी लिख डाले।

कुछ दिन बाद पता चला कि इरा झा को भी डिसमिस कर दिया गया है। इरा एक बोल्ड यंग लेडी। गलत बात का विरोध करने में देर नहीं करती थीं। इरा पर भी मेरे जैसे ही आरोप लगे थे। हुआ यह था कि दिल्ली में एक प्रदर्शन के चलते जाम लगा था जिस के कारण वह थोड़ी लेट हो गईं। समाचार संपादक और रामकृपाल तो मौके की तलाश में थे ही, सो आते समाचार संपादक ने इरा से जवाब मांग लिया। सबको पता था कि जाम लगा है। इरा ने समाचार संपादक से कहा कि जाम के कारण आप भी तो कई बार लेट होते रहे हैं। बस इसी में समाचार संपादक की तौहीन हो गई और रामकृपाल के माध्यम से शिकायत भेज दी गई। इरा को चार्जशीट मिली। जांच का नाटक हुआ और वह भी सेवा से निकाल दी गईं। अपने डिसमिसल के खिलाफ इरा अदालत गईं मगर कोई राहत न मिल सकी।

इसके बाद यूनियन के एक अन्य सक्रिय कार्यकर्ता हबीब अख्तर को इतना परेशान किया कि वह भी त्याग पत्र दे कर दूसरे अखबार में चला गया। हम तीनों के बाहर होने के बाद मैनेजमेंट ने वी. आर. एस. योजना लागू कर दी जिसे हमारे विरोध के चलत लागू नहीं कर पा रहे थे। हम लोग यूनियन को साथ ले कर सब एडीटर और रिपोर्टर के स्तर पर ठेके पर पत्रकार रखने का विरोध कर रहे थे। अब यह योजना भी लागू कर दी गई। यूनियन भी अब कमजोर पड़ गई थी सो मैनेजमेंट को हर प्रकार की छूट मिल गई थी। विरोध के स्वर उठने ही बंद हो गए थे। मैनेजर ने ठीक ही कहा था कि तीन चार लोग निशाने पर हैं। हम लोगों के निकाले जाने के बाद संपादक और समाचार संपादक खुल कर खेल रहे थे, जिस के बदले में मैनेजमेंट अखबार पर हावी हो गया और आज हालत यह है कि अच्छा खासा अखबार चूं चूं का मुरब्बा बन कर रह गया है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

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