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सुख-दुख...

…देखना कल के अखबार में यह खबर नहीं छपेगी

उस दिन बंबई के दफ्तर शाम से पहले ही सूने हो गए थे। हर कोई लोकल के बंद हो जाने से पहले ही अपने घर के भीतर पहुंच कर सुरक्षित हो जाने की हड़बड़ी में था। भारी बारिश और लोकल जाम-यह बंबईवासियों की आदिम दहशत का सर्वाधिक असुरक्षित और भयाक्रांत कोना था, जिसमें एक पल भी ठहरना चाकुओं के बीच उतर जाने जैसा था।

उस दिन बंबई के दफ्तर शाम से पहले ही सूने हो गए थे। हर कोई लोकल के बंद हो जाने से पहले ही अपने घर के भीतर पहुंच कर सुरक्षित हो जाने की हड़बड़ी में था। भारी बारिश और लोकल जाम-यह बंबईवासियों की आदिम दहशत का सर्वाधिक असुरक्षित और भयाक्रांत कोना था, जिसमें एक पल भी ठहरना चाकुओं के बीच उतर जाने जैसा था।

और ऐसे मौसम में भी सुधाकर रॉय शाम सात बजे ही क्लब चले गए थे। क्लब उनके जीवन में धमनियों की तरह था-सतत जाग्रत, सतत सक्रिय। क्लब के वेटर बताते थे कि सुधाकर रॉय पश्चिम रेलवे के ट्रेक पर बने बंबई के सबसे अंतिम स्टेशन दहिसर में बने अपने दो कमरों वाले फ्लैट से निकल कर इतवार की शाम को भी आजाद मैदान के पास बने इस क्लब में चले आते थे। सो, उस शाम विपरीत मौसम के बावजूद, सुधाकर रॉय क्लब में जिद की तरह मौजूद थे।

करीब ग्यारह बजे उन्होंने खिड़की का पर्दा सरकाकर आजाद मैदान के आसमान की तरफ ताका था। नहीं, उस ताकने में कोई दुश्चिंता नहीं छिपी थी। वह ताकना लगभग उसी तरह का था जैसे कोई काम न होने पर हम अपनी उंगलियां चटकाने लगते हैं, लेकिन सुखी इस तरह हो जाते हैं जैसे बहुत देर से छूटा हुआ कोई काम निपटा लिया गया हो।

आसमान पर एक धूसर किस्म का सन्नाटा पसरा हुआ था और आजाद मैदान निपट खाली था-वर्षों से उजाड़ पड़ी किसी हवेली के अराजक और रहस्यमय कंपाउंड सा। विषाद जैसा कुछ सुधाकर रॉय की आंखों में उतरा और उन्होंने हाथ में पकड़े गिलास से रम का एक छोटा घूंट भरा फिर वह उसी गिलास में एक लार्ज पैग और डलवाकर टीवी के सामने आ बैठ गए-रात बारह के अंतिम समाचार सुनने।

सुधाकर रॉय क्लब के नियमों से ऊपर थे। उन्हें साढ़े दस बजे के बाद भी शराब मिल जाती थी, चुपके चुपके, फिर आज तो क्लब वैसे भी सिर्फ उन्हीं से गुलजार था। छह वेटर और ग्राहक दो, एक सुधाकर रॉय और दूसरा मैं।

मैं दफ्तर में उनका सहयोगी था और उनके फ्लैट से एक स्टेशन पहले बोरीवली में किराए के एक कमरे में रहता था। उतरते वह भी बोरीवली में ही थे और वहां से ऑटो पकड़कर अपने फ्लैट तक चले जाते थे। मैं उनका दोस्त तो था ही, एक सुविधा भी था। सुबह ग्यारह बजे से रात ग्यारह, बारह और कभी कभी एक बजे तक उनके संग-साथ और निर्भरता की सुविधा।

हां, निर्भरता भी क्योंकि कभी-कभी जब वह बांद्रा आने तक ही सो जाते थे तो मैं ही उन्हें बोरीवली में जगा कर दहिसर के ऑटो में बिठाया करता था। मेरे परिचितों में जहां बाकी लोग नशा चढ़ने पर गाली-गलौज करने लगते थे या वेटरों से उलझ पड़ते थे वहीं सुधाकर रॉय चुपचाप सो जाते थे। कई बार वह क्लब में ही सो जाते थे और जगाने पर ‘लास्ट फॉर द रोड‘ बोल कर एक पैग और मंगा कर पी लेते थे। कई बार तो मैंने यह भी पाया था कि अगर वह लास्ट पैग मांगना भूल कर लड़खड़ाते से चल पड़ते थे, तो क्लब के बाहरी गेट की सीढ़ियों पर कोई वेटर भूली हुई मोहब्बत सा प्रकट हो जाता था-हाथ में उनका लास्ट पैग लिए।

ऐसे क्षणों में सुधाकर रॉय भावुक हो जाते थे, बोलते वह बहुत कम थे, धन्यवाद भी नहीं देते थे। सिर्फ कृतज्ञ हो उठते थे। उनके प्रति वेटरों के इस लगाव को देख बहुत से लोग खफा रहते थे, लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता था कि क्लब के हर वेटर के घर में उनके द्वारा दिया गया कोई न कोई उपहार अवश्य मौजूद था-बॉलपेन से लेकर कर कमीज तक और पेंट से लेकर घड़ी तक।

नहीं, सुधाकर रॉय रईस नहीं थे। जिस कंपनी में वह थे, वहां उपहारों का आना मामूली बात थी। यही उपहार वह अपने शुभचिंतकों को बांट देते थे। फिर वह शुभचिंतक चाहे क्लब का वेटर हो या उस बिल्डिंग का दरबान, जिसमें उनका छोटा सा, दो कमरों वाला फ्लैट था। फिलीपींस में असेंबल हुई एक कीमती रिस्टवाच उस वक्त मेरी कलाई में भी दमक रही थी, जब सुधाकर रॉय आजाद मैदान के आसमान में रंगे उस सन्नाटे से टकरा कर टीवी के सामने आ बैठ गए थे-अंतिम समाचार सुनने।

कुछ अरसा पहले एक गिफ्ट मेकर उन्हें यह घड़ी दे गया था। जिस क्षण वह खूबसूरत रैपर को उतारकर उस घड़ी को उलट-पुलट रहे थे, ठीक उसी क्षण मेरी नजर उनकी तरफ चली गई थी। मुझसे आंख मिलते ही वह तपाक से बोले थे-‘तुम ले लो। मेरे पास तो है।‘

यह दया नहीं थी। यह उनकी आदत थी। उनका कहना था कि ऐसा करके वह अपने बचपन के बुरे दिनों से बदला लेते हैं। सिर्फ उपहार में प्राप्त वस्तुओं के माध्यम से ही नहीं, अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित धन को भी वह इसी तरह नष्ट करते थे। एक सीमित, बंधी तन्ख्वाह के बावजूद टैक्सी और आॅटो में चलने के पीछे भी उनका यही तर्क काम कर रहा होता था।

सुनते हैं कि अपने बचपन में सुधाकर रॉय अपने घर से अपने स्कूल की सात किलोमीटर की दूरी पैदल नापा करते थे, क्योंकि तब उनके पास बस का किराया दो आना नहीं होता था।

टीवी के सामने बैठे सुधाकर रॉय अपना लास्ट पैग ले रहे थे। मैं बाहर गया हुआ था, लौटा तो क्लब का मरघटी सन्नाटा एक अविश्वसनीय शोरगुल और अचरज के बीच खड़ा कांप रहा था, पता चला सुधाकर रॉय ने अपने सबसे चहेते वेटर आनंद को चांटा मार दिया था।

अगर प्रतिक्रिया स्वरूप सारे वेटर एक हो जाएं और उस सुनसान रात में एक चांटा भी सुधाकर रॉय को जड़ दें तो उसकी आवाज पूरे शहर में कोलाहल की तरह गूंज सकती थी और मीमो बन कर सुधाकर रॉय के बेदाग कैरियर में पैबंद की तरह चिपक सकती थी।

ऐसा कैसे संभव है? मैं पूरी तरह बौराया हुआ था और अविश्वसनीय नजरों से उन्हें घूर रहा था। अब तक अपना चेहरा उन्होंने अपने दोनों हाथों में छुपा लिया था।

क्या हुआ? मैंने उन्हें छुआ। यह मेरा एक सहमा हुआ सा प्रयत्न था, लेकिन वह उलझी हुई गांठ की तरह खुल गए।
उस निर्जन और तूफानी रात के नशीले एकांत में मैंने देखा अपने जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार। वह चमत्कार था या रहस्य। रहस्य था या दर्द। वह जो भी था इतना निष्पाप और सघन था कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

सुधाकर रॉय के अधेड़ और अनुभवी चेहरे पर दो गोल, पारदर्शी आंसू ठहरे हुए थे और उनकी गहरी, भूरी आंखें इस तरह निस्संग थीं, मानों आंसू लुढ़का कर निर्वाण पा चुकी हों। दोनों घुटनों पर अपने दोनों हाथों का बोझ डाल कर वह उठे। जेब से क्लब का सदस्यता कार्ड निकाला। उसके चार टुकड़े कर हवा में उछाले और कहीं दूर किसी चट्टान से टकरा कर क्षत-विक्षत हो चुकी भर्राई आवाज में बोले -‘चलो, अब हम यहां कभी नहीं आएंगे।‘

‘लेकिन हुआ क्या? मैं उनके पीछे-पीछे हैरान-परेशान स्थिति में लगभग घिसटता सा क्लब की सीढ़ियों पर पहुंचा।

बाहर बारिश होने लगी थी। वह उसी बारिश में भीगते हुए स्थिर कदमों से क्लब का कंपाउड पार कर मुख्य दरवाजे पर आ खड़े हुए थे। अब बाहर धूल के बवंडर नहीं, लगातार बरसती बारिश थी और सुधाकर रॉय उस बारिश में किसी प्रतिमा की तरह निर्विकार खड़े थे। निर्विकार और अविचलित। यह रात का ग्यारह बीस का समय था और सड़क पर एक भी टैक्सी उपलब्ध नहीं थी। मुख्य द्वार के कोने पर स्थित पान वाले की गुमटी भी बन्द थी और बारिश धारासार हो चली थी।
‘मुझे भी नहीं बताएंगे?‘ मैंने उत्सुक लेकिन भर्राई आवाज में पूछा। बारिश की सीधी मार से बचने के लिए मैंने अपने हाथ में पकड़ी प्लास्टिक की फाइल को सिर पर तान लिया था और उनकी बगल में आ गया था, जहां दुख का अंधेरा बहुत गाढ़ा और चिपचिपा हो चला था।

‘वो साला आनंद बोलता है कि लतिकेश सिन्हा मर गया तो क्या हुआ? रोज कोई न कोई मरता है। लतिकेश ‘कोई‘ था?‘

सुधाकर रॉय अभी तक थरथरा रहे थे। उनकी आंखें भी बह रही थीं-पता नहीं वे आंसू थे या बारिश?

‘क्या?‘ मैं लगभग चिल्लाया था शायद, क्योंकि ठीक उसी क्षण सड़क से गुजरती एक टैक्सी ने च्चीं च्चीं कर ब्रेक लगाए थे और पल भर को हमें देख आगे रपट गई थी।

‘लतिकेश मर गया? कब?‘ मैंने उन्हें लगभग झिंझोड़ दिया।

‘अभी, अभी समाचारों में एक क्षण की खबर आई थी-प्रख्यात कहानीकार लतिकेश का नई दिल्ली के अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद देहांत।‘ सुधाकर रॉय समाचार पढ़ने की तरह बुदबुदा रहे थे, ‘तुम देखना, कल के किसी अखबार में यह खबर नहीं छपेगी। उनमें बलात्कार छप सकता है, मंत्री का जुकाम छप सकता है, किसी जोकर कवि के अभिनंदन समारोह का चित्र छप सकता है, लेकिन लतिकेश का निधन नहीं छप सकता। छपेगा भी तो तीन लाइन में… मानों सड़क पर पड़ा कोई भिखारी मर गया हो,‘ सुधाकर रॉय क्रमशः उत्तेजित होते जा रहे थे। आज शराब का अंतिम पैग उनकी आंखों में नींद के बजाय गुस्सा उपस्थित किए दे रहा था, लेकिन यह गुस्सा बहुत ही कातर और नख-दंत विहीन था, जिसे बंबई के उस उजाड़ मौसम ने और भी अधिक अकेला और बेचारा कर दिया था।

‘और वो आनंद…‘ सहसा उनकी आवाज बहुत आहत हो गई, ‘तुम बाहर थे, जब समाचार आया। आनंद सोडा रखने आया था… तुम जानते ही हो कि मैंने कितना कुछ किया है आनंद के लिए… पहली तारीख को सेलरी लेकर यहां आया था, जब आनंद ने बताया था कि उसकी बीवी अस्पताल में मौत से जूझ रही है…पूरे पांच सौ रुपए दे दिए थे मैंने जो आज तक वापस नहीं मांगे… और उसी आनंद से जब मैंने अपना सदमा शेयर करना चाहा तो बोलता है आप शराब पियो, रोज कोई न कोई मरता है… राघव के केस में भी यही हुआ था। दिल्ली से खत आया था परितोष का कि राघव की अंत्येष्टि में उस समेत हिंदी के कुल तीन लेखक थे। केवल एक साप्ताहिक ने उसकी मौत पर आधे पन्ने का लेख कंपोज करवाया था, लेकिन साला वह भी नहीं छप पाया था, क्योंकि ऐन वक्त पर ठीक उसी जगह के लिए लक्स साबुन का विज्ञापन आ गया था… यू नो, हम कहां जा रहे हैं?‘

सहसा मैं घबरा गया, क्योंकि अधेड़ उम्र का वह अनुभवी पत्रकार क्लब का नियमित ग्राहक, बुलंद ठहाकों से माहौल को जीवंत रखने वाला सुधाकर रॉय बाकायदा सिसकने लगा था।

फिर करीब छह महीने तक उनसे मुलाकात नहीं हो पाई। वह दफ्तर से लंबी छुट्टी पर थे। तीन चार बार मैं अलग-अलग समय पर उनके फ्लैट में गया लेकिन हर बार वहां ताला लटकता पाया।

इस बीच देश और दुनिया, समाज और राजनीति, अपराध और संस्कृति के बीच काफी कुछ हुआ। छोटी बच्चियों से बलात्कार हुए, निरपराधों की हत्याएं हुईं, कुछ नामी गुंडे गिरफ्तार हुए, कुछ छूट गए, टैक्सी और आॅटो के किराए बढ़ गए। घर-घर में स्टार, जी और एमटीवी आ गए। पूजा बेदी कंडोम बेचने लगी और पूजा भट्ट बीयर। फिल्मों में लव स्टोरी की जगह गैंगवार ने ले ली। कुछ पत्रिकाएं बंद हो गईं और कुछ नए शराबघर खुल गए। और हां, इसी बीच कलकत्ता में एक, दिल्ली में दो, बंबई में तीन और पटना में एक लेखक का कैंसर, हार्टफेल, किडनी फेल्योर या ब्रेन ट्यूमर से देहांत हो गया! गाजियाबाद में एक

अतुल कुशवाह

अतुल कुशवाह

लेखक को गोली मार दी गई और मुरादाबाद में एक कवि ने आत्महत्या कर ली।

ऐसी हर सूचना पर मुझे सुधाकर रॉय बेतरह याद आए, लेकिन वह पता नहीं कहां गायब हो गए थे। क्लब उनके बिना सूली पर चढ़े ईसा सा नजर आता था!

लेखक अतुल कुशवाह से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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