उत्तर प्रदेश में जिस अंदाज में मायावती सरकार से एक-एक करके मंत्रियों को बसपा से निकाला जा रहा है या फिर बसपा के छोटे-बडे़ राजनेता बसपा को छोड़ करके दूसरे दलों में शामिल हो रहे है, उससे बसपा का जनाधार व्यापक स्तर पर गिर रहा है। ऐसे मे बसपा सुप्रीमो और राज्य की मुख्यमंत्री मायावती ने बसपा का जनाधार बढ़ाने का जिम्मा सौंपा है सरकारी अधिकारियों को। इस काम में लगाये गये अधिकारियों ने अपने-अपने कर्मियों पर बसपा के पक्ष में मतदान करने का दबाब बनाना शुरू कर दिया है। एक दिन का वेतन काटने के साथ-साथ इन कर्मियों को निलंबित करने की भी धमकी दी जा रही है।
इसकी शुरुआत कहीं और से नहीं बल्कि मायावती यानी बसपा की कट्टर विरोधी सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के घर इटावा से हुई है। जिस विभाग में यह सब कुछ हुआ है या फिर सामने आया है उसका नाम है लोक निर्माण विभाग। राष्ट्रीय मार्ग निर्माण खंड, लोक निर्माण खंड में 29 दिंसबर को 4 चपरासी पद के कर्मचारियों रवींद्र सिंह, शैलेंद्र कुमार, माखन लाल और श्रीमती तारादेवी के खिलाफ राष्ट्रीय मार्ग खंड लोकनिर्माण विभाग, इटावा के अधिशासी अभिंयता अशोक कुमार ने कार्यालय पत्रांक 1110 से एक आदेश जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि उपरोक्त सभी कर्मी सरकारी कार्य में रूचि नहीं लेते हैं, ऐसा इससे पहले भी कई बार इन सभी की तरफ से किया जाता रहा है, जिसके चलते इनको मौखिक रूप से चेताया जाता रहा है। सिर्फ इतना ही नहीं कार्यालय के खुलने पर कार्यालय की सफाई नहीं की गई, जो इन कर्मियों की ओर से घोर अनुशासनहीनता के दायरे में आता है इस लिये सभी को आदेशित किया जाता है कि आप सभी का वेतन आहरित न करने के संबंध में भी आदेश पारित कर दिया गया है। अतः सभी अपना जबाब मुख्य लिपिक के माध्यम से दें। यह तो था अधिशासी अभिंयता अशोक कुमार का आदेश।
इसी दिन सभी कर्मियों ने सरकारी स्तर पर मिले आदेश का जबाब सयुंक्त रूप से दिया, जिसमें साफ तौर पर कहा गया कि हम सभी सुबह 9.45 पर मौजूद थे और सफाई का काम सफाई कर्मी सर्वेश कुमार और कार्यालय खोलने का काम चौकीदार प्रबल प्रताप सिंह करते हैं, उन्हीं के पास आफिस की चाबियां भी रहती हैं। यह दोनों कर्मी राष्ट्रीय मार्ग खंड लोकनिर्माण विभाग, इटावा के परिसर में ही रहते हैं। साथ ही अधिशासी अभियंता के अर्दली भी हैं। अब बात करते है कि इन कर्मियों को परेशान करने की, तो बता दें कि अधिशासी अभियंता अशोक कुमार अपने आप को मायावती का सबसे खास बता करके लोकनिर्माण विभाग के कर्मियों पर जुल्म ढाने का काम कर रहे हैं। दलित अफसर होने की वजह से हर कर्मी को अपने झांसे में लेते हैं। एक दिन के वेतन से वंचित हो चुका चपरासी माखन सिंह यादव का कहना है कि करीब छह महीने से अधिशासी अभियंता उसके खिलाफ कार्रवाई का मन बना रहे हैं और समय-समय पर निलंबित करने की धमकी देते रहते हैं। सबसे हैरत की बात यह है कि अधिशासी अभियंता की ओर से जिस तरह से बसपा के पक्ष में अपने साथियों से मतदान कराने के लिये प्रेरित किया जाता है और धमकाया जाता है उससे लोकनिर्माण विभाग के कर्मी बेहद परेशान है। यह परेशान कर्मी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर कार करे तो क्या करें।
अभी सुन रहे थे आप माखन की दास्तान। आगे बात करते है शैलेंद्र कुमार की, जो इसी विभाग मे माखन की ही तरह से चपरासी हैं। उसे तो अशोक कुमार करीब 3 साल से परेशान कर रहे हैं, लेकिन शैलेंद्र दलित अफसर का कुछ भी कर नहीं पा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि अशोक कुमार के राज्य की बसपा सरकार के बडे़ राजनेताओं से तालुकात के चलते अपनी मनमानी करने में जुटे हुये हैं। शैलेंद्र का साफ कहना कि इसी वजह से अधिशासी अभियंता अशोक कुमार उसे करीब 3 साल से परेशान करने के साथ-साथ निलंबित करने के साथ साथ बर्खास्त करने की धमकी देते रहे हैं, लेकिन आज अपनी कार्रवाई के क्रम में अधिशासी अभियंता ने उसका एक दिन का वेतन काटने का काम करके उसका सरकारी रिकार्ड खराब कर दिया है।
चपरासी के पद पर तैनात श्रीमती तारादेवी का कहना है कि अधिशासी अभियंता की मनमानी का विरोध करने के एवज में ना जाने किस तरह की कार्रवाई से जूझना पडे़गा। तारादेवी का कहना है कि हम लोग सरकारी कर्मी है ना कि किसी राजनैतिक दल से तालुक्त रखते हैं। इन सभी कर्मियों ने अधिशासी अभिंयता की तानाशाही से कुपित होकर उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त से इस बाबत शिकायत की है, क्यों कि अशोक कुमार इटावा में इस पद पर करीब 4 साल से तैनात हैं और राज्य की मुख्यमंत्री के इशारे मनमाना काम करके लोकनिर्माण विभाग कर्मियों को बसपा के पक्ष में काम ना करने पर उत्पीड़न करने में जुटे है। सभी पीडित कर्मियों ने चुनाव आयोग को शिकायत में अशोक कुमार को जातिवादी और जाति विशेष पर भेदभाव रचने वाला अफसर करार दिया है। इतना ही नहीं आयोग से यह भी शिकायत प्रभावी ढंग से की गई है कि इटावा में अशोक कुमार के सेवा का वक्त करीब 4 साल हो गया, इसलिये अशोक को तत्काल प्रभाव से इटावा से हटाया जाए ताकि बसपाई मानसिकता से काम करने वाले अफसर से मुक्ति मिल सके।
इन कर्मियों ने इटावा के डीएम पी गुरुप्रसाद को भी शिकायत की प्रति भेजी है, साथ ही अपने सगंठन के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों को इस बाबत शिकायत भेजी है ताकि संगठन के पदाधिकारी समय आने पर मदद कर सकें। सबसे हैरत कि बात यह है कि सभी कर्मियों का वेतन एक ही आदेश के तहत काटा गया है। अशोक कुमार ने सरकारी रिकार्ड के दस्तावेज में वेतन काटने की तिथि 29 दिसंबर 2010 दर्शाई है, जब कि यह कार्रवाई अमल में लाई गई है 29 दिंसबर 2011 को। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब भेदभाव से मन बना करके कार्रवाई अगर नहीं की गई है तो फिर कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के लिये तैयार किये गये दस्तावेजों में एक साल का अंतर आखिरकार कैसे हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि पीडित कर्मियों की ओर से जो कुछ रो-रो करके बयान किया जा रहा है उसमें जरूर कहीं ना कहीं सच्चाई का अंश नजर आ रहा है।
इस पूरे प्रकरण को लेकर जब आरोपी अधिशासी अभिंयता अशोक कुमार से बात करने की कोशिश की गई तो बड़ी मुश्किल से जबाब देने के लिये इस बाबत ही तैयार हुआ कि इस मामले में बोलूंगा कुछ भी नहीं। अधिक कुरेदने पर अधिशासी अभिंयता गुस्सा करते हुये यह बोल डाला कि इस मामले में कर्मियों से बात कर लें तो ज्यादा अच्छा रहेगा। अब सवाल उठता है कि इटावा में जिस तरह का मामला बसपा के पक्ष मे माहौल बनाने के लिये अधिकारियों की ओर से प्रयास किया गया है, अगर इसमें जरा भी सच्चाई है तो आसानी से समझा जा सकता है कि सत्ता के इशारे पर काम करने वालों की कोई कमी नहीं है, बस जरूरत ऐसे लोगों को ढूंढ
कर सामने लाने की। इस पूरे प्रकरण को लेकर अब चुनाव आयोग पर निगाह लगी हुई है क्यों कि पूरा मामला चुनाव आयोग के सामने भेज दिया गया है और अधिकारिक कार्रवाई भी आयोग की तरफ से ही की जायेगी।
लेखक दिनेश शाक्य सहारा समय उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के इटावा में रिपोर्टर हैं.






