: अंगद के पांव की तरह जमने के लिए मंथन करें हम : इसे ब्रेकिंग न्यूज की जगह अच्छी खबर कहना ज्यादा अच्छा होगा. हिन्दी पाठकों और खासकर बिजनेस जगत में रुचि रखने वालों के लिए अच्छी खबर है. ई.टी. हिन्दी बंद नहीं हुआ है और बंद होगा भी नहीं. बंद होने से सप्ताह पहले 12 की बजाए 10 पेज और आज 8 पृष्ठों का प्रकाशित हुआ है. फिलहाल रीलॉन्च के दौर से गुजर रहा है और जल्द ही दोबारा 12 पेजों का मिलने लगेगा. आज अखबार अपने नए लुक में है और संपादकीय नीति के तौर पर आंशिक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं जैसे राजनीति से जुड़ा एक कॉलम का समाचार भी पहले पृष्ठ पर है जो पहले नहीं होता था.
लेकिन इस अच्छी खबर के बीच एक मलाल जरूर है कि यह माजरा क्या है? टाइम्स ग्रुप का यू टर्न सोची समझी रणनीति थी, सनसनी जैसा कुछ पैदा करने की कोशिश जो शुक्रवार को पेपर बंद होने की घोषणा की गई और सोमवार को नए अंदाज में प्रकाशित करके चौंका दिया गया. या फिर जैसा पेपर दावा कर रहा है कि फ्राइडे (ई.टी. ने आज भी फ्राइडे लिखा है, शुक्रवार नहीं) पाठकों के फोन कॉल्स का सिलसिला शुरू हुआ और इस प्यार ने कंपनी को अपने फैसले पर फिर से सोचने को प्रेरित किया. वरिष्ठ पत्रकार अनिल रघुराज ने कुछ दिन पहले ही ई.टी. हिंदी के बंद होने पर अपने लेख में लिखा था कि इस पेपर में मौलिकता का अभाव है, अनुवाद आसान भाषा में नहीं है और हिन्दी से कटा हुआ है, हिन्दी के पाठकों को दोयम दर्जे का समझा गया है, जिनसे सहमत/असहमति भी स्वाभाविक है.
अगर पेपर वास्तव में बंद होने के बाद पाठकों की प्रतिक्रियाओं के कारण ही शुरू हुआ है तो टाइम्स ग्रुप को बधाई दी जानी चाहिए कि यह पाठकों की इच्छाओं का सम्मान है, हिंदी में बिजनेस पेपर की परम्परा को ग्रुप ने न केवल शुरू किया बल्कि लगातार आगे बढ़ाता दिख रहा है. और, अगर यह रणनीति है क्योंकि स्ट्रेटजिक मामलों में भी इस ग्रुप का कोई मुकाबला नहीं है, तो यह कहीं न कहीं निराश भी करती है. आप अपने पाठकों को निराश करके फिर संतोष दे रहे हैं कि हम आपकी बात मानते हैं. पेपर में पहले दिन से ही विज्ञापन न के बराबर था और भविष्य में भी होने की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि हिंदी के माथे यह तथाकथित कंलक भी है कि बी 2 बी यानी बिजनेस टू बिजनेस प्रकाशनों में विज्ञापनदाता यानी निर्णय लेने वाला उच्च स्तरीय प्रबंधन हिंदी नहीं पढ़ता.
कुछ दिन पहले यशवंत जी ने भी भड़ास के सामने वित्त संकट रखते हुए बंद करने की बात कही थी और फिर ई.टी. ने भी इसी रास्ते पर चलने की घोषणा की. इस परिदृश्य से इतना स्पष्ट है कि हिंदी में जो आकर्षक पहलकदमी हुई है, उसे निरंतर व स्थाई रखने में अनंत बाधाएं हैं. क्या आप, हम, ई.टी. हिंदी का प्रबंधन संभाल रहे पेशेवर साथी सब इतने समर्थ या काबिल नहीं है कि पाठकों का असीम प्यार पाने वाले प्रकाशन मुनाफे में आएं अथवा न लाभ न हानि के स्तर पर चलते हुए अपने सभी जरूरी खर्चे तो निकाल ही लें. ब्रांड बनें या न बनें. संपादकीय जगत के साथियों को बाजार में भी अंगद के पांव की तरह जमने के लिए निरंतर मंथन करना होगा क्योंकि किसी भी उत्पाद का फेल होना या प्रकाशन का बंद होना एक टीम की असफलता है. और मार्केटिंग से ज्यादा टीस संपादकीय साथियों के दिलों में होती है जो अपने अखबार, वेबसाईट को अपने बच्चे की तरह मानते हैं. और यह काम संपादकीय विभाग बेहतर तरीके से कर सकता है क्योंकि उसे अपने पाठकों, उसकी जरूरतों, उसकी स्थिति, मानसिक स्तर का ज्यादा पता होता है. मंथन करें और ऐसे सुझावों का आदान-प्रदान करें जिससे कोई भी हिंदी प्रकाशन असफल न हो. नव वर्ष पर एक संकल्प यह भी.
धीरज तागरा की रिपोर्ट. धीरज अपैरल आनलाइन हिंदी में असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09873335506 के जरिए किया जा सकता है.





