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लखनऊ

स्‍टेट बैंक वाले वीपी पांडेय का जाना रुला गया

वीपी पांडेय का देहांत हो गया है। मैंने वीपी पांडेय को पहली बार सन 1999 में देखा था। उन्‍हीं की मार्फत मैं भारतीय स्‍टेट बैंक की गंभीरता को समझ पाया। वे लखनऊ में अशोक मार्ग शाखा के मुख्‍य प्रबंधक थे। हर काम पूरी शिद्दत के साथ समझना और उसे हर कीमत पर पूरा करना उनके जीवन का लक्ष्‍य लगा। आने वाले हर शख्‍स-ग्राहक के साथ वे तपाक के साथ मिलते थे। वे एक निहायत सरल मगर अनुशासन-प्रिय शख्‍स थे, जबकि मैं कुछ मजाकिया। मगर, कम्‍माल यह कि बस दस मिनट भर में ही हमारी दोस्‍ती हो गयी। अम्‍बेडकर नगर के रहने वाले थे पांडेय जी।

वीपी पांडेय का देहांत हो गया है। मैंने वीपी पांडेय को पहली बार सन 1999 में देखा था। उन्‍हीं की मार्फत मैं भारतीय स्‍टेट बैंक की गंभीरता को समझ पाया। वे लखनऊ में अशोक मार्ग शाखा के मुख्‍य प्रबंधक थे। हर काम पूरी शिद्दत के साथ समझना और उसे हर कीमत पर पूरा करना उनके जीवन का लक्ष्‍य लगा। आने वाले हर शख्‍स-ग्राहक के साथ वे तपाक के साथ मिलते थे। वे एक निहायत सरल मगर अनुशासन-प्रिय शख्‍स थे, जबकि मैं कुछ मजाकिया। मगर, कम्‍माल यह कि बस दस मिनट भर में ही हमारी दोस्‍ती हो गयी। अम्‍बेडकर नगर के रहने वाले थे पांडेय जी।

नौकरी की स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया में क्‍लर्क की हैसियत से, लेकिन उसके बाद उन्‍होंने अपने कड़े परिश्रम पर बैंक में सहायक महाप्रबंधक का ओहदा हासिल किया। वे जिस भी शाखा में रहे, उस शाखा को उन्‍होंने श्रेष्‍ठ बना दिया और कर्मचारियों-अधिकारियों के साथ ही साथ अपने ग्राहकों को अपना बना लिया।  चाहे वह अशोक मार्ग रहा हो, सीतापुर मेन ब्रांच रहा हो, अमीनाबाद रहा हो या फिर सचिवालय शाखा। वे चार बार अपने बैंक के सीजीएम क्‍लब के सदस्‍य रहे हैं।

दरअसल, वीपी पांडेय की पत्‍नी की बहन की ससुराल में मामा के दर्जे में दाखिल थे डॉक्‍टर उपेंद्र पांडेय, लेकिन वीपी पांडेय उन्‍हें पूरे सम्‍मान के साथ मामा कहते-पूजते थे। उपेंद्र इस समय दैनिक ट्रिब्‍यून अखबार में इनपुट हेड हैं। मेरी पहली मुलाकात में भी वे मेरे बेहद करीबी हो गये। यकीनन उपेंद्र से भी ज्‍यादा। चंद दिनों में ही हमारी आत्‍मीयता घरेलू हो गयी। इतनी करीबी, कि उनकी मां और फिर उनकी इलाज के लिए मैं वाराणसी से अपना खून देने अस्‍पताल और पीजीआई तक पहुंच गया। हमारे निजी मामलों पर भी वे हमेशा संवेदनशील बने रहे। उनकी पत्‍नी भी उसी तरह। मेरा स्‍वागत वहां हमेशा रहा। आत्‍मीयता का स्‍तर तक यहां तक पहुंच गया कि जब भी वे किसी से मेरा परिचय कराते थे, तो कहते हैं:- यह कुमार सौवीर जी हैं, मेरे भाई हैं। अमीनाबाद की शाखा में तो मेरी बेटियां बकुल और साशा के नाम का डंका पिछले सात साल से बज रहा है। मेरी बेटियों को अभी तक वहां के ज्‍यादातर लोग पहचानते और स्‍नेह देते हैं।

लेकिन यह बात तो काफी बाद की है।

अशोक मार्ग शाखा से हुई पहली भेंट के कुछ ही दिन बाद मेरा दाहिना पैर एक दुर्घटना में बुरी तरह चकनाचूर हो गया था। मैं तो उस वक्‍त बेरोजगार था। वीरेंद्र भाई को अचानक खबर मिली तो वे भागे-भागे नर्सिंग होम पहुंचे और उसके बाद जब तक मैं अस्‍पताल रहा, वे रोजाना कभी सुबह तो कभी शाम नियमित तौर पर मेरे पास आते रहे। बाद में पता चला कि उन्‍होंने मेरे इलाज में काफी पैसा भी खर्चा किया था। पांडेय, सिन्‍हा, सीएस भारती, एके द्विवेदी, प्रभात कुमार, डीके कपूर, पवन के केडिया, वीरेंद्र के श्रीवास्‍तव, प्रभात पांडेय जैसे लाजवाब लोग मुझे वीरेंद्र पांडेय के चलते ही मिले। मस्‍टरानी भौजी यानी वीरेंद्र भाई की पत्‍नी की जुबान मानो बेहद मीठी चाशनी की कैंची की तरह लगती थी। कम से कम मेरे संदर्भ में तो वे हमेशा मेरे कान कतरती रहती थीं। दो बेटियां और बेटा ने हमेशा मुझे चाचा का ओहदा दिया।

वीपी पांडेय, यानी प्रॉब्‍लम-सॉल्‍वर। जी हां, अपने पूरे जीवन में मुझे वीरेंद्र पांडेय जैसा कोई शख्‍स नहीं मिला, जो अपने साथ ही साथ बाकी लोगों की समस्‍याओं को भी बराबरी के स्‍तर पर देखते और सुलझाने का माद्दा रखता हो। इसी खूबसूरती के चलते वे जब जहां भी होते, उनके लोगों की भीड़ लग जाती थी।

चार साल पहले उनके एक डॉक्‍टर उन्‍हें जबरिया चेक किया। और पाया कि उनके गुर्दे में कैंसर बढ़ रहा है। आनन-फानन पीजीआई में उनका ऑपरेशन हुआ। और वे पूरी तरह स्‍वस्‍थ हो गये। लेकिन अचानक वे फिर अस्‍वस्‍थ हुआ और बैंगलोर, दिल्‍ली, मुम्‍बई में उनका चेकअप हुआ। पता चला कि उनके दिल की धमनियों में जमाव है और दिमाग में कैंसर फैल रहा है। कीमो-थेरेपी शुरू हो गयी। लेकिन इसके बावजूद वे जीवंत रहे। चाहे भी रहे हों, मुझसे बातचीत करते। और बीती गुरूवार की देर शाम वे पंच-तत्‍व में विलीन हो गये।

अरे नहीं, वीरेंद्र भाई मरे नहीं है। वे हमेशा मेरे साथ रहेंगे, बतियाते रहेंगे, ठहाका लगाते रहेंगे। इस वक्‍त भी मैं भले ही अपनी आंख और आंसू पोंछ रहा हूं, लेकिन बातचीत तो चल ही रही है।

है ना पांड़े जी ?

लेखक कुमार सौवीर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई चैनलों और अखबारों में प्रमुख पदों पर कार्यरत रहे हैं. इन दिनों मीडिया और समाज से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स को लेकर सक्रिय हैं. कुमार सौवीर से संपर्क [email protected] या [email protected] या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.


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