दैनिक जागरण, मेरठ के संपादकीय प्रभारी मनोज झा मूलतः भागलपुर के रहने वाले हैं और खुले मन-मिजाज वाले दक्षिणपंथी पत्रकार हैं. अपने शौक, अपने विचार, अपनी स्टाइल, अपनी पसंद-नापसंद सबकुछ वो खुलेआम रखते हैं. यही कारण है कि मैनेजर किस्म के प्राणी उनसे नाखुश रहते हैं और उनके किसी मसले को तिल का ताड़ बनाने की फिराक में लगे रहते हैं. झा साहब को सुर्ती-तंबाकू का खूब शौक है. जब भागलपुर जाते हैं तो वहां से अच्छी खासी असली तंबाकू आदि की खेप लेकर मेरठ आते हैं.
पिछले दिनों इलाहाबाद से उनके किसी चाहने वाले ने तंबाकू की सौ के करीब पुड़िया उनके नाम कूरियर कर दिया. असल में महाकुंभ के मौके पर झा साहब इलाहाबाद गए थे कवरेज में तो भक्तों-संतों की अच्छी खासी फौज वहां तैयार कर लौटे जिनसे संपर्क-संबंध आज भी जारी है. भारी-भरकम पैकेट जब कूरियर के जरिए दैनिक जागरण, मेरठ के गेट पर पहुंचा तो सुरक्षा गार्डों ने उसे रिसीव कर उसे जांचने-सूंघने लगे.
पता चला कि इसमें से तंबाकू किस्म की खुश्बू-बदबू आ रही है तो उसे तुरंत यूनिट के मैनेजर विकास चुघ के हवाले कर दिया गया. मैनेजर को मानों मन मांगी मुराद मिल गई. वे दौड़े दौड़े ये पैकेट लेकर अखबार के डायरेक्टर तरुण गुप्ता के पास पहुंचे. तरुण जी ने पूरे मसले पर न्याय करने का फैसला लिया और सबको अपने चेंबर में मीटिंग-बैठक के लिया बुलाया. दोनों पक्षों के तर्क-वितर्क को उन्होंने गौर से सुना और फैसला सुनाने से पहले हर एक को खूब बोलने का मौका दिया. अंत में उन्होंने कहा कि इस आफिस के अंदर नो सुर्ती तंबाकू बीड़ी गुटका पान… आगे से ऐसी हरकत पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. इसके बाद मीटिंग बर्खास्त कर दी गई.
झा साहब के चाहने वाले देर शाम तक आफिस में बैठे रहे ताकि पता चल सके कि बैठक में क्या फैसला हुआ. झा विरोधी लाबी इस पूरे मामले को उनके खिलाफ प्रचारित-प्रसारित करने में लगी है. और, झा साहब हैं कि अपने पुराने अंदाज में मस्त… वे कहने लगे अपने एक करीबी से… ''मेरा क्या है… सुर्ती अंदर होगी तो भी दिक्कत नहीं… नहीं होगी तो भी दिक्कत नहीं… मेरा क्या है…''
(कानाफूसी)





