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सुख-दुख...

न हो सकी जो बात चौरसिया जी से

हरिभाई हमेशा थोड़ी जल्दी में होते हैं। आँधी की तरह आये, बाँसुरी की तान छेड़ी और खाना-वाना खाये बगैर किशमिश के चार दाने मुंह में डालकर तूफान की तरह चले गये। गाड़ी से उतरकर मंच पर विराजने और लौटकर फिर अपने वाहन में सवार होने तक लोगों ने उन्हें घेरे रखा था। किसी को उनके आटोग्राफ चाहिये थे तो किसी को उनके साथ फोटू खिंचानी थी। कुछ लोग एक सेलिब्रिटी के साथ महज चंद पल गुजारने का सुख लूटना चाहते थे, सो लूट लिया। मुझे उनका इंटरव्यू करना था, जो नहीं हो सका। हरिभाई ने लगातार दूसरी बार धोखा दिया।

हरिभाई हमेशा थोड़ी जल्दी में होते हैं। आँधी की तरह आये, बाँसुरी की तान छेड़ी और खाना-वाना खाये बगैर किशमिश के चार दाने मुंह में डालकर तूफान की तरह चले गये। गाड़ी से उतरकर मंच पर विराजने और लौटकर फिर अपने वाहन में सवार होने तक लोगों ने उन्हें घेरे रखा था। किसी को उनके आटोग्राफ चाहिये थे तो किसी को उनके साथ फोटू खिंचानी थी। कुछ लोग एक सेलिब्रिटी के साथ महज चंद पल गुजारने का सुख लूटना चाहते थे, सो लूट लिया। मुझे उनका इंटरव्यू करना था, जो नहीं हो सका। हरिभाई ने लगातार दूसरी बार धोखा दिया।

इससे पहले ग्वालियर के तानसेन संगीत समारोह में इस तरह का वाकया हो चुका है। कोई 22-23 साल पहले की घटना है। शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में उन दिनों दो नाम बेहद उभरकर सामने आ रहे थे। एक थे रशीद खाँ और दूसरे मुकुल शिवपुत्र। रशीद खाँ अब उस्ताद रशीद खाँ हो चुके हैं और बकौल भीमसेन जोशी हिंदुस्तानी संगीत में कम से कम से एक नाम तो ऐसा है जो इसकी शमआ को जलाये हुए लगातार रोशनी बिखेरे हुए है। दूसरी ओर मुकुल शिवपुत्र, जो कुमार गंधर्व के सुपुत्र हैं, लगातार संगीत के अलावा भी दीगर कारणों से खबरों में आते रहे। कभी उनके बारे में मंदिर की सीढ़ियों में भीख मांगने की खबर आयी, तो कभी नशा मुक्ति केंद्र से भाग जाने की और कभी केंद्र में वापस भेज दिये जाने की। बीच-बीच वे प्रोग्राम भी करते रहे पर उन्हें वह मुकाम हासिल नहीं हो पाया जो रशीद खाँ साहब ने बहुत कम उम्र में हासिल कर लिया। यही मुकुल शिवपुत्र ग्वालियर में हरिभाई के आने से पूर्व मोर्चा संभाले हुए थे। कुछ सुनकार उनके व्यवहार में एक खास किस्म की उच्छृंखलता महसूस कर रहे थे पर चूंकि सुबह-सवेरे ही मैं उनसे मिल आया था, मुझे उनके इस रवैये पर कोई हैरानी नहीं हो रही थी।

मुकुल का इंटरव्यू करते हुए मुझे उनके अंदर एक बेचैनी, रोष, वेदना व अस्थिरता के मिले-जुले भाव परिलक्षित हो रहे थे, जिन्हें कला-जगत की भाषा में आम तौर पर ‘फ्रस्टेशन’ के नाम से जाना जाता है। मुकुल उस्ताद अमीर खान व बड़े गुलाम अली खाँ साहब के बाद भीमसेन जोशी को छोड़कर लगभग सारे गवैयों को खारिज करने पर तुले हुए थे। उनके साथ खैरागढ़ के मुकुंद भाले भी थे। मुकुल पूछ रहे थे-शायद अपने आपसे- सब तरफ तो शोर ही शोर है, कराह हैं, चीखें है, आपको संगीत कहाँ सुनाई पड़ता है? तब मुझे अंदेशा नहीं था कि उनके अंदर की यह बेचैनी उन्हें एक दिन नशा मुक्ति केंद्र तक खींचकर ले जायेगी। ये सारी खबरे मुझे टुकड़ों में मिलती रहीं और इनकी पुष्टि का मेरे पास कोई साधन नहीं था। इन्हीं मुकुल शिवपुत्र ने बातों ही बातों में मुझसे कहा कि आप हरिभाई से नहीं मिल पायेंगे। मध्यप्रदेश पर्यटन निगम वालों ने उनके लिये होटल का कमरा तक बुक नहीं किया है और वे आँधी की तरह आकर तूफान की तरह निकलने वाले हैं। तब मुझे क्या पता था कि यही किस्सा इतने अरसे बाद एक बार फिर दोहराया जायेगा।

बहरहाल, हरिभाई शायद स्टेशन से सीधे ही कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे थे। मुकुल ने उनके आगमन की आहट के साथ अपना गाना बीच में ही बंद कर दिया। वे कुमार साहब का मशहूर भजन ‘गुरूजी जहाँ बैठूं वहाँ छाया दे’ गा रहे थे। लोग मंत्र-मुग्ध सुन भी रहे थे, पर मुकुल के अंदर कुछ और ही बज रहा था और वे गाना छोड़कर मंच से चले गये। उत्तर भारत की कड़ाके की ठंड के साथ रात के गहराने के बावजूद लोग पंडित हरिप्रसाद चौरसिया को सुनने के लिये जमकर बैठे हुए थे। एक पहाड़ी धुन जो हरिभाई ने सुनाई थी, दो दशकों बाद अब भी कानों में गूंजती है। इस धुन के शबाब में आने पर चौरसिया जी एक छोटी बासुँरी का प्रयोग करते हैं और इसके ऊँचे सुर आपको वहाँ ले जाकर छोड़ते हैं, जहाँ आप अपनी दुनियावी व दिमागी झंझटों से मुक्त होकर अपनी आत्मा के किसी कोने में स्वयं को भारहीन महसूस करते हुए गोते लगाते रहते हैं और जब तक हरिभाई अपनी स्वर लहरियों को समेट कर एक सफेद रुमाल अपने होंठों पर फेरते हैं तब लगता है कि आप कई हजार किलोमीटर की रफ्तार से आकाश से जमीं में आ गिरे हों। लोग मुकर्रर-मुकर्रर के नारे का जाप करते हैं पर हरिभाई कहते हैं कि ‘‘भूख लग आई है। स्नान भी नहीं किया है।’’ पीछे से एक सुनकार कहता है, ‘‘आपके इंतजार में खाना तो हमने नहीं खाया है और भला इतनी ठंड में कोई नहाता है क्या?’’

कल छत्तीसगढ़ के एक नामालूम से कस्बे बेमेतरा में हरिभाई ने फिर यही कहा, ‘‘ भूख लग आयी है।’’ हालांकि खाना उन्होंने नहीं खाया और सीधे कार में सवार होकर ‘यह जा वह जा’ की तर्ज पर रायपुर के लिये रवाना हो गये। अगर रुककर भोजन कर लेते तो शायद इसी दौरान कुछ बातचीत हो जाती पर सोचता हूँ कि ऐसा क्या बचा होगा हरिभाई के पास बताने को और मुझे पूछने को जो इतने सालों में कहा-सुना नहीं गया। संगीत सभाओं में जाकर गाना-बजाना सुनना ही अपना प्रमुख ध्येय होता है और इस दौरान एकाध इंटरव्यू हो जाये तो वह एक बाई-प्रॉडक्ट है। न हो पाये तो कोई मलाल भी नहीं।

हालांकि इंटरव्यू तो फिर भी हुआ। स्कूली छात्रों ने हरिभाई से अजब सवाल पूछे और हरिभाई ने उनके गजब जवाब दिये। वे हल्के मूड में थे। बच्चों का प्रोग्राम था। स्कूली बच्चों के बीच ‘स्पीक-मैके’ शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार के लिये पिछले कई सालों से यह आयोजन कर रही है। हरिभाई ने ‘बड़ों’ को पहले ही चेतावनी दे दी कि वे न तो उनकी कोई फर्माइश पूरी करेंगे और न ही उनके किसी सवाल का जवाब देंगे। बच्चों के लिये पूरी तरह से ‘‘दूध-भात’’ था। एक बच्चे ने पूछा कि आपने वाद्य के रूप में बाँसुरी को ही क्यों चुना? हरिभाई ने कहा कि ‘‘सस्ती पड़ती है। अमेरिका और योरोप में स्टील की बनती है पर अपने यहाँ केवल बाँस से। पांच रूपये में मिल जाती है। हवाई जहाज में जाने पर अलग से किराया देकर लगेज बुक करना नहीं पड़ता। सितार वगैरह खोलकर दिखाना पड़ता है, इसमें सिक्योरिटी का कोई झंझट नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि हाथ में रहे तो रात के सन्नाटे में कुत्ते भी नजदीक आने से डरते हैं!’’

एक दूसरे बच्चे ने पूछा, ‘‘ हारमोनियम व सितार वगैरह को दूसरे कलाकार बजाने के पहले ट्यून करते हैं। बाँसुरी के साथ यह काम कैसे होता है?’ हरिभाई ने जवाब दिया कि ‘‘बाँसुरी ट्यून नहीं करते। अलग-अलग रेंज की चार-पाँच बाँसुरी साथ रखते हैं। पर ज्यादा नहीं रखते। बीस-पच्चीस रख ली तो लोग सोचेंगे कि यह कलाकार नहीं बाँसुरी बेचने वाला है।"

देर तक कुछ इसी तरह के दिलचस्प सवाल-जवाब होते रहे। कर्नाटक से आये पंडित एम. वेंकटेश कुमार ने अपनी गरज भरी आवाज में खयाल, ठुमरी व भजन पेशकर मन मोह लिया पर धन्यवाद का असल पात्र एलांस पब्लिक स्कूल है, जिसने एक बेहद खुशनुमा माहौल में इस तरह के आयोजन का जोखिम उठाया वह भी मेहमानों के साथ सौम्य व्यवहार के साथ। पब्लिक स्कूलों में, जहाँ लोग खांसते व छींकते भी अंग्रेजी में हैं, हिंदी मीडिया के लोगों के साथ सद्व्यवहार आश्चर्यजनक रहा। या शायद मजबूरी हो उनकी, क्योंकि लोकल मीडिया ले-देकर यही है।

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं.  उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के अन्य आलेख / संस्मरण / रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें… भड़ास पर दिनेश

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