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उत्तराखंड

उत्तराखण्ड राज्य : न खुदा ही मिला न बिसाले सनम

उत्तराखण्ड की जनता ने यहां की गिरि-कंदराओं से लेकर देश के महानगरों की सड़कों तक पृथक राज्य आन्दोलन इसलिए लड़ा था कि वह समय की दीवार पर अपना भाग्य स्वयं लिख सके. यह राज्य उसे उपहार में नहीं मिला, बल्कि इसके लिए लोगों ने दशकों तक आत्म-उत्पीड़न झेला और शहादतें दीं हैं. इस आन्दोलन के दौरान राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने पहाड़ के भोले-भाले तथा राष्ट्रभक्त लोगों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाई.

उत्तराखण्ड की जनता ने यहां की गिरि-कंदराओं से लेकर देश के महानगरों की सड़कों तक पृथक राज्य आन्दोलन इसलिए लड़ा था कि वह समय की दीवार पर अपना भाग्य स्वयं लिख सके. यह राज्य उसे उपहार में नहीं मिला, बल्कि इसके लिए लोगों ने दशकों तक आत्म-उत्पीड़न झेला और शहादतें दीं हैं. इस आन्दोलन के दौरान राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने पहाड़ के भोले-भाले तथा राष्ट्रभक्त लोगों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाई.

मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा काण्ड जैसे अमानवीय कृत्य इसी आन्दोलन के दौरान हुए. राज्य बनने के बारह वर्ष बाद भी उत्तराखण्डवासी विकास की बाट जोह रहे हैं. अभी तक इस पर्वतीय राज्य को ऊपर से थोपे गये छः मुख्यमंत्री भले ही मिल गये हो परन्तु उनमें यशवंत सिंह परमार जैसा स्वप्नदर्शी योजनाकार एक भी हिमालयी नेता नहीं था जो उत्तराखण्ड के विकास के लिए सही रोड मैप बना सके. राज्य बनने से पहले उत्तराखण्ड क्रांति दल को पहाड़ के संदर्भ में सही सोच वालों का समूह माना जाता था परन्तु 1994 के पृथक राज्य आन्दोलन के बाद हुए लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करना उसके लिए इतना भारी पड़ गया कि आज उसका वजूद ही लगभग समाप्त हो गया है.

जिस आशा और विश्वास के साथ उत्तराखण्ड की जनता ने पृथक राज्य का निर्माण करवाया था, यह अब तक उसके इर्द-गिर्द भी नहीं पहुंच पाया है. राज्य बनने से पहले यह धारणा थी कि उत्तराखण्ड के विकास के नाम पर जो पैसा केंद्र सरकार द्वारा भेजा जाता है, वह पहाड़ के गिरि-कंदराओं तक नहीं पहुंच पाता. इसलिए यहां के लोगों को लगा कि विकास के लिए अलग राज्य जरूरी है. परिणामस्वरूप उत्तराखण्ड के आमजन को आन्दोलन के लिए विवश होना पड़ा. 1994 के उस ऐतिहासिक जनान्दोलन में हमेशा काम के बोझ से लदी रहने वाली पहाड़ की मातृशक्ति ने भी अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी इसीलिए निभाई थी कि उसके नौनिहालों के हाथों में शराब की बोतल की जगह कोई ढंग का काम होगा. परन्तु सारे सपने इतनी जल्दी चकनाचूर हो जायेंगे, यह शायद किसी ने कभी सोचा भी न होगा. यहां मानना होगा कि राज्य का विकास न तो रातोंरात सम्भव है और न ही किसी के पास जादू की छड़ी. मगर सपने तो हों और उन्हें साकार करने की प्रबल इच्छाशक्ति तो हो.

उत्तराखण्ड राज्य आमजन के संघर्ष और बलिदानों की वजह से बना और उसका मकसद यहां का समुचित विकास कर पलायन समाप्त करना था. लेकिन राज्य बनने के बाद यहां के सभी राजनैतिक दलों के नेताओं ने इसका लाभ अपनी जागीर के तरह लेना शुरू कर दिया. राजनेताओं को उत्तराखण्ड की आशाओं, अपेक्षाओं तथा आकांक्षाओं से कोई भी लेना-देना नहीं है. सत्ता में जिस भी दल की सरकार आई, उसने यहां लूट-खसोट के अलावा कुछ नहीं किया.

इसका मुख्य कारण यह रहा कि पृथक पहाड़ी राज्य के धुर विरोधी नेता ही उनके आकाओं द्वारा यहां के भाग्य-विधाता बना दिये गये. जीवन भर अपने पहाड़ विरोधी रवैये तथा चमचों के विकास पुरुष के नाम से बदनाम रहे और राज्य आन्दोलन के दौरान ‘‘उत्तराखण्ड राज्य मेरी लाश पर बनेगा’’ कहने वाले नारायण दत्त तिवारी इस नवोदित राज्य पर बतौर मुख्यमंत्री कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा बलात् थोप दिये गये. तत्कालीन सांसद भुवनचंद्र खण्डूरी का प्रधानमंत्री को श्रीनगर से फोन पर यह कहना कि ‘‘मेरे निर्वाचन क्षेत्र गढ़वाल के एक लाख भूतपूर्व सैनिक 2 अक्टूबर, 1994 की दिल्ली रैली में भाग लेंगे’’ ही वह एकमात्र कारण था जिसने मुजफ्फरनगर काण्ड को जन्म दिया. उस लोमहर्षक अमानवीय कुकर्म के लिए मुलायम सिंह के साथ बराबर के जिम्मेदार होने के बावजूद भाजपा ने उन्हें एक नहीं दो बार उत्तराखण्ड पर बतौर मुख्यमंत्री थोप दिया. उस पर भी अफसोस यह कि उन्होंने मुजफ्फरनगर काण्ड के दोषियों को सजा दिलवाने और अपने माथे पर लगे उस कलंक को धोने के लिए दोनों ही बार कुछ भी नहीं किया. उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का अपहरण करने वाले केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हरीश रावत भी उक्त काण्ड के अपराधियों को सजा दिलाने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते. जिन लोगों ने तब राज्य आन्दोलन में अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी, राज्य गठन के बाद राजनेताओं ने उनकी घोर उपेक्षा की. यही नहीं उन लोगों को राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में सभी राजनैतिक दलों ने पार्टी में हाशिये में डाल दिया. अलबत्ता उनका इस्तेमाल अपने लिए जरूर किया.

यहां सबसे बड़ी खेदजनक बात यह है कि इस नवगठित पहाड़ी राज्य का विकास भले ही आशानुरूप नहीं हुआ लेकिन नेताओं के पेट जरूर फूलते जा रहे हैं. अलग राज्य बनने से पहले उत्तराखण्ड का सालाना बजट 400 करोड़ था, जो अब 70,000 करोड़ पार कर गया है। आज उत्तराखण्ड की राजनीति में नेता, भूमाफिया, शराब माफिया, बजरी माफिया, खड़िया माफिया का एक खतरनाक तबका उभर आया है जो दिन-प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है. देश के दूसरे हिस्सों की तरह नेताओं के संरक्षण में नौकरशाहों, पूंजीपतियों और माफिया का गठजोड़ यहां भी बड़ी जल्दी बन गया है. इसने उत्तराखण्ड को बेचना और नोचना शुरू कर दिया है. उत्तराखण्डवासियों को उनके पूर्वजों से राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात उनकी सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता का जो उपहार विरासत में मिला था, उसे राज्य बनने के बाद राजनेताओं ने क्षीण कर दिया. एक रिपोर्ट के अनुसार आज देश में भ्रष्टाचार के मामले में यह सभी राज्यों से आगे है. इसमें यदि इसका पहला नंबर है तो सिर्फ और सिर्फ इसके अब तक रहे रहनुमाओं की मेहरबानी से.

आजादी के बाद 53 वर्षों में उत्तराखण्ड के 16,000 गांवों में से 1,000 गांव आबादीविहीन हुए, परन्तु अलग राज्य बनने के बाद लगभग दशक भर में ही करीब 400 गांव निर्जन हो गये। इससे स्पष्ट है कि पृथक राज्य बनने के बाद यहां से पलायन और भी तेजी से हुआ. जिस उद्देश्य को लेकर जनता ने आन्दोलन किया था, उसकी पूर्ति में यहां सत्ता में आये सभी राजनैतिक दल पूरी तरह से विफल रहे हैं. आज उत्तराखण्ड में लोकतन्त्र के नाम पर एक नई तरह की माफिया स्टाइल सामन्तवादी व्यवस्था ने जन्म ले लिया है और सभी नेता इस हमाम में नंगे हैं. राज्य बनने से पहले भी यहां की जनता अपने जल, जंगल और जमीन के लिए आन्दोलित थी और आज भी है. जनता के हिस्से में आन्दोलन करना ही रह गया और नेताओं को मिला अपने परिवारों को राजनीति में स्थापित करने का अवसर. आज उत्तराखण्ड के संदर्भ में इससे बड़ी बिडंबना और भला क्या होगी – न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम.

लेखक श्यामसिंह रावत से संपर्क 9410517799 के जरिए किया जा सकता है.

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