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राजस्थान में मुफ्त गेहूं के नाम पर आदिवासी खर्च कर रहे सौ रूपये

बारां, राजस्थान। आदिवासी बारां जिले की किशनगंज व शाहाबाद तहसील में करीब 20 हजार सहरिया परिवार हैं, जिन्हें प्रति माह प्रति परिवार 35 किलो गेहूं निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है. इन दोनों तहसीलों में सहरियाओं को प्रतिमाह करीब सात हजार क्विंटल गेहूं का वितरण होता है. पूर्व में भूख से हुई मौतों को लेकर इस क्षेत्र के सुर्खियों में आने के बाद सरकार की ओर से इन्हें निःशुल्क गेहूं उपलब्ध कराना शुरू किया गया था. कहा गया कि इस योजना को प्रारंभ किए जाने से सहरिया परिवारों को भरपेट भोजन उपलब्ध हो सकेगा. हकीकत कुछ और ही बयां करती है. निःशुल्क गेहूं को प्राप्त करने के लिए सहरियाओं को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. इस गेहूं के लिए भी इन्हें ताकना पड़ रहा है. क्षेत्र के कई गांवों में गेहूं लेने भी पैदल जाना पड़ता है. 35 किलो निःशुल्क गेहूं को प्राप्त करने के लिए लगभग सौ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं.
बारां, राजस्थान। आदिवासी बारां जिले की किशनगंज व शाहाबाद तहसील में करीब 20 हजार सहरिया परिवार हैं, जिन्हें प्रति माह प्रति परिवार 35 किलो गेहूं निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है. इन दोनों तहसीलों में सहरियाओं को प्रतिमाह करीब सात हजार क्विंटल गेहूं का वितरण होता है. पूर्व में भूख से हुई मौतों को लेकर इस क्षेत्र के सुर्खियों में आने के बाद सरकार की ओर से इन्हें निःशुल्क गेहूं उपलब्ध कराना शुरू किया गया था. कहा गया कि इस योजना को प्रारंभ किए जाने से सहरिया परिवारों को भरपेट भोजन उपलब्ध हो सकेगा. हकीकत कुछ और ही बयां करती है. निःशुल्क गेहूं को प्राप्त करने के लिए सहरियाओं को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. इस गेहूं के लिए भी इन्हें ताकना पड़ रहा है. क्षेत्र के कई गांवों में गेहूं लेने भी पैदल जाना पड़ता है. 35 किलो निःशुल्क गेहूं को प्राप्त करने के लिए लगभग सौ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं.
 
शाहाबाद तहसील के चोराखाड़ी गांव के केदार सहरिया ने बताया कि 35 किलो निःशुल्क गेहूं बीलखेड़ा पंचायत मुख्यालय जाकर लाना पड़ता है. चोराखाड़ी से बीलखेड़ा की दूरी 5 किलोमीटर है. यह दूरी पैदल ही चलकर पूरी करते हैं. गेहूं को पिसाने चोराखाड़ी से देवरी जाते है. देवरी जाने का करीब 40 रुपए किराया लगता है. 20 रुपए गेहूं के कट्टे के लग जाते हैं तो 35 रुपए पिसाई के. इस तरह 35 किलो गेहूं को प्राप्त करने में लगभग 100 रुपए खर्च हो जाते हैं. सूंडा गांव के सहरियाओं ने बताया कि उन्हें 35 किलो गेहूं लेने 5 किलोमीटर दूर खंडेला जाना पड़ता है. साइकिल या फिर किराए से ट्रैक्टर ट्रॉली करके लेकर जाते हैं. गेहूं पिसाई के लिए 2 किलोमीटर दूर गणेशपुरा गांव जाते हैं. हरिनगर से बीलखेड़ा डांग करीब 15 किलोमीटर दूर है. हरिनगर के सहरियाओं को ट्रैक्टर किराए पर करके बीलखेड़ा से निःशुल्क गेहूं लेकर आना पड़ता है. बीलखेड़ा दूर होने से गेहूं पिसाई के लिए मध्यप्रदेश के गलथूनी गांव जाते हैं. हरीनगर से यह गांव 6 किलोमीटर दूर ही है. सांधरी गांव में 110 सहरिया परिवार निवास करते हैं. हर महीने मिलने वाले निःशुल्क गेहूं को पिसाने के लिए 18 किलोमीटर दूर देवरी गांव जाते हैं. देवरी आने जाने में 30 रुपए प्रति सवारी किराया लगता है. किराए के रूप में 30 रुपए गेहूं के कट्टे के और पिसाई के 35 रुपए लग जाते हैं यानी लगभग सौ रुपए खर्च हो जाते हैं. सनवाड़ा ग्राम पंचायत के मडी सांभर सिंगा गांव के बाशिदें करीब 3 किलोमीटर पैदल चलकर सांधरी गांव से गेहूं लेकर आते हैं.
 
निःशुल्क गेहूं वितरण के दावों की पोल इसी से खुलती है कि इस क्षेत्र के सहरियाओं को कैसे यह गेहूं पाने के लिए जूझना पड़ रहा है. क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों में गेहूं का वितरण एक महीने की देरी से किया जा रहा है. इकलेरा डांडा में जून माह में अप्रैल महीने का राशन दिया गया. कई परिवारों को बाजार से महंगे दर पर गेहूं खरीदना पड़ रहा है. हाल ही खबर आई कि किशनगंज ब्लाक के खांखरा ग्राम पंचायत के जगदीशपुरा गांव के सहरिया परिवारों को पिछले पांच माह से राशन सामग्री ही नहीं मिली. इन परिवारों को फरवरी से जुलाई 2013 तक के राशन का इंतजार है. (यह रिपोर्ट इंक्लूसिव मीडिया फैलोशिप के अध्ययन का हिस्सा है)
 
राजस्थान से बाबूलाल नागा की रिपोर्ट
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