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आज केपी सक्सेना भी न रहे… लेकिन स्मृतियां तो जीवित रहती ही हैं न

Virendra Yadav : आज केपी सक्सेना भी न रहे. यूं तो लखनऊ शहर के एक ही इलाके में रहते हुए भी इधर कई वर्षों से मिलने जुलने का कोई नियमित सिलसिला नहीं था. इधर अस्वस्थ होने के पूर्व भी शहर के साहित्यिक अयोजनो में भी उनकी उपस्थिति लगभग न के ही बराबर थी. फिर भी जब कभी कभार चलते फिरते देखा देखी हो जाती तो उसी चार दशकों पूर्व की उस आत्मीय मुस्कराहट के साथ मिलते जब हम लोगों का मिलना जुलना सप्ताह में एक दो बार जरूर होता था….

Virendra Yadav : आज केपी सक्सेना भी न रहे. यूं तो लखनऊ शहर के एक ही इलाके में रहते हुए भी इधर कई वर्षों से मिलने जुलने का कोई नियमित सिलसिला नहीं था. इधर अस्वस्थ होने के पूर्व भी शहर के साहित्यिक अयोजनो में भी उनकी उपस्थिति लगभग न के ही बराबर थी. फिर भी जब कभी कभार चलते फिरते देखा देखी हो जाती तो उसी चार दशकों पूर्व की उस आत्मीय मुस्कराहट के साथ मिलते जब हम लोगों का मिलना जुलना सप्ताह में एक दो बार जरूर होता था….

दरअसल मिलने जुलने का यह सेतु था सातवें आठवें दशक का 'कंचना' नाम का वह चायखाना जो मध्य अमीनाबाद में उन दिनों पुराने लखनऊ के लेखकों, पत्रकारों, सामाजिक व् राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मुख्यतः कविसम्मेलनी मंचीय कवियों की अड्डेबाजी का केंद्र था. हम लोगों की रिहाईश भी तब वहीं आसपास थी. के पी सक्सेना अक्सर चारबाग रलवे स्टेशन से जब अपनी स्टेशनमास्टरी की ड्यूटी समाप्त कर अपने हाथ में चार कटोरों वाला टिफिनबाक्स लिए वापस हो रहे होते तो वहां झांकते और परिचितों दोस्तों के मिलने पर अड्डा जमाते.

मेरा उनसे परिचय और मिलना यहीं हुआ था और तब मैं विश्वविद्यालय का छात्र था. उन दिनों वे कई पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में नियमित व्यंग्य स्तम्भ लिखते थे. इनमें कुछ ऐसी पत्रिकाएं भी थीं जिनका जिक्र होने पर वे संकोच भी महसूस करते थे. लेकिन हम लोग शरारतन उनसे अक्सर उन्ही पत्रिकाओं में उनके व्यंग्य छपने की चर्चा करते थे जिनका जिक्र वे नहीं सुनना चाहते थे. उनकी लेखन क्षमता कितनी विलक्षण थी इसका अंदाज़ा उसी दौर की एक घटना से हुआ.

हुआ यह कि उन दिनों हम लोग विश्वविद्यालय से 'विद्यार्थी लोक' नाम का एक पाक्षिक पत्र प्रकाशित करते थे. तय हुआ कि उसके पंद्रह अगस्त अंक में केपी सक्सेना का व्यंग्य प्रकाशित किया जाये. वे सहर्ष इसके लिए तैयार भी हो गए और लेख देने की तारिख व समय निश्चित कर दिया. वो अखबार के प्रेस में जाने की अंतिम डेडलाईन भी थी. लेकिन जब मैं उनके घर लेख लेने गया तब वे व्यस्तताओं में इसे लिखना पूरी तरह भूल गए थे. मुझे देखते ही उन्हें याद आया तो शर्मिंदा होते हुए उन्होंने कहा कि अच्छा एक घंटे बाद आकर ले लो.

मुझे बहुत गुस्सा आया कि कि ये नाहक मुझे टाल रहे हैं एक घन्टे में ये कैसे लिख देंगे! फिर भी मैं जब दो घंटे बाद गया तो वे लेख लिखकर उसे लिफाफे में बंद कर पत्नी को उसे मुझे देने की हिदायत देकर टहलने चले गए थे. मैंने सोचा कि इन्होंने चलताऊ ढंग से मुझे निपटा दिया लेकिन जब मैंने उसे पढ़ा तो वह नोकपलक दुरुस्त व्यंग्य था जिसके छपने पर सराहना भी हुयी थी ……आज ४२ वर्षों बाद वह सब याद आ गया, जब वे नहीं हैं… स्मृतियाँ तो जीवित रहती ही हैं न!

वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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