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याद रहेगी केपी की बेपरकी……!!

वह 80 के दशक का उत्तरार्द्ध था. जब मैं पत्रकारिता में बिल्कुल नया था. यह वह दौर था जब रविवार, धर्मयुग व साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाएं बंद हो चुकी थीं. लेकिन नए कलेवर के साथ संडे आब्जर्वर, संडे मेल और दिनमान टाइम्स के रूप में कुछ नए साप्ताहिक समाचार पत्र बाजार में उतरे. बिल्कुल नई शैली में ये पत्र या कहें पत्रिकाएं 12 से 14 पेज के अखबार जैसे थे. साथ में बेहद चिकने पृष्ठों वाला एक रंगीन चार पन्नों का सप्लीमेंट भी होता था. उस समय इस सामग्री के साथ एक रंगीन पत्रिका भी साथ में देकर संडे मेल ने तहलका मचा दिया.
वह 80 के दशक का उत्तरार्द्ध था. जब मैं पत्रकारिता में बिल्कुल नया था. यह वह दौर था जब रविवार, धर्मयुग व साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाएं बंद हो चुकी थीं. लेकिन नए कलेवर के साथ संडे आब्जर्वर, संडे मेल और दिनमान टाइम्स के रूप में कुछ नए साप्ताहिक समाचार पत्र बाजार में उतरे. बिल्कुल नई शैली में ये पत्र या कहें पत्रिकाएं 12 से 14 पेज के अखबार जैसे थे. साथ में बेहद चिकने पृष्ठों वाला एक रंगीन चार पन्नों का सप्लीमेंट भी होता था. उस समय इस सामग्री के साथ एक रंगीन पत्रिका भी साथ में देकर संडे मेल ने तहलका मचा दिया.
 
कन्हैया लाल नंदन के संपादकत्व में निकलने वाले इस पत्र की रंगीन पत्रिका में अंतिम पृष्ठों पर बेपरकी स्तंभ के तहत व्यंग्यकार के. पी. सक्सेना का व्यंग्य प्रकाशित होता था. बेसब्री से प्रतीक्षा के बाद पत्रिका हाथ में आते ही मैं सबसे पहले स्व. सक्सेना का व्यंग्य ही पढ़ता था। चुनांचे, अपने तई व बेपरकी समेत तमाम अपरिचित व नए जुमलों के साथ उनका व्यंग्य कमाल का होता था. वे गंभीर बातों को भी बेहद सरलता के साथ बोलचाल की भाषा में पेश करते थे. व्यंग्य में वे खुद के रिटायर्ड रेलवे गार्ड होने का जिक्र बार-बार किया करते थे यही नहीं सामाजिक विडंबनाओं पर भी वे बेहद सरल शब्दों में इतने चुटीले प्रहार किया करते थे कि हंसने के साथ ही सोच में पड़ जाना पड़ता था. ऐसा करते हुए वे देश के आम आदमी का प्रतिनिधित्व करते मालूम पड़ते थे. उनके स्तंभ को पढ़ कर बहुत मजा आता था. किसी काम में समय बीतने को या किसी क्षेत्र में योगदान देकर संसार से विदा लेने वालों के लिए वे, 'खर्च हो गए' जैसे जुमले का प्रयोग करते थे. यह उनका एक खास अंदाज था. 
 
मुझे याद है उसी दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. नरसिंह राव पर तब सूटकेस में भर कर एक करोड़ रुपए लेने का आरोप लगा था. इसके लिए स्व. सक्सेना ने, "उम्र बीत गई रेलवे में गार्डी  करते, लेकिन सपने में भी कभी अटैचा नहीं दिखा", जैसे वाक्य का प्रयोग कर पाठकों को हंसने पर मजबूर कर दिया. यही नहीं उसी दौर में सरकार ने विधवा की तर्ज पर विधुर पेंशन शुरू करने की पेशकश की तो स्व. सक्सेना ने, "हम रंडुवों को पेंशन पाता देख बीबी वालों के बनियान तले सांप लोटने लगेंगे", जैसे वाक्य से गजब का व्यंग्य लिखा, जिसे आजीवन भूलाया नहीं जा सकता. उस दौर में कोई भी पत्रिका हाथ में आने पर मेरी निगाहें उनके व्यंग्य को ही ढूंढा करता थीं. जीवन की भागदौड़ के बीच फिर सक्सेना बिसर से गए. कई बार अचानक याद आने पर मैं चौंक पड़ता था कि कवि सम्मेलनों में बेहद दुबले-पतले से नजर आने वाले के. पी क्या अब भी हमारे बीच हैं. सचमुच हिंदी जगत के आम-आदमी से जुड़े व्यंग्यकार थे स्व. के. पी. सक्सेना …. उनको मेरी श्रद्धांजलि …
 
                    लेखक तारकेश कुमार ओझा दैनिक जागरण से जुड़े हैं तथा पश्चिमी मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) में रहते हैं. इनसे संपर्क 09434453934 पर किया जा सकता है.

 

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