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मुझे समझ आ गया कि राजेन्द्र यादव का मतलब क्या होता है

न्यूज चैनलों में राजेन्द्र यादव की मौत की खबर देखकर फिर अखबारों को पढ़कर थोड़ा दुख हुआ. हालांकि मेरे दुख का पैमाना हिन्दी साहित्य जगत और उनके मित्रों प्रशसंको और चाहने वालों के दुख के मुकाबले काफी छोटा है, क्योंकि मेरा उनसे सम्बन्ध महज 3-4 घंटे का रहा.
न्यूज चैनलों में राजेन्द्र यादव की मौत की खबर देखकर फिर अखबारों को पढ़कर थोड़ा दुख हुआ. हालांकि मेरे दुख का पैमाना हिन्दी साहित्य जगत और उनके मित्रों प्रशसंको और चाहने वालों के दुख के मुकाबले काफी छोटा है, क्योंकि मेरा उनसे सम्बन्ध महज 3-4 घंटे का रहा.
 
मुझे हिन्दी साहित्य में परंपरावादी लेखन के समानान्तर लिखने वाले राजेन्द्र यादव से मिलने का सौभाग्य 11 वर्ष की अवस्था में मिला जब मैं साहित्य का ककहरा अपने दादाजी की लाइब्रेरी में रखी मोटी-मोटी पुस्तकों से सीख रहा था. मौका था 1990-91 के भागलपुर के भगवान पुस्तकालय में आयोजित भागलपुर जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन का, जिसमें राजेन्द्र यादव के अलावा चित्रा मुदगल, अवध नारायण मुद्गल, अर्चना वर्मा और शैलेश मटियानी जैसे हिन्दी के दिग्गज लेखकों का जमावडा हुआ था.
 
यह मेरा सौभाग्य था कि अपने दादाजी स्व. रामजी मिश्र मनोहर और सच्चिदांनद सिन्हा, लाइब्रेरी के मुख्य पुस्तकलाध्यक्ष राम शोभित सिंह के साथ मैं भी इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में शामिल हुआ. कार्यक्रम के आयोजक स्व. विष्णु किशोर झा बेचन जो दादा जी के एक अच्छे मि़त्र होने के नाते मुझे अपना पोता मानते थे, ने मेरा राजेन्द्र यादव से परिचय कराया था.
 
मुझे अभी भी वह शाम अच्छी तरह याद है जब राजेन्द्र यादव बेचन जी के कमरे में बैठकर अपना ग्लास भर रहे थे और मैं धमकता हुआ उस कमरे में पहुंच गया. मेरे लिए काला चश्मा लगाये राजेन्द्र यादव और उनका ग्लास दोनों कौतूहल का विषय था. यूं कि मनोहर जी और फिर बेचन जी के पोते होने के कारण पूरे आयोजन स्थल में मेरे कहीं आने जाने पर कोई रोक टोक नहीं थी इसलिए मैं बिना संकोच के सीधा उनके पास पहुंच गया. इस बीच वहां पहुंचे मौजूद एक अन्य शख्श ने मुझे इशारे से वापस लौट जाने को कहा. मगर राजेन्द्र यादव जी ने मेरा हाथ पकड़कर अपने बगल में बिठा लिया. तब तक उस कमरे में और कई साहित्यकार पहुंच चुके थे. वहां मुझे राजेन्द्र यादव के पास बैठा देखकर सबको आश्चर्य भी हुआ क्योंकि राजेन्द्र यादव के बारे में ऐसा कहा जाता था कि वो अत्यंत गंभीर किस्म के व्यक्ति हैं और जल्दी किसी से बात नहीं करते जबकि इसके विपरीत वो अपना ग्लास भी खाली कर रहे थे और मुझसे बातें भी कर रहे थे. बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे मेरी रूचि के बारे में पूछा. हिन्दी में क्या पढ़ते हो जैसे सवाल पूछे. इतना ही नहीं जब मैंने उन्हें बताया कि प्रेमचंद की ईदगाह और फणीश्वर नाथ रेणु की बहुरियां पढ़ी हैं तब उन्होंने उस कहानी के पात्रों की भी चर्चा की. करीब तीन घंटे तक मैं उनके साथ बातें करता रहा और वो सवालों का जवाब देते रहे. मेरे एक सवाल पर कि आप काला चश्मा क्यों लगाते हैं उन्होंने सपाट शब्दों में कहा था कि इससे बुरी चीजें नहीं नजर आती है, मुझे आज भी याद है. इतना ही नहीं जब मैं उस कमरे से निकलने लगा तो उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से पांच रूपये का एक नोट निकालकर मुझे दिया.
 
जब मैंने रूपये लेने से मना किया तब पास बैठे एक व्यक्ति ने तपाक से कहा ले लो बेटा तुम बड़े भाग्यशाली हो जो राजेन्द्र यादव तुम्हें पैसे दे रहे है. हम लोग इनसे चाहकर भी एक रूपया खर्च नहीं करवा पाते हैं. इस घटना को लगभग 22 वर्ष हो गये हैं. भागलपुर जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उनके दो दिन प्रवास के दौरान उनके साथ बिताये क्षण आज भी किसी फिल्म की तरह आंखो के सामने गुम जाते हैं.
 
इन दो दशकों में मुझे इतनी समझ भी आ गयी कि राजेन्द्र यादव का मतलब क्या होता है. मगर अब काफी देर हो चुकी है.
 
 
अमित मिश्र  यू एन आई रांची में वरीय उपसंपादक हैं.
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